Teri Panaha Me Ch. 3

Teri Panaha Me - Chapter 3

Posted by Kiran Sahani • Jul 02, 2026 04:30 PM

अध्याय 3 : पहली टक्कर

Ab tk,

फिर उसने माँ-पापा और चाचा-चाची के पैर छुए।

महेंद्र चाचा हँसते हुए बोले,

"डॉक्टर साहब... अब विदेश से लौट आए हो, हमें भूल मत जाना।"

आर्यवीर ने हल्की-सी मुस्कान दी।

"आपको भूलना आसान नहीं है, चाचू।"

इतने में नंदिनी दौड़कर आई और पीछे से उससे लिपट गई।

"भैया..."

"तू अब भी उतनी ही शैतान है।"

"और आप अब भी उतने ही खड़ूस।"

पूरा परिवार हँस पड़ा।

आर्यवीर ने पहली बार खुलकर मुस्कुराया।

दूर खड़ी सिया यह सब देख रही थी।

"ये तो उतने डरावने नहीं लग रहे..." उसने मन ही मन सोचा।

दादी ने आवाज़ दी,

"सिया बेटा... आरती।"

सिया धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

उसके हाथ हल्के-हल्के काँप रहे थे।

आर्यवीर ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।

सादगी...

मासूमियत...

और आँखों में एक अजीब-सी शांति।

सिया ने आरती उतारी।

जैसे ही तिलक लगाने लगी, नंदिनी पीछे से धीरे से बोली,

"हाथ मत काँपाना..."

सिया घबरा गई।

तिलक लगाने की जगह उसके माथे पर रोली की एक लंबी लकीर बन गई।

दो सेकंड की ख़ामोशी...

फिर पूरा परिवार ज़ोर से हँस पड़ा।

सिया का चेहरा शर्म से लाल हो गया।

"म... माफ़ कीजिए..."

आर्यवीर ने बिना कुछ कहे रूमाल निकाला, आईने में

देखकर रोली साफ़ की और शांत स्वर में बोला,

"कोई बात नहीं।"

बस इतना।

न गुस्सा...

न मुस्कान...

न शिकायत।

सिया ने राहत की साँस ली।

लेकिन उसे क्या पता था...

यह उनकी पहली मुलाक़ात थी।

और आने वाले दिनों में यही दो लोग एक-दूसरे की ज़िंदगी बदलने वाले थे

Ab aage,

सुबह के सात बजे थे।

राठौर हवेली में हमेशा की तरह चहल-पहल शुरू हो चुकी थी।

रसोई से गरम-गरम पराठों की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। सरस्वती काकी और सविता चाची मिलकर नाश्ता बना रही थीं।

"सिया बेटा, ज़रा दही तो फ्रिज से निकाल देना।" सविता चाची ने मुस्कुराकर कहा।

"जी चाची।"

सिया तुरंत दही लेकर आ गई।

"और ये लो... चाय भी तैयार है।"

"अरे, तू कब से इतनी बड़ी हो गई कि हमें भी काम करने नहीं देती?" सविता चाची ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा।

सिया मुस्कुरा दी।

"आप सबने मुझे इतना प्यार दिया है... थोड़ा-सा काम कर लूँ तो क्या बुरा है?"

उसी समय नंदिनी दौड़ती हुई रसोई में आई।

"बचाओ... बचाओ..."

सब चौंक गए।

"क्या हुआ?" महेंद्र चाचा ने पूछा।

नंदिनी हाँफते हुए बोली,

"भैया... भैया सुबह पाँच बजे से पूरे घर का निरीक्षण कर रहे हैं।"

महेंद्र चाचा हँस पड़े।

"अरे, वो पहले भी ऐसे ही थे।"

"लेकिन अब तो और भी ख़तरनाक हो गए हैं।"

सिया धीरे से पूछ बैठी,

"क्यों?"

"अभी उन्होंने रामू काका को सिर्फ़ इसलिए डाँट दिया क्योंकि फूलों में पानी ज़्यादा डाल दिया था।"

इतने में पीछे से एक भारी आवाज़ आई—

"मैंने डाँटा नहीं था..."

सभी ने पलटकर देखा।

दरवाज़े पर आर्यवीर खड़ा था।

सफेद शर्ट की बाँहें मोड़ी हुई थीं।

चेहरे पर वही गंभीरता।

नंदिनी ने धीरे से सिया के कान में कहा,

"लो... शेर आ गया।"

सिया अपनी हँसी रोकने लगी।

आर्यवीर ने सबको देखा।

"गुड मॉर्निंग।"

सबने एक साथ जवाब दिया।

"गुड मॉर्निंग।"

दादी कुर्सी पर बैठते हुए बोलीं,

"आ जा बेटा, नाश्ता कर ले।"

आर्यवीर बैठ गया।

सिया सबको पराठे परोसने लगी।

जैसे ही वह आर्यवीर की प्लेट में पराठा रखने लगी, उसका हाथ हल्का-सा फिसल गया।

मक्खन का छोटा-सा टुकड़ा सीधे आर्यवीर की शर्ट पर गिर पड़ा।

पूरा डाइनिंग हॉल शांत हो गया।

नंदिनी ने धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं।

"अब गया काम से..."

