My Disable Wife Ch. 3

My Disable Wife - Chapter 3

Posted by Akanksha Rajput • Jun 18, 2026 11:56 PM

उधर शिवांश के चेहरे का रंग बदल चुका था। उसकी नजरें धीरे - धीरे केसर की तरफ उठीं और केसर वह अब भी अपनी माँ के पीछे सिमटी खड़ी थी।

अगले ही पल उसने धीरे - धीरे अपनी माँ की साड़ी का पल्लू खींचना शुरू कर दिया, जैसे बिना कुछ कहे ही उनसे वहाँ से चलने की जिद कर रही हो।

राधिका जी अपनी बेटी की इस आदत को अच्छी तरह समझती थीं। उन्होंने प्यार से उसकी तरफ देखा और हल्की मुस्कान के साथ बोलीं, " हाँ - हाँ... चलो बेटा, चलते हैं। "

फिर उन्होंने एक बार सामने खड़े शिवांश की तरफ देखा और हल्का सा मुस्कुरा दीं। हम चलते हैं, छोटे साहब।

शिवांश ने बस चुपचाप सिर हिला दिया। इसके बाद राधिका जी ने केसर को सहारा दिया और धीरे - धीरे उसके साथ वहाँ से आगे बढ़ गईं। शिवांश की नजरें अब भी जाती हुई केसर पर टिकी हुई थीं।

वह चल तो रही थी, लेकिन बहुत धीरे - धीरे... हर कदम पर अपनी माँ के सहारे के साथ। जाते - जाते अचानक केसर ने एक पल के लिए पीछे मुड़कर देखा।

उसकी नजर सीधे शिवांश से जाकर मिली। एक पल के लिए दोनों की आँखें फिर से आपस में टकराईं। लेकिन अगले ही पल केसर ने तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया और अपनी माँ के साथ वहाँ से चली गई।

शिवांश कुछ पल तक वहीं खड़ा रहा। फिर उसने गहरी साँस ली और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।

उधर राधिका जी केसर को लेकर हवेली के पीछे बने सर्वेंट एरिया में आ गईं। वहाँ लाइन से बने कई सर्वेंट रूम थे, जिनमें से एक कमरा उनका भी था।

राधिका जी पिछले कई वर्षों से इस हवेली में काम कर रही थीं। जब केसर सिर्फ चार साल की थी, तभी वह उसे अपने साथ लेकर इस घर में आई थीं और तब से यही हवेली उनके लिए रोज़ी - रोटी का सहारा बन गई थी।

कमरे में पहुँचकर उन्होंने प्यार से केसर को बेड पर बैठाया।

केसर धीरे से बेड के हेडबोर्ड से पीठ टिकाकर बैठ गई, जबकि राधिका जी उसके पास बैठ गईं। उन्होंने अपनी बेटी के चेहरे को गौर से देखा और फिर प्यार से पूछा, " तू छोटे साहब से इतना डर क्यों रही थी, बेटा ?"

वो तो बहुत अच्छे हैं। बचपन में तो तू उनके साथ कितना खेलती थी। अपनी माँ की बात सुनकर केसर की आँखों में अनायास ही पुराने दिनों की झलक उभर आई।

उसे याद आने लगा कैसे बचपन में पूरा दिन वह शिवांश के पीछे - पीछे घूमती रहती थी। कैसे दोनों हवेली के बगीचे में साथ खेलते थे। उन पुरानी यादों को याद करते हुए अनजाने में ही केसर के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान फैल गई।

उधर इतने लंबे समय बाद अपनी बेटी के होंठों पर मुस्कान देखकर जैसे राधिका जी की आँखें भर आईं। उन्होंने प्यार से उसके गाल को सहलाया और भावुक स्वर में बोलीं, " ऐसे ही मुस्कुराया कर, बेटा। "

" तुझे हँसते हुए देखकर मेरे दिल को सुकून मिलता है। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि तू हर वक्त खुद को इस कमरे में बंद करके रखती है। "

उन्होंने प्यार से उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए आगे कहा,

"अब तो छोटे साहब भी वापस आ गए हैं। तू उनसे थोड़ी बात किया कर... और सिर्फ उनसे ही नहीं, घर के बाकी लोगों से भी मिला - जुला कर। तुझे भी अच्छा लगेगा, बेटा। "

राधिका जी की बात सुनकर केसर के चेहरे पर आई मुस्कान धीरे - धीरे गायब हो गई। उसने अपनी माँ की तरफ देखा और शांत स्वर में बोली, " मुझे किसी से बात नहीं करनी, माँ.. किसी से भी नहीं मिलना मुझे, मैं ऐसे ही ठीक हूँ।"

इतना कहकर वह चुपचाप बेड पर लेट गई और धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह इस बातचीत को यहीं खत्म कर देना चाहती हो। अपनी बेटी को फिर से उसी खामोशी में खोते हुए देखकर राधिका जी के चेहरे पर एक बार फिर मायूसी छा गई।

लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और उसके बालों को सहलाने लगीं। उनकी आँखों में वही पुरानी बेबसी थी... एक माँ की बेबसी, जो अपनी बेटी को फिर से मुस्कुराते हुए देखना चाहती थी, लेकिन उसकी तकलीफों तक पहुँच पाने में खुद को असहाय महसूस करती थी।

उधर शिवांश चलते हुए आखिर अपने कमरे के सामने आकर रुक गया। कुछ पल तक वह बस बंद दरवाजे को देखता रहा। सात साल... पूरे सात साल बाद वह दोबारा इस कमरे के सामने खड़ा था।

उसने धीरे से दरवाजा खोला और अंदर कदम रखा। अंदर आते ही उसकी नजर पूरे कमरे पर घूम गई और अगले ही पल उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई।

कमरे की एक - एक चीज बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी वह छोड़कर गया था। बेड की जगह से लेकर दीवारों पर लगी तस्वीरों तक... किताबों की रैक से लेकर स्टडी टेबल पर रखी छोटी - छोटी चीजों तक, कुछ भी बदला नहीं था।

यहाँ तक कि बालकनी door के पास रखा उसका पसंदीदा आर्मचेयर भी उसी जगह पर रखा हुआ था। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वह सात साल बाद इस कमरे में वापस आया है।

बल्कि ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे वह बस कुछ दिनों के लिए बाहर गया था और अब वापस लौट आया हो।

शिवांश धीरे - धीरे कमरे के बीचों - बीच आकर खड़ा हो गया।

उसकी हल्की नीली आँखों में अनजाना सा अपनापन उतर आया। वह समझ चुका था कि उसकी गैरमौजूदगी में भी किसी ने इस कमरे की हर चीज को उतनी ही सावधानी और प्यार से संभालकर रखा था।

वह धीरे से बेड के पास गया और अपनी उँगलियाँ बेडसाइड टेबल पर फेरने लगा। धूल का एक कण तक नहीं था। यह देखकर उसके चेहरे पर हल्की सी हैरानी उभरी। " लगता है Mom आज भी मेरे कमरे का वैसे ही ख्याल रखती हैं... " उसने खुद से ही धीमे स्वर में कहा।

उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान फैल गई।

कुछ पल तक वह यूँ ही अपने कमरे में खड़ा होकर चारों तरफ देखता रहा। फिर उसने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी उतारकर बेडसाइड टेबल पर रख दी लंबे सफर की थकान अब उसके चेहरे पर साफ दिखाई देने लगी थी। उसने धीरे से उसने एक गहरी साँस ली और अपने हाथों से हल्के से गर्दन को दबाया और वॉशरूम की तरफ बढ़ गया। कुछ ही पल बाद वॉशरूम का दरवाजा बंद होने की आवाज पूरे कमरे में गूँज उठी।

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Hey lovelies! ✨

उम्मीद है आपको आज का पार्ट पसंद आया होगा। ❤️

शिवांश की वापसी के साथ कहानी में कई नए मोड़ आने वाले हैं, और कुछ पुराने राज भी धीरे-धीरे सामने आएंगे। 👀✨

अगर पार्ट अच्छा लगा हो तो अपने प्यारे से comments ज़रूर छोड़ना और कहानी को अपना प्यार और support देते रहना। 🥹💕

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