Teri panaha me
अध्याय 1 : एक नई सुबह
सुबह के पाँच बजे थे।
राठौर हवेली की बालकनी से सूरज की पहली किरणें पूरे आँगन को सुनहरा बना रही थीं। हवेली के सामने बने विशाल बगीचे में रंग-बिरंगे फूल हवा के साथ झूम रहे थे। मंदिर की घंटियों की मधुर आवाज़ पूरे घर में गूँज रही थी।
इतनी बड़ी हवेली होने के बावजूद आज घर का माहौल अलग था। हर चेहरे पर खुशी थी, हर कोई किसी खास मेहमान के आने की तैयारी में लगा था।
रसोई में दादी कमला देवी अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसे खड़ी थीं।
"सरस्वती! ज़रा मिठाई संभालकर रखना... मेरे पोते को गुलाब जामुन बहुत पसंद हैं।"
सरस्वती काकी हँसते हुए बोलीं, "अम्मा जी, पाँच साल बाद आ रहे हैं... लगता है आज पूरा शहर खिला देंगी।"
"अरे, मेरा आर्यवीर पाँच साल बाद घर लौट रहा है। आज तो पूरा शहर भी आ जाए, कम है।"
इतने में पीछे से किसी ने दादी की आँखों पर हाथ रख दिए।
"बताइए मैं कौन हूँ?"
दादी मुस्कुरा उठीं।
"अगर मेरी शैतान नंदिनी नहीं होगी, तो कौन होगा?"
नंदिनी खिलखिलाकर हँस पड़ी।
"दादी, आप हर बार पहचान लेती हैं।"
"तुझे पहचानने के लिए आँखों की नहीं, दिल की ज़रूरत है।"
उसी समय पूजा घर से आरती की आवाज़ सुनाई दी।
सफेद सूती सलवार-कुर्ते में एक लड़की हाथों में पूजा की थाली लिए बाहर आई। माथे पर छोटी-सी बिंदी, चेहरे पर मासूम मुस्कान और आँखों में सादगी...
वह थी सिया।
सबसे पहले उसने दादा-दादी के पैर छुए।
"सदा खुश रहो, बेटी।" दादा जी ने उसके सिर पर हाथ रखा।
फिर वह मुस्कुराकर बोली,
"दादी, भगवान से प्रार्थना कर ली है... आज आर्यवीर भैया का सफर अच्छा रहे।"
कमला देवी ने प्यार से उसके गाल थपथपाए।
"तू हर किसी के लिए दुआ करती है, अपने लिए कब माँगेगी?"
सिया मुस्कुरा दी।
"मुझे तो सब मिल गया, दादी।"
दादी की आँखें भर आईं।
वह जानती थीं कि यह लड़की कितने दुखों से गुज़री है, फिर भी चेहरे पर शिकायत नहीं, सिर्फ मुस्कान रहती है।
तभी नंदिनी धीरे से सिया के कान में बोली,
"भैया को देखकर कहीं बेहोश मत हो जाना।"
सिया चौंक गई।
"मैं क्यों बेहोश होऊँगी?"
"अरे, यूके से लौट रहे हैं... पूरे हीरो लगते हैं।"
सिया हँस पड़ी।
"तुम भी ना..."
इतने में पीछे से महेंद्र चाचा की आवाज़ आई—
"अगर तुम दोनों की बातें खत्म हो गई हों, तो कोई मेरी चाय भी दे देगा?"
पूरा घर हँसी से गूँज उठा।
सविता चाची ट्रे लेकर आईं।
"लीजिए जी, आपकी चाय। लेकिन पहले ये बताइए कि आज दसवीं बार घड़ी क्यों देख चुके हैं?"
महेंद्र जी मुस्कुराए।
"अरे, मेरा भतीजा आ रहा है। इंतज़ार तो होगा ही।"
अर्जुन सिंह राठौर अख़बार मोड़ते हुए बोले,
"फ्लाइट उतरने में अभी तीन घंटे हैं, महेंद्र।"
"भैया, इंतज़ार करने वालों के लिए तीन घंटे भी तीन साल जैसे होते हैं।"
दादा जी हँस पड़े।
"सही कहा इसने।"
नंदिनी अचानक बोली,
"लेकिन एक बात बताइए..."
सबने उसकी तरफ देखा।
"अगर भैया पहले जैसे ही गुस्सैल निकले, तो?"
दादी ने तुरंत जवाब दिया,
"निकले क्या... हैं ही।"
सभी ज़ोर से हँस पड़े।
सिया चुपचाप सबकी बातें सुन रही थी।
उसने कभी आर्यवीर को देखा नहीं था।
जब वह इस घर में आई थी, तब तक आर्यवीर यूके जा चुके थे।
उसने बस इतना ही सुना था—
वह कम बोलते हैं...
