इक तेरी चाहत! - Chapter 1
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( 2001 )
" अबे यहां अकेला क्यों बैठा है और तेरा मुंह क्यों लटका हुआ है .. ? " उसके दोस्त प्रशांत ने उसके कंधे पर हाथ जमाते हुए पूछा था , साथ अपने बैग को उसके सामने ही पटकते हुए , उसके बगल में बैठ गया था कि वह फ़ौरन ही घबराहट का शिकार हुआ था ।
घास पर खुली पड़ी अपनी किताबों को समेट कर अपने बैग में डालते हुए वह अटक - अटक कर बोला - " क... कुछ नहीं हुआ । मैं तो पढ़ रहा था । "
" हां , तो ठीक है ना । इतना घबरा क्यों रहा है । " उसके चहरे पर चमकती पसीने की बूंदों को देख कर उसने कहा था । अपनी जेब से रुमाल निकाल, अपना पसीना पोंछता , वह खुद को सामान्य दिखाता हुआ बोला - " ध... धूप... धूप की वजह से पसीना आ रहा है । "
प्रशांत ने उलझन में उसे देखा था । दिसंबर का आखिरी हफ्ता था और धूप इतनी थी भी नहीं कि इंसान पसीने से तर - ब - तर हो जाए । इस वक्त वह दोनो कॉलेज के गार्डन में बैठे थे ।
" किन्शुक... क्या तू मुझसे कुछ छुपा रहा है .. ? " प्रशांत ने शक भरी नजरों से उसे देखते हुए पूछा था कि उसकी बात सुनते ही किन्शुक का चहरा एकदम सफेद पड़ गया । जैसे उसकी कोई चोरी पकड़ी गई हो ।
" म... मैं भला क्यों कुछ छुपाऊंगा तुझसे । "
" पता नहीं , लेकिन आज कल तू अजीब बर्ताव कर रहा है । कॉलेज आता है मगर कोई क्लास अटेंड नहीं करता । ना मेरे साथ बैठता है । घर पर कुछ हुआ है क्या .. ? या .. या अंकल ने कुछ कहा है .. ? " कहते हुए उसका लहजा नर्म हुआ था की जानता था , किन्शुक के पिता को । बड़े हिटलर टाइप के थे ।
" ऐसा कुछ भी नहीं है और पापा ने कुछ नहीं कहा है । रहीं बात क्लास अटेंड ना करने की तो , सभी प्रोफेसर्स सिलेब्स रिपीट ही कर रहे है । इसलिए मै यहां बैठ कर सेल्फ स्टडी करता हूं । " उसने बहाना बनाते हुए कहा था जबकि बात तो यह थी कि वह किसी का भी सामना नहीं कर पा रहा था , फिलहाल । की हर चेहरा उसे अपनी तरफ हंसते हुए नजर आता था ।
" हां.. यह भी ठीक कह रहा है तू । " प्रशांत को अब जाकर वह कुछ सामान्य नजर आया था , सो उसने बात को वहीं छोड़ दिया । जबकि किन्शकु सिर झुकाए बैठ गया , की उसकी हिम्मत ही नहीं हो रहीं थी कि वह अपने दोस्त से ही नज़रे मिला पाएं , की उसे डर था जैसे उसके चहरे पर सब लिखा हो और वह पढ़ ना ले ।
उसने आहिस्ते से अपने स्याह स्वेटर की आस्तीन को ऊपर की तरफ खींचा कि वह लंबा होने की वजह से बार - बार आगे आ रहा था । प्रशांत की नजर सीधा उसके हाथ में बंधे कलावा पर गई । वह फ़ौरन उसका हाथ पकड़ता हुआ बोला - " घर में पूजा थी .. ? "
वह एकदम सकपका सा गया और अपना हाथ छुड़वाते हुए वापस आस्तीन नीचे करता हुआ बोला - " हां... हां... पूजा थी घर पर । "
" यार घर पर पूजा थी और तूने मुझे बुलाया नहीं । "
" मां ने एकदम पूजा रखवा दी तो मौका ही नहीं मिला बुलाने का । लेकिन अगली बार होंगी तब बुला लूंगा । ठीक है... "
" हम्मम... ठीक है । "
" अच्छा अब मैं चलता हूं । " वह कलाई पर बंधी घड़ी में वक्त देखता हुआ बोला । तो प्रशांत फ़ौरन बोला - " आज मै बाइक लेकर आया हूं । छोड़ दूंगा तुझे , तेरे घर तक । "
