His Revenge's Mistress Ch. 3

His Revenge's Mistress - Chapter 3

Posted by Akanksha Rajput • Mar 30, 2026 06:55 PM

उसकी यह बात सुनकर उसकी माँ थोड़ी उलझन में पड़ गईं।

वो उसे गौर से देखते हुए बोलीं — “ भेजती रहोगी … मतलब ? ”

मानसी ने एक पल के लिए नज़रें झुका लीं, फिर खुद को संभालते हुए बोली — “ मम्मी… जिस कंपनी में मैं इंटर्नशिप कर रही थी ना, उन्होंने मुझे अपनी एक ब्रांच में जॉब ऑफर की है। ”

उसकी माँ ध्यान से उसकी बात सुन रही थीं। मानसी धीरे से आगे बोली — “ उनकी वो ब्रांच नोएडा में है… तो मुझे वहीं रहकर जॉब करनी होगी। ”

यह सुनते ही उसकी माँ के चेहरे की खुशी थोड़ी धीमी पड़ गई। उन्होंने मानसी को देखते हुए धीमे स्वर में कहा — “ मतलब… तू हमसे दूर रहेगी बेटा ? ”

मानसी तुरंत हल्की-सी मुस्कान लाकर बोली — “ अरे मम्मी… मैं इतनी भी दूर कहाँ जा रही हूँ। नोएडा ही तो है, जब भी छुट्टी मिलेगी मैं आपसे मिलने आती रहूँगी। ”

वह थोड़ा रुककर बोली — “ और मम्मी… जॉब के लिए तो ये सब करना ही पड़ेगा न फिर कुछ टाइम बाद मेरी सेलरी भी बढ़ जाएगी ”

फिर जैसे उन्हें समझाने के लिए बोली — “ आपको याद है ना शिवानी? उसकी जॉब भी तो ऐसे ही लगी थी… उसे भी बाहर आपने घर से दूर रहना पड़ता है। ”

उसकी माँ कुछ पल चुप रहीं। उनकी आँखों में हल्की चिंता साफ दिखाई दे रही थी, वो धीरे से बोलीं — “ बेटा… तू वहाँ अकेली कैसे रहेगी ? ”

मानसी ने मुस्कान के साथ उनकी तरफ देखा और समझाते हुए बोली — “ मम्मी … मैं अकेली नहीं रहूँगी। कंपनी की तरफ से वहाँ PG facility दी गई है, जहाँ और भी कई employees रहेंगे। धीरे - धीरे उनसे दोस्ती भी हो जाएगी। आप मेरी चिंता मत कीजिए। ”

उसकी माँ ने थोड़ी राहत की साँस ली और कहा — “ ठीक है बेटा… समझ गई। फिर… कब जाओगी तुम वहाँ ? ”

मानसी को तभी समर की बात याद आई, आज रात टाइम से आ जान। कुछ पल रुककर उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा — “ मम्मी… कल से मेरी joining है। मैं आज रात ही निकल जाऊँगी। ”

उसकी माँ थोड़ी हैरानी से बोली — “ आज ही ? ”

मानसी ने सिर हिलाया — “ हाँ मम्मी।… आज ही। ताकि कल सुबह मैं समय पर पहुँँच सकूँ। ”

माँ ने उसकी आँखों में झाँककर धीरे से कहा — “ ठीक है बेटा…  "

मानसी ने धीरे से अपनी जगह से उठते हुए कहा — “ मम्मी… मैं थोड़ी देर room में जा कर आराम कर लेती हु।”

उसकी माँ ने धीरे से हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला दिया। मानसी ने बिना कुछ बोले कमरे की तरफ बढ़ी और कमरे के अंदर आकर दरवाज़ा बंद कर लिया। कमरे में पहुँचते ही वो बेड के पास आकर बिस्तर पर पेट के बल लेट गई। धीरे - धीरे उसकी आँखों में वो आँसू फिर से छलकने लगे… जो अब तक उसने रोक रखे थे।

वो खुद से धीरे - धीरे कहने लगी — “ मुझे माफ कर देना मम्मी… मैंने आपसे झूठ बोला। ” आँसू उसके गालों से बहने लगे, और वो कुछ देर तक सिर्फ़ अपने दर्द और हल्की - सी बेचैनी के साथ बिस्तर पर पड़ी रही।

रात के करीब 8 बजे मानसी अपने सूटकेस की पट्टियाँ संभालकर धीरे - धीरे घर के दरवाज़े की ओर बढ़ी। उसकी माँ उसके पीछे आईं, आँखों में हल्की चिंता और प्यार झलक रहा था। उन्होंने उसे रोका और धीरे से कहा — “ बेटा … मैं तुम्हारे साथ चलती हूँ, बस तुम्हें bus stand तक छोड़ दूँगी। ”