अपने काम के पक्के हैं...
और गुस्सा आ जाए तो किसी की नहीं सुनते।
सिया ने मन ही मन सोचा—
"पता नहीं कैसे होंगे..."
उधर ड्रॉइंग रूम में दादा जी ने आवाज़ लगाई,
"रामू!"
"जी मालिक!"
"गाड़ी तैयार है?"
"जी... सुबह से तीन बार धो चुका हूँ।"
महेंद्र चाचा हँस पड़े।
"चौथी बार भी धो लेना... आर्यवीर को धूल बिल्कुल पसंद नहीं।"
रामू काका सिर खुजलाते हुए बोले,
"मालिक... अब ज़्यादा धोया तो रंग ही उतर जाएगा।"
पूरा कमरा ठहाकों से भर गया।
सिया भी हँसते-हँसते झुक गई।
दादी ने मुस्कुराकर कहा,
"देखा... इस घर की असली जान यही हँसी है।"
कुछ देर बाद सिया रसोई में सबके लिए चाय बनाने लगी।
सरस्वती काकी बोलीं,
"बिटिया, तू बैठ जा... आज बहुत काम कर लिया।"
"नहीं काकी, घर में खुशी का दिन है। आज काम करके भी अच्छा लग रहा है।"
उसी समय नंदिनी भागती हुई आई।
"सिया... जल्दी चल!"
"क्या हुआ?"
"भैया का वीडियो कॉल आया है!"
सिया घबरा गई।
"न... नहीं... मैं नहीं आऊँगी।"
"क्यों?"
"पहली बार मिलूँगी... वो भी वीडियो पर? नहीं।"
नंदिनी उसका हाथ पकड़कर ड्रॉइंग रूम में ले गई।
मोबाइल स्क्रीन पर एक लंबा, गंभीर और बेहद आकर्षक युवक दिखाई दे रहा था।
सफेद शर्ट, काली जैकेट, गहरी आँखें और चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं।
यही था...
डॉ. आर्यवीर सिंह राठौर।
उन्होंने सबसे पहले दादा-दादी को प्रणाम किया।
फिर माँ-पापा से हालचाल पूछा।
नंदिनी मुस्कुराई।
"भैया, आपके लिए एक सरप्राइज़ है।"
आर्यवीर ने भौंहें चढ़ाईं।
"क्या?"
नंदिनी कैमरा सिया की तरफ घुमाने ही वाली थी कि सिया घबराकर पीछे हट गई।
मोबाइल उसके हाथ से छूटते-छूटते बचा।
पूरा घर हँस पड़ा।
आर्यवीर ने बस एक पल के लिए उस लड़की की झलक देखी...
और बिना कुछ कहे स्क्रीन से नज़र हटा ली।
"मैं शाम तक पहुँच रहा हूँ।"
इतना कहकर उन्होंने कॉल काट दिया।
सिया ने राहत की साँस ली।
"हे भगवान... कितने गंभीर हैं।"
नंदिनी मुस्कुराई।
"तुमने अभी सिर्फ़ फोटो देखी है... असली तूफ़ान तो शाम को आएगा।"
शाम होने में अब कुछ ही घंटे बाकी थे...
और किसी को नहीं पता था कि आर्यवीर की घर वापसी सिर्फ़ एक बेटे की वापसी नहीं, बल्कि कई पुराने राज़ों की शुरुआत बनने वाली है।
क्रमशः...
अगले अध्याय में आर्यवीर की भव्य एंट्री, सिया से पहली आमने-सामने की मुलाकात, हल्की नोकझोंक और परिवार के साथ भावनात्मक व कॉमिक पल होंगे।
और बिना कुछ कहे स्क्रीन से नज़र हटा ली।
"मैं शाम तक पहुँच रहा हूँ।"
इतना कहकर उन्होंने कॉल काट दिया।
सिया ने राहत की साँस ली।
"हे भगवान... कितने गंभीर हैं।"
नंदिनी मुस्कुराई।
"तुमने अभी सिर्फ़ फोटो देखी है... असली तूफ़ान तो शाम को आएगा।"
शाम होने में अब कुछ ही घंटे बाकी थे...
और किसी को नहीं पता था कि आर्यवीर की घर वापसी सिर्फ़ एक बेटे की वापसी नहीं, बल्कि कई पुराने राज़ों की शुरुआत बनने वाली है।
Radhe Radhe 🦚...........