रंगीन रातें Ch. 1

रंगीन रातें - Chapter 1( आह्ह्हृ... और जोर से)

Posted by Moon Star • Apr 15, 2026 10:11 PM

रात के करीब 8 बजे—

शहर की सबसे ऊंची बिल्डिंग के 20वें फ्लोर पर—

“सिंघानिया कॉर्प” का ऑफिस अभी भी रोशनी में डूबा हुआ था।

बाहर सब कुछ शांत था…

लेकिन अंदर—

एक ऐसा खेल चल रहा था…

जिसमें प्यार नहीं, सिर्फ लालच और धोखा था।

केबिन के अंदर—

जहां… विशाल कांच की दीवारों के बीच—

विक्रम सिंघानिया अपनी कुर्सी पर बैठा था।

40 साल की उम्र—

सूट में बेहद पावरफुल—

लेकिन आंखों में…

सिर्फ एक ही चीज थी—

लालच।

उसके सामने—

टेबल के किनारे हल्का झुककर खड़ी थी—

उसकी सेक्रेटरी—

रिया।

21 साल—

खूबसूरती ऐसी कि नजर टिक जाए…

लेकिन उसकी मुस्कान—

सीधी नहीं थी।

उसमें भी एक खेल छुपा था।

रिया ने धीरे से फाइल टेबल पर रखी—

लेकिन हाथ वहीं रोक दिया…

उसकी उंगलियां विक्रम की उंगलियों को हल्का सा छू गईं।

कमरे में एक अजीब-सी खामोशी छा गई।

विक्रम ने उसकी तरफ देखा—

हल्की मुस्कान के साथ बोला—

“रिया… तुम जानती हो ना… ये ऑफिस है…”

रिया ने बिना नजर हटाए जवाब दिया—

“ऑफिस है… या हमारा सीक्रेट प्लेस… ये तो आप ही तय करते हो, सर…”

उसकी आवाज़ धीमी थी—

लेकिन सीधी दिल में उतर रही थी।

विक्रम कुर्सी से थोड़ा आगे झुका—

“तुम्हें डर नहीं लगता… अगर किसी ने देख लिया तो?”

रिया हल्के से हंसी—

“डर तो उसे लगता है… जिसके पास खोने के लिए कुछ हो… मेरे पास तो सिर्फ पाने के लिए है…”

उसकी ये बात सुनकर—

विक्रम की आंखों में चमक आ गई।

“और क्या पाना चाहती हो तुम?” उसने गहरी आवाज़ में पूछा।

रिया ने उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा—

“आप…”

फिर एक सेकंड रुककर—

“और वो सब… जो आपका है…”

कमरे में हवा जैसे भारी हो गई।

विक्रम धीरे से उठा—

उसके करीब आया—

इतना करीब कि दोनों की सांसें टकराने लगीं।

“रिया… तुम जानती हो ना… मैं शादीशुदा हूं…”

रिया ने बिना पीछे हटे कहा—

“शादी… सिर्फ एक कागज होती है सर… दिल तो कहीं और भी लग सकता है…”

विक्रम हल्का सा मुस्कुराया—

“दिल नहीं रिया… ये खेल सिर्फ दिमाग से खेला जाता है…”

रिया ने उसकी टाई को हल्का सा पकड़ते हुए कहा—

“तो फिर दिमाग से ही सही… उस औरत को अपनी जिंदगी से निकाल दीजिए…”

विक्रम की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

उसकी आंखों में अब ठंडापन आ गया।

“तुम समझ नहीं रही हो… वो औरत… सिर्फ मेरी पत्नी नहीं है…”

“तो क्या है?” रिया ने तुरंत पूछा।

विक्रम ने धीरे से कहा—

“मेरी सबसे बड़ी चाबी है…”

रिया ने भौंहें सिकोड़ लीं—

“मतलब?”

विक्रम ने खिड़की की तरफ देखते हुए कहा—

“50 साल की है… लेकिन करोड़ों की मालकिन है… मैंने उससे शादी प्यार के लिए नहीं की…”

उसने मुड़कर रिया की तरफ देखा—

“उसकी दौलत के लिए की है…”

रिया के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आई—

“तो फिर इंतजार किस बात का है?”

विक्रम ने गहरी सांस ली—

“क्योंकि अभी वो जिंदा है…”

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।

रिया की आंखों में चमक आई—

लेकिन इस बार वो और भी खतरनाक थी।

“तो… उसे जिंदा क्यों रहने दे रहे हो?” उसने धीरे से कहा।

विक्रम ने उसकी तरफ देखा—

उसकी आंखों में अब कोई हिचक नहीं थी।

“क्योंकि… सही वक्त का इंतजार कर रहा हूं…”

रिया ने उसके और करीब आकर कहा—

“या फिर… आप डर रहे हो?”