मानसी ने पीछे मुड़कर उनकी आँखों में देखा। हल्की मुस्कान के साथ उसने सिर हिलाया और धीरे-धीरे कहा — “ मम्मी… आप परेशान मत हों। अगर आप मेरे साथ आएँगी तो भाई और बहन घर में अकेले रहेंगे। मैं अकेली ही निकलती हूँ, सब ठीक रहेगा। ”

उसकी माँ थोड़ी देर चुप रहीं। मानसी ने सूटकेस उठाया और जाते - जाते अपनी माँ को आश्वासन दिया — “ मम्मी… मैं पहुँच कर तुरंत आपको कॉल कर दूँगी। आप चिंता मत कीजिए। ”

माँ ने सिर हिला दिया, लेकिन आँखों में थोड़ी फिक्र अभी भी थी। मानसी ने घर का दरवाज़ा खोलकर सड़क की ठंडी रात में अपने सूटकेस के साथ कदम रखा। हवा में हल्की नमी थी, और उसके दिल की धड़कन तेज थी। लेकिन अंदर से वह शांत थी — जैसे हर चुनौती का सामना करने को तैयार हो।

घर से थोड़ी दूर चलते ही उसने अपने फोन में address चेक किया। उसकी आँखों में हल्की चिंता झलक रही थी, लेकिन उसने हिम्मत बाँधकर टैक्सी रोकी और ड्राइवर को पता बताया।

पर टैक्सी ड्राइवर ने वहां जाने से मना कर दिया।

फिर उसने दूसरी टैक्सी, तीसरी, चौथी… कुल मिलाकर पाँच - छह टैक्सी पूछीं, लेकिन हर बार जवाब वही था — जगह थोड़ी दूर है।

मानसी के लिए ये जगह किसी तरह से achhi भी थी और परेशान करने वाली भी। अच्छी इसलिए कि वहाँ उसकी माँ का कोई आना - जाना नहीं था; वैसे भी, उसकी माँ घर से ज्यादा बाहर नहीं जाती थीं। लेकिन परेशान करने वाली इसलिए कि उसे अभी टैक्सी नहीं मिल रही थी और उसे समर के दिए गए टाइम पर पहुंचना था। उसे टैक्सी न मिलने की वजह से पहले ही थोड़ी देर हो गई थी।

कुछ देर तक सड़क के किनारे खड़ी रहने के बाद आखिरकार एक टैक्सी वहाँ आकर रुकी। मानसी ने जल्दी से ड्राइवर को वही address बताया। ड्राइवर ने एक पल सोचा, फिर हल्का-सा सिर हिलाकर बोला — “ ठीक है मैडम… बैठ जाइए। ”

मानसी ने राहत की साँस ली और अपना सूटकेस उठाकर टैक्सी की पिछली सीट पर बैठ गई। टैक्सी धीरे - धीरे रात की सड़कों पर आगे बढ़ने लगी। बाहर स्ट्रीट लाइट्स की पीली रोशनी शीशे से होकर अंदर गिर रही थी, और मानसी खिड़की के बाहर चुपचाप देखती रही।

उसके मन में कई उलझे हुए ख्याल एक साथ घूम रहे थे। वह सोच रही थी कि उसने अभी.- अभी अपनी माँ से कितना बड़ा झूठ कहा है… उसने उनसे कहा कि वह नोएडा में जॉब करने जा रही है और वहीं रहेगी।

लेकिन सच्चाई कुछ और ही थी। असल में उसे कहीं और नहीं, बल्कि यहीं दिल्ली में समर के farmhouse पर रहना था… उसी के साथ। यह सोचते ही उसके दिल में हल्की - सी घबराहट दौड़ गई। उसने धीरे से अपनी उँगलियाँ आपस में कस लीं और आँखें कुछ पल के लिए बंद कर लीं।

थोड़ी देर के सफर के बाद टैक्सी धीरे - धीरे एक सुनसान - सी सड़क पर आकर रुक गई।

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Hey my lovely readers ❤️

तो आखिर मानसी पहुँच गई उस जगह जहाँ से उसकी ज़िंदगी का नया और खतरनाक मोड़ शुरू होने वाला है। क्या होगा आगे और जब उसकी माँ को सच्चाई पता चलेगी, तब क्या होगा ?

इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए पढ़ते रहिए His Revenge Mistress… और बताइए, अभी तक आपको कहानी कैसी लग रही है? अपने thoughts ज़रूर share कीजिए 💬

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