" नहीं!!!!!!!!!! " वह एकदम चीखा था । की प्रशांत हैरान होकर उसे देखने लगा । किन्शुक को फौरन ही एहसास हुआ तो वह ज़बरदस्ती मुस्कुरा कर बोला - " मेरा मतलब है कि तू बिना बात परेशान होंगा । मैं ख़ुद चला जाऊंगा बस में और फिर मुझे एक काम भी है । "
कहकर उसने अपने बैग को कंधे पर डाला और उठ कर बाहर की तरफ बढ़ गया , तेज - तेज कदमों से । ऐसे जैसे उसे डर हो कि कहीं प्रशांत उसे पकड़ ना ले । जबकि उसे जाते देख प्रशांत के चहरे पर उलझ - ही - उलझ नजर आने लगी थी ।
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चहरे पर बेजारी और थकान लिए वह ढाई बजे के करीब घर लौटा था । घर में दाखिल होते ही उसने अपने बैग को बरामदे में रखी चारपाई पर पटका था और खुद भी वहीं ढेर होते हुए जरा ऊंची आवाज में बोला - " मां... मां... भूख लगी है । खाना लगा दो । "
" देवर जी , अब को मां जी की जगह अपनी बीवी से खाना लाने का कहने की आदत डाल लो । " अपनी बड़ी भाभी नीता की आवाज सुनते ही वह उठ बैठा था । वह शरारत से उसे देख रहीं थी ।
" मां कहां है .. ? " उसने कुछ बेचैन होकर पूछा था ।
" पड़ोस में कीर्तन है । वहीं गई है । " वह रसोई की तरफ बढ़ते हुए बोली । तो किन्शुक उससे बोला - " अच्छा... तो फिर आप लगा दे मेरा खाना । "
" अपनी बीवी से कहो । " वापस बाहर आते हुए वह बोली और मुंह बना कर अपने कमरे में चली गई । गुस्से में अपने पैरों को पटकते हुए वह किलस उठा और खुद ही रसोई में घुस गया । की इरादा खुद से खाना लेने का था । अभी उसने थाली उठाई ही थी कि तभी उसके कानो में एक मीठी सी आवाज पड़ी - " ऐ जी... मैं लगा देती हूं ना खाना । "
किन्शुक का गुस्सा और बढ़ा था । उसने थाली को स्लैब पर पटकते हुए उसकी तरफ देखा ,जो हल्की सी मुस्कान लिए उसे देख रहीं थी । सुर्ख साड़ी में लिपटी वह एकदम गुड़िया सी लग रहीं थी । गले में मंगलसूत्र और मांग में भरा सिंदूर आधी पेशानी तक हल्का लाल रंग छोड़े हुए था ।
" नहीं खाना मुझे खाना । " किन्शुक के लहजे में अचानक कड़वाहट उतर आई थी । की उसके चहरे की मुस्कान पल में सिमट गई ।
" अ... आप सुबह भी कुछ नहीं खाकर गए थे । अभी भी नहीं खा रहे । आपके सिर में दर्द हो जायेगा । " उसने फिक्रमंद होते हुए कहा था जबकि उसकी बात सुनकर किन्शुक ज्वालामुखी की तरह उस पर ही फट पड़ा था - " मैंने कहा ना नहीं खाना मुझे । क्या मेरी बात समझ नहीं आ रही तुम्हें । ज़्यादा मेरी बीवी बनने की और यह झूठी फिक्र दिखाने की जरूरत नहीं है । अपने काम - से - काम रखो । "
कहकर बगैर एक नज़र उसे देखे वह दनदनाता हुआ रसोई से बाहर निकल , अपने कमरे में चला गया था जबकि उसकी बात का असर यह हुआ कि उसका चहरा एकदम मुरझा सा गया । - " क्या इन्हें मै पसंद नहीं मगर क्यों .. ? " उसने खुद से ही सवाल किया था ।
वह कुछ और सोचती उससे पहले ही बाहर से किसी ने उसे आवाज लगाई थी - " पंखुड़ी बहू... "
" जी , मां जी... " कहते हुए वह बाहर की तरफ दौड़ गई थी ।
क्रमशः
कहानी का पहला भाग कैसा लगा , कमेंट में जरुर बताएं बाकी पढ़ते रहे यह कहानी ❤️