विक्रम हल्का सा हंसा—

“विक्रम सिंघानिया… कभी डरता नहीं…”

“तो फिर साबित कर दो…” रिया ने फुसफुसाते हुए कहा।

दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे—

जैसे कोई फैसला हो रहा हो।

लेकिन—

उन्हें नहीं पता था—

कि इस खेल में वो अकेले नहीं हैं।

उसी वक्त—

ऑफिस के दूसरे हिस्से में—

अंधेरे में खड़ा एक शख्स—

सब कुछ देख रहा था।

संजय सिंघानिया।

30 साल—

विक्रम का छोटा भाई…

और बिजनेस पार्टनर।

उसकी आंखों में गुस्सा था…

लेकिन दिल में—

कुछ और भी।

उसने मुट्ठी भींच ली—

“भैया… आप इतना गिर जाओगे… सोचा नहीं था…”

फिर उसकी नजर—

रिया पर गई।

और उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।

“और तुम रिया… तुम तो खेल और भी बड़ा खेल रही हो…”

उसने धीरे से कहा—

“क्योंकि तुम सिर्फ भैया के करीब नहीं आ रही हो…”

“तुम तो पहले से ही मेरे दिल के करीब हो…”

उसकी आंखों में अब एक अजीब-सी चमक थी—

प्यार… या बदला…

समझना मुश्किल था।

उधर—

शहर के एक बड़े बंगले में—

माधूरी सिंघानिया—

विक्रम की पत्नी—

आईने के सामने खड़ी थी।

50 साल की उम्र—

लेकिन शख्सियत आज भी मजबूत।

उसने अपने चेहरे को ध्यान से देखा—

फिर धीरे से बोली—

“विक्रम… तुम बदल रहे हो…”

उसकी आंखों में हल्की नमी थी—

माधूरी ने फोन उठाया—

आवाज़ आई… ठंडी… लेकिन साफ—

“भाभी… आप जानती भी हो यहां क्या चल रहा है?”

माधूरी का दिल एक पल को रुक गया।

“कौन… संजय?” उसने पहचान लिया।

“हाँ… और काश मैं ये सब न जानता…” उसकी आवाज़ में कड़वाहट थी।

माधूरी ने खुद को संभालते हुए पूछा—

“सीधे-सीधे बोलो संजय… क्या कहना चाहते हो?”

उधर से हल्की हंसी आई—

“भाभी… भैया ऑफिस में काम नहीं कर रहे… खेल खेल रहे हैं…”

माधूरी की उंगलियां फोन पर कस गईं—

“किस तरह का खेल?”

संजय ने धीरे-धीरे हर शब्द बोला—

“जिसमें आपकी जगह… कोई और ले रही है…”

कमरे की दीवारें जैसे घूमने लगीं।

“झूठ…” माधूरी की आवाज़ कांपी—

“विक्रम ऐसा नहीं कर सकता…”

“मैं झूठ बोलूं… या आप सच्चाई से भाग रही हो?” संजय ने तीखा जवाब दिया।

कुछ सेकंड की खामोशी के बाद—

माधूरी की आंखों में आंसू नहीं थे अब…

सिर्फ एक ठंडा फैसला था।

“ठीक है…” उसने धीरे से कहा—

“अब मैं खुद देखूंगी… कौन किसकी जगह ले रहा है…”

फोन कट गया—

और उसी पल—

एक तूफान उठ चुका था… 🔥

ऑफिस के केबिन में—

खामोशी और भी गहरी हो चुकी थी।

विक्रम ने बिना कुछ कहे—

रिया को अपनी बाहों में खींच लिया।

रिया एक पल के लिए चौंकी—

लेकिन फिर खुद को उसके करीब आने दिया।

विक्रम का हाथ उसकी पीठ पर कस गया—

और उसने धीरे से उसके कंधे पर अपने होंठ रख दिए।

रिया की सांसें तेज हो गईं—

“सर… ये सही नहीं है…” उसने हल्की आवाज़ में कहा—

लेकिन उसके शब्दों में रोक से ज्यादा चाहत थी।

विक्रम ने उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया—

“इस खेल में सही-गलत कुछ नहीं होता…”

रिया ने आंखें बंद कर ली—

जैसे वो खुद भी इस आग में कूदने का फैसला कर चुकी हो।

तभी विक्रम ने रिया कि स्कर्ट में हाथ डालने लगा , रिया कि सांसें तेज हो रही थी ,

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