प्रीतम का कुछ दोष नही है...!! ❤️‍🔥 Ch. 2

प्रीतम का कुछ दोष नही है...!! ❤️‍🔥 - Chapter 2

Posted by 𝐏𝐨𝐨𝐣𝐚 𝐉𝐚𝐝𝐡𝐚𝐯 • Feb 03, 2026 02:36 PM

“ये!! तुम्हारी इतनी हिम्मत…?”

विराज को इस कदर थरथराते देख उसकी माँ शकुंतला देवी कुछ कहने ही वाली थीं कि उसी पल—

क्लिक… क्लैक…!

लोड होती गन की आवाज़ ने पूरे माहौल की साँसें थाम दीं।

देवांश की उँगली ट्रिगर पर थी…

और नज़रें—

ठंडी, निःसंवेदन…

सीधे शकुंतला देवी पर टिकी हुई।

“साइलेंस…!

डोंट शाऊट लाईक अ स्ट्रीट डॉग्स...”

उसकी आवाज़ में कोई ऊँच-नीच नहीं थी,

पर हर शब्द में ऐसी दहशत घुली थी

कि सामने वाला जिंदा जल जाने की कल्पना से ही काँप जाए।

उसकी आँखों में अंगारे धधक रहे थे—

मानो अभी, इसी पल,

पूरे हॉल को राख कर देगा।

“रॉबिन…सारे दरवाज़े बंद कर दो।

एक भी इंसान—

इस हॉल से बाहर नहीं जाना चाहिए।”

उसकी आवाज़ शेर की दहाड़ बनकर

पूरे हॉल में गूँज उठती है ।

आदेश मिलते ही रॉबिन और गार्ड्स हर दरवाज़ा, हर खिड़की बंद कर देते हैं।

अब वहाँ से परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।

“देवांश…”

विराज हिम्मत जुटाकर आगे बढ़ता है,

“बिज़नेस अलग होता है…

और पर्सनल लाइफ अलग।

तुम मेरे शुभ काम में अड़चन डाल रहे हो।” विराज बोल ही रहा था की....

देवांश के होंठों पर

एक तिरछी, ज़हरीली मुस्कान उभरती है।

“तुम्हारे मुँह से

ये शब्द अच्छे नहीं लगते, विराज…

चालें चलने की आदत तुम्हें है।”

विराज की तरफ देख देवांश बोल रहा होता है....

वो एक कदम आगे बढ़ता है।

“याद है मैंने कहा था…

तुमने जो खेल रचा है ना—

उसका अंजाम

मैं लिखूँगा।”

“शादी चल रही है…”

उसकी आवाज़ और ठंडी हो जाती है।

“ये लोग शादी में शामिल होने आये है...

तो शादी होगी।

ज़रूर होगी।”

इतना कहकर

वो विराज के गले से गठबंधन का दुप्पटा खींचता है

और अपने गले में डाल लेता है।

और बस्स...!! एक पल में—

पूरा हॉल सन्न हो जाता है ।

हर आँख फटी की फटी रह जाती है।

फुसफुसाहटें डर में बदल जाती हैं।

कादंबरी… उसके काका-काकू…

सब पत्थर बने खड़े थे।

लेकिन जैसे ही दुप्पटा देवांश के गले में पड़ता है—

कादंबरी के शरीर में

डर की लहर दौड़ जाती है। दर के मारे उसकी तो सांस ही गले मै अटक जाती है...

“अब तुम्हें समझ आएगा, विराज…”

देवांश उसके बिल्कुल करीब आकर

उसकी आँखों में आँखें डाले खडा था ।

“जब अपने ही लोग

आपसे छिन जाएँ—

तो उसका दर्द क्या होता है।”

देवांश की आँखों में

सिर्फ़ एक चीज़ दिखाई दे रही थी—

बदला।

“देवांश!!”

विराज की आवाज़ टूटने लगती है।

“ तुम्हारा ग़ुस्सा मुझ पर है…

कादंबरी को इसमें मत घसीटो।

अगर गुनहगार मैं हूँ

तो सज़ा भी मुझे ही दो…

आई बेग यू… लेट हर गो!!”

विराज देवांश के सामने गिडगीडा रहा था...

कादंबरी—

वो पहली लड़की थी

जिसे विराज ने दिल से चाहा था।

या शायद वो यही मान बैठा था। वो उसे पाना चाहता था…

और सब कुछ उसके मुताबिक चल भी रहा था— जब तक देवांश वहा नही आया था ।

देवांश कुटिल मुस्कान के साथ विराज को देखता है

और फिर उसके कदम कादंबरी की ओर बढ़ने लगते है

उसे अपनी तरफ़ आते देख कादंबरी डर के मारे ना में सिर हिलाते हुए पीछे हटने लगती है…

उसके मुँह से एक भी शब्द नहीं निकल पा रहा था…

वो बुरी तरह डर चुकी थी…

देवांश के कदम मगर तेज़ी से उसी की ओर बढ़ रहे थे…

कादंबरी चलते-चलते स्टेज के बिल्कुल किनारे आकर खडी थी...

अब बस एक कदम, और वो सीधे नीचे गिर जाएगी!! यह सोचकर देवांश एक पल के लिए वहीं ठहर जाता है…

उसकी पूरी नज़र कादंबरी के पैरों पर टिकी हुई थी…

अभी तक उसने कादंबरीके चेहरे की ओर देखा भी नहीं था…

वो रुकता है तो कादंबरी के कदम भी वहीं थम जाते हैं…

उसे रुका देख देवांश फिर से उसकी ओर बढ़ता है…लेकिन उसे फिर अपनी तरफ़ आते देख कादंबरी एक और कदम पीछे लेती है… और उसका संतुलन बिगड़ता है…

वो गिरने ही वाली होती है कि देवांश झपट्टा मारकर उसका हाथ पकड़ लेता है और उसे अपनी ओर खींच लेता है…

नाजूकसी कादंबरी हवा की रफ्तार से उसकी ओर खिंच जाती है…

पल भर में क्या हुआ, उसे समझ ही नहीं आता…

गिरने के डर से उसकी तो आँखें बंद थीं…

जब आँखें खोलती है तो सामने एक मजबूत, चौड़ी छाती होती है…

उसकी लंबाई के मुकाबले कादंबरी बहुत छोटी थी…

इसलिए उसके पास वो बिल्कुल बच्ची-सी लग रही थी…

उसका सिर बस उसके बाजू तक ही पहुँच पा रहा था…

वो ऊपर देखती है—

देवांश जबड़ा भींचे गुस्से से

कहीं दूर देख रहा था।

वो खुद को उससे अलग करने कोशिश करने लगती है पर हो नही पाती क्यूकी उसका हाथ अब भी देवांश की गिरफ़्त में था।

बिना वक्त दिए देवांश उसे घसीटते हुए

सीधे अग्निकुंड की ओर ले जाता है।

उसकी साड़ी का पल्लू अपने गले के दुप्पटे से बाँधकर उसकी कल्लाई और कसकर पकड लेता है....

“ पंडितजी आपको क्या

शादी शुरू करने का न्योता दूँ?”

डरे-सहमे पंडित काँपते हुए आगे आते हैं और मंत्र शुरू करते हैं।

देवांश की नज़र अब भी विराज पर थी।

“विराज…”

जैसे ही वो सात फेरों के लिए कदम बढ़ाता है—

पीछे से कादंबरी की बहुत धीमी आवाज़ उसके कानों से टकराती है। और गुस्से में उसकी पकड़ उसके हाथ पर जोर से कस जाती है।

उसकी वजह से छन्न.... से उसके हाथ की चूड़ियाँ तुटकर नीचे बिखर जाती है ।

“स्स्स…”

खून की पतली धार

कादंबरी के कलाई से बहने लगती है।

“देवांश… प्लीज़…”

वो खून की धार देख विराज चीख पड़ता है।

“उसे दर्द हो रहा है!!”

दुखी आवाज में विराज बोल रहा होता है की....

अगले ही पल—

धाँय!

गोली सीधे विराज के कंधे में घूस जाती है....

गनशॉट की आवाज सन्नाटे को चीरकर गई थी ।

पलक झपकते ही विराज स्टेज से नीचे गिर पड़ता है—

खून में लथपथ।

उसका ये हाल देखकर तो कादंबरी दंग हो जाती है।

पुरा हॉल जेसे सुन्न हो गया था....

“विराजsss…!!”

विराज के माँ-बाप रोते हुए उसकी ओर दौड़ते हैं।

उसकी हालत देखकर कादंबरी की दुनिया भी घूमने लगती है।

“वी…” उसे दर्द में देख वो उसकी ओर बढ़ती है— लेकिन देवांश

झटके से उसे रोक लेता है।

“एक भी कदम उसकी तरफ़ बढ़ाया ना…”

बोलते बोलते उसकी गन उसके भाई की ओर उठ जाती है।

“तो यहाँ खून की नदियाँ बहेंगी।” कादंबरी के आँखो में आँखे डालकर देवांश उसे धमकता है....

कादंबरी बुरी तरह टूट जाती है। रोते-रोते वोधडाम से घुटनों पर गिर पड़ती है....

मजबूरी में देवांश के साथ

सात फेरे लेने पडते है ।

हर फेरे के साथ उसके आँसू

ज़मीन पर गिरते जाते हैं.... देवांश सब सुन रहा था—

पर कुछ महसूस नहीं कर रहा था।

बदले की आग में एक लड़की की ज़िंदगी

कुर्बान हो चुकी थी।

अब…शादी के बाद

कादंबरी की कहानी

क्या मोड़ लेगी?

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