सिया घबरा गई।

"सॉरी... मुझे माफ़ कर दीजिए..."

आर्यवीर ने अपनी शर्ट की तरफ देखा।

फिर सिया की तरफ।

कुछ सेकंड तक कुछ नहीं बोला।

फिर शांत आवाज़ में बोला,

"अगली बार थोड़ा ध्यान रखिए।"

बस इतना कहकर उसने नैपकिन से शर्ट साफ़ की और नाश्ता करने लगा।

सिया हैरान रह गई।

उसे लगा था कि वह बहुत गुस्सा करेगा।

दादी मुस्कुराईं।

"देखा... मेरा पोता पहले से समझदार हो गया है।"

नंदिनी धीरे से बोली,

"दादी, अभी सिर्फ़ पाँच मिनट हुए हैं। फैसला शाम को करना।"

सब फिर हँस पड़े।

नाश्ते के बाद दादा जी ने कहा,

"आर्यवीर, आज कोई काम नहीं। पूरा दिन परिवार के साथ बिताओ।"

"जी दादाजी।"

तभी महेंद्र चाचा बोले,

"चलो, सब लोग पुराने आम के बगीचे चलते हैं। पाँच साल हो गए, वहाँ कोई पिकनिक नहीं हुई।"

"वाह!" नंदिनी खुशी से उछल पड़ी।

"मैं अभी तैयारी करती हूँ।"

सिया भी मुस्कुराने लगी।

उसे भी बगीचा बहुत पसंद था।

करीब एक घंटे बाद...

पूरा परिवार बगीचे में था।

दादी पेड़ के नीचे बैठी थीं।

चाचा और पापा शतरंज खेल रहे थे।

नंदिनी और रोहन बैडमिंटन खेल रहे थे।

सिया सबके लिए नींबू पानी बना रही थी।

आर्यवीर दूर खड़ा पेड़ों को देख रहा था।

तभी एक छोटी-सी बच्ची, जो पास के माली की बेटी थी, गेंद उठाने के लिए दौड़ी।

उसका पैर फिसला और वह गिरने ही वाली थी...

आर्यवीर बिजली की तरह आगे बढ़ा और उसने बच्ची को संभाल लिया।

"धीरे..."

उसने प्यार से कहा।

बच्ची मुस्कुरा दी।

"थैंक यू, भैया।"

दूर खड़ी सिया यह सब देख रही थी।

उसने पहली बार आर्यवीर के चेहरे पर गुस्से की जगह ममता देखी।

वह मन ही मन सोचने लगी—

"शायद ये उतने कठोर नहीं हैं, जितने दिखाई देते हैं..."

उसी समय नंदिनी शरारती मुस्कान के साथ वहाँ पहुँची।

"भैया..."

"हाँ?"

"एक फोटो लेते हैं।"

बिना जवाब सुने उसने सिया को आर्यवीर के पास खड़ा कर दिया।

"अब मुस्कुराइए..."

सिया झेंप गई।

आर्यवीर ने भौंहें सिकोड़ लीं।

"नंदिनी..."

"बस एक फोटो..."

क्लिक...

फोटो खिंच गई।

नंदिनी फोटो देखकर ज़ोर से हँसने लगी।

"अरे वाह... एक मुस्कुरा नहीं रहा और दूसरी कैमरे की तरफ देख ही नहीं रही!"

पूरा परिवार हँसी से गूँज उठा।

आर्यवीर ने गहरी साँस ली।

"तुम कभी नहीं सुधरोगी।"

"नहीं सुधरूँगी..."

नंदिनी जीभ निकालकर भाग गई।

आर्यवीर भी पहली बार उसके पीछे दौड़ पड़ा।

यह देखकर सिया के होंठों पर अनायास मुस्कान आ गई।

शायद...

इस घर में आने वाला समय सिर्फ़ नए रिश्ते ही नहीं, नई खुशियाँ भी लेकर आने वाला था।

क्रमशः...

सुझाव: कहानी को और प्रभावशाली बनाने के लिए चौथे या पाँचवें अध्याय से एक रहस्य का संकेत देना अच्छा रहेगा, ताकि पाठक सिर्फ़ रोमांस नहीं, बल्कि कहानी के मुख्य रहस्य के लिए भी जुड़े रहें।

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