Vachan se badhe do dilo ki mahobbat - Chapter 1
बाहर आसमान में बिजली कड़क रही थी और बरसने वाला बादल जैसे किसी पुराने इतिहास को दोहराने की कोशिश कर रहा है।
राजस्थान के सबसे बड़े हस्पताल की सफेद दीवारों के बीच राजस्थान के दो बड़े राजपूत घरानों के मुखिया ठाकुर विक्रम सिंग (जोधपुर)ओर दिग्विजय प्रताप सिंग(उदयपुर) खड़े थे।
वो दोनों बचपन के पके दोस्त थे।
आज दोनों के घरों में एक साथ खुशियां आने वाली थी।
वो दोनों वार्ड के बाहर खड़े उसी खुशी का इंतजार कर रहे थे।
साथ ही दोनों का परिवार भी भी मौजूद था।
थोड़ी देर में एक नर्स अपने हाथ में एक छोटे से बच्चे को लेकर आई।
नर्स: मुबारक हो हुक्म सा आपके घर पोते ने जन्म लिया है।
नर्स की बात सुन दिग्विजय प्रताप सिंग की खुशी का कोई ढिकाना नहीं था।
वो अपने पोते को हाथ में लेकर उसे गौर से देखने लगे।
ओर बारी बारी सारे परिवार वाले बच्चे से मिले।
कुछ देर बाद एक दूसरी नर्स अपने हाथ में एक बच्चा लेकर आई।
नर्स: मुबारक हो ठाकुर साहब आपके घर लक्ष्मी आई है।
नर्स की बात सुन विक्रम सिंग ठाकुर की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।
उन्होंने उस नन्ही सी जान को अपने हाथों में लिया । ओर उसे बड़े प्यार से देखने लगे।
कुछ देर बाद।
ठाकुर विक्रम सिंग ओर दिग्विजय प्रताप सिंग एक दूसरे से गले मिल रहे थे।
दोनों के घर आज एक ही दिन खुशियों आई थी।
एक के घर कुंवर ने जन्म लिया तो दूसरे के घर बाईसा (राजकुमारी) ने।
विक्रम सिंग अपनी मूंछों को ताव देते हुए कहते है
विक्रम सिंग जी: दिग्विजय आज से हमारी दोस्ती रिश्ते दारी में बदल गई। मेरी पोती ओर तेरे पोते का रिश्ता आज ही तय समझो।
दिग्विजय सिंग मुस्कुराते हुए: वचन रहा विक्रम ये रिश्ता हमारे खानदान की सान बनेगा।
ओर तेरी पोती मेरे पोते की पत्नी।
दोनों दोस्तो ने खुश होकर एक दूसरे से हाथ मिलाया।
ओर उसी वक्त आसमान में तेज बिजली कड़की जैसे खुद भगवान ने उनके इस वचन पर मोहर लगा दी हो।
10 दिन बाद।
आज दोनों बच्चे 10 दिन के हो गए थे।ओर आज उनका नामकरण था।
दोनों परिवारों ने बच्चों के नामकरण की विधि ओर पूजा प्राचीन शिव मंदिर में रखी थी।
मंदिर के खुले परागण में हवन में अग्नि जल रही थी।ओर उस हवन के पास बच्चों के माता पिता उन्हें अपनी गोद में लिए बैठे थे।
मंदिर को चारों तरफ