रंगीन रातें - Chapter 3( बोहोत टाईट है आह्ह्हृ... ऐसा पहली बार महसूस हुआ)
सुबह की हल्की धूप—
बंगले के बड़े-से डाइनिंग हॉल में फैल रही थी।
टेबल पर सफेद कपड़े की चादर बिछी थी—
जिस पर एक-एक करके नाश्ते की प्लेट्स सजाई जा रही थीं।
नौकर इधर-उधर घूम रहे थे—
किसी के हाथ में जूस था, किसी के हाथ में टोस्ट।
और उस पूरे माहौल के बीच—
माधूरी सिंघानिया खड़ी थी।
साड़ी में बेहद सधी हुई—
चेहरे पर वही रॉयल ठंडापन—
लेकिन आंखों में आज कुछ अलग था।
एक फैसला।
“टेबल ठीक से लगाओ…” उसने नौकर से कहा—
“सब कुछ परफेक्ट चाहिए।”
तभी—
मुख्य दरवाज़ा खुला।
अंदर आया—
विक्रम।
सूट में तैयार—
जैसे रात कुछ हुआ ही न हो।
उसके पीछे—
संजय।
दोनों भाई एक साथ अंदर आए—
लेकिन दोनों के बीच की दूरी…
आज पहले से ज्यादा थी।
माधूरी ने दोनों को देखा—
और हल्की मुस्कान दी।
“आ गए दोनों भाई…?”
विक्रम ने सिर हिलाया—
“हाँ… थोड़ा काम ज्यादा था।”
तीनों टेबल पर बैठ गए।
कुछ सेकंड तक सिर्फ चम्मचों की आवाज़ गूंजती रही—
फिर माधूरी ने सीधा सवाल किया—
“कल रात… दोनों बहुत देर से आए… ऐसा क्या काम करते रहते हो तुम लोग?”
उसकी आवाज़ सामान्य थी—
लेकिन शब्दों में हल्का सा दबाव था।
विक्रम ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया—
“माधूरी… तुम सब जानती हो… बिजनेस छोटा नहीं है… काम तो रहेगा ही।”
माधूरी ने उसकी तरफ देखा—
गहरी नजरों से।
“काम… या कुछ और?”
एक पल के लिए—
विक्रम के हाथ रुक गए।
लेकिन उसने खुद को संभाल लिया।
“तुम ज्यादा सोच रही हो…”
माधूरी हल्का सा मुस्कुराई—
लेकिन इस बार वो मुस्कान सीधी नहीं थी।
“शायद…”
फिर उसने प्लेट में पराठा रखते हुए कहा—
“पर एक पत्नी को थोड़ा वक्त देना भी ज़रूरी होता है… है ना?”
संजय चुपचाप सब देख रहा था—
उसकी नजर कभी विक्रम पर जाती—
तो कभी माधूरी पर।
माधूरी ने अचानक कहा—
“अगले हफ्ते… हम बाहर जा रहे हैं।”
विक्रम ने भौंहें चढ़ाईं—
“कहाँ?”
“कहीं भी…” माधूरी ने सहजता से कहा—
“बस तुम और मैं…”
फिर हल्का सा झुककर बोली—
“सेकंड हनीमून समझो।”
टेबल पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
संजय ने चुपचाप विक्रम की तरफ देखा—
जैसे उसकी प्रतिक्रिया पढ़ना चाहता हो।
विक्रम ने कुछ सेकंड सोचा—
फिर मुस्कुरा दिया।
“ठीक है… चलते हैं।”
माधूरी की आंखों में हल्की चमक आई—
लेकिन दिल में…
कुछ और ही चल रहा था।
“Good…” उसने धीरे से कहा।
नाश्ता खत्म हुआ—
विक्रम उठ गया।
“मुझे निकलना है…” उसने घड़ी देखते हुए कहा।
माधूरी ने बस सिर हिलाया—
“Take care…”
विक्रम बिना कुछ और बोले—
बाहर चला गया।
अब टेबल पर सिर्फ दो लोग बचे थे—
माधूरी…
और संजय।
कुछ सेकंड तक—
दोनों के बीच खामोशी रही।
उनकी नजरें मिलीं—
लेकिन ऐसा लगा जैसे—
दोनों एक-दूसरे को जानते ही नहीं।
फिर अचानक—
संजय हल्का सा हंसा।
“आइडिया अच्छा है…”
माधूरी ने भौंह उठाई—
“कौन सा?”
संजय ने कुर्सी पर पीछे टिकते हुए कहा—
“पति का वक्त पाने का…”
फिर उसकी नजर गहरी हो गई—
“लेकिन प्यार का क्या…?”
माधूरी का चेहरा एकदम सख्त हो गया।
“संजय…” उसकी आवाज़ ठंडी थी—
“बकवास बंद करो।”
संजय थोड़ा आगे झुका—
“मैं बकवास नहीं कर रहा… सच बोल रहा हूँ…”
“आप जानती हैं ना… भैया बदल गए हैं…”
माधूरी ने उसकी बात काट दी—
“जाओ यहां से।”
संजय हंसा नहीं—
इस बार उसकी आंखों में गंभीरता थी।
“आप खुद को धोखा दे रही हैं…”
माधूरी ने उसकी तरफ घूरा—
“और तुम…?”
“तुम क्या कर रहे हो संजय?”
सवाल सीधा था—
और इस बार…
संजय के पास तुरंत जवाब नहीं था।
माधूरी धीरे-धीरे उठी—
उसकी चाल में अब रॉयल्टी से ज्यादा—
खतरा था।
“मुझे सब पता चल जाएगा…” उसने धीरे से कहा—
“कौन किसके साथ खेल खेल रहा है…”
फिर वो मुड़ी—
और जाते-जाते बोली—
“और जब मुझे सच्चाई पता चली ना…”
उसकी आवाज़ धीमी थी—
लेकिन खतरनाक—
“तो ये घर… रणभूमि बन जाएगा।”
संजय वहीं खड़ा रह गया—
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई—
“बस यही तो चाहिए…”
उसने खुद से कहा।
उधर—
ऑफिस की तरफ जाते हुए—
विक्रम कार में बैठा था—
लेकिन उसका ध्यान ड्राइव पर नहीं था—
बल्कि—
रिया पर था।
उसकी मुस्कान…
उसकी बातें…
सब कुछ उसके दिमाग में घूम रहा था।
वो धीरे से बोला—
“रिया…”
लेकिन उसे नहीं पता था—
कि जिस खेल को वो अपने कंट्रोल में समझ रहा है—
वो असल में…
उसके हाथ से निकल चुका है।
और इस खेल में—
हर कोई…
किसी न किसी को धोखा दे रहा है।
अब बस इंतजार था—
पहली चाल के खुलने का… 🔥
ऑफिस—सुबह के करीब 11 बजे।
“सिंघानिया कॉर्प” का माहौल हमेशा की तरह बिज़ी था—
लेकिन आज…
रिया के केबिन में एक अलग ही सन्नाटा था।
रिया अपनी कुर्सी पर बैठी थी—
लैपटॉप खुला था सामने—
लेकिन उसकी नजर स्क्रीन पर नहीं…
दरवाज़े पर थी।
जैसे वो किसी का इंतज़ार कर रही हो।
तभी—
दरवाज़ा बिना नॉक किए खुला।
विक्रम अंदर आया।
उसके चेहरे पर हल्की सी जल्दी थी—
और आंखों में वही ठंडी चमक।
रिया ने उसे देखते ही हल्का सा मुस्कुरा दिया—
“गुड मॉर्निंग, सर…”
विक्रम ने दरवाज़ा बंद किया—
और सीधे उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
“रिया… हमें बात करनी है।”
उसकी आवाज़ धीमी थी—
लेकिन उसमें एक अलग ही गंभीरता थी।
रिया ने कुर्सी से उठते हुए कहा—
“इतनी सीरियस आवाज़… क्या हुआ?”
विक्रम ने एक सेकंड के लिए उसकी आंखों में देखा—
फिर धीरे से बोला—
“माधूरी… अगले हफ्ते मेरे साथ बाहर जाना चाहती है।”
रिया की भौंह हल्की सी उठी—
फिर उसके होंठों पर मुस्कान आ गई।
“ओह… सेकंड हनीमून?”
विक्रम ने सिर हिलाया—
“हाँ…”
रिया कुछ पल चुप रही—
फिर धीरे-धीरे उसके पास आई।
“तो ये तो और भी अच्छा है…”
विक्रम ने हल्का सा चौंककर पूछा—
“अच्छा?”
रिया ने उसकी टाई को हल्का सा सीधा करते हुए कहा—
“एक हफ्ता… सिर्फ आप और वो…”
फिर उसकी आंखों में देखते हुए बोली—
“यानी आपको पूरा मौका मिलेगा…”
विक्रम की आंखों में सवाल था—
“किस बात का?”
रिया उसके और करीब आ गई—
उसकी आवाज़ अब फुसफुसाहट में बदल चुकी थी—
“उसे बहलाने का… भरोसा जीतने का…”
फिर हल्की मुस्कान के साथ—
“और उसकी पूरी प्रॉपर्टी अपने नाम करने का…”
विक्रम कुछ सेकंड तक चुप रहा—
रिया ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा—
“आप पहले से यही चाहते थे ना…?”
विक्रम ने गहरी सांस ली—
“हाँ… लेकिन…”
“लेकिन क्या?” रिया ने तुरंत पूछा।
विक्रम की आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई—
“रिस्क है…”
रिया हल्का सा हंसी—
“रिस्क तो हर गेम में होता है, सर…”
फिर उसने थोड़ा झुककर कहा—
“बस चाल सही चलनी चाहिए…”
कमरे में एक पल के लिए खामोशी छा गई।
विक्रम अब उसे देख रहा था—
जैसे पहली बार समझ रहा हो…
कि ये लड़की सिर्फ खूबसूरत नहीं—
खतरनाक भी है।
रिया ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“आप बस उसे इमोशनली अपने कंट्रोल में ले आओ…”
“बाकी… मैं संभाल लूंगी।”
विक्रम की आंखों में अब लालच साफ दिख रहा था।
“और उसके बाद…?” उसने धीरे से पूछा।
रिया मुस्कुराई—
“उसके बाद… सब कुछ आपका होगा…”
फिर हल्का सा रुककर—
“और आप… मेरे।”
दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे—
जैसे कोई खतरनाक डील फाइनल हो रही हो।
विक्रम धीरे-धीरे उसके और करीब आया—
इतना करीब—
कि दोनों की सांसें फिर से टकराने लगीं।
उसने हल्के से रिया के कंधे पर अपने होंठ रख दिए।
रिया की सांसें एक पल को तेज हुईं—
लेकिन इस बार उसने खुद को पीछे नहीं हटाया।
उसने बस आंखें बंद कर लीं—
“सर…” उसने धीमे से कहा—
“कोई आ जाएगा…”
विक्रम ने हल्का सा मुस्कुराकर फुसफुसाया—
“डर तो उसे लगता है… जिसके पास खोने के लिए कुछ हो…”
रिया के होंठों पर हल्की मुस्कान आई—
लेकिन तभी—
दरवाज़े पर नॉक हुआ।
दोनों एकदम अलग हो गए।
“Come in…” रिया ने तुरंत खुद को संभालते हुए कहा।
दरवाज़ा खुला—
मैनेजर अंदर आया।
“Ma’am… ये फाइल साइन करनी थी…”
उसकी नजर एक सेकंड के लिए दोनों पर गई—
जैसे उसे कुछ अजीब महसूस हुआ हो—
लेकिन उसने कुछ कहा नहीं।
रिया ने तुरंत प्रोफेशनल टोन में कहा—
“हाँ… रख दीजिए…”
विक्रम पीछे हट चुका था—
उसने अपनी घड़ी देखी—
और सामान्य आवाज़ में बोला—
“मीटिंग के लिए लेट हो रहा हूँ…”
मैनेजर ने सिर हिलाया—
“जी सर…”
विक्रम बिना पीछे देखे—
केबिन से बाहर चला गया।
दरवाज़ा बंद होते ही—
रिया ने गहरी सांस ली—
और हल्का सा मुस्कुराई।
“गेम शुरू हो चुका है…” उसने खुद से कहा।
लेकिन—
उसे नहीं पता था—
कि इस गेम में…
हर चाल पर कोई न कोई नजर रखे हुए है… 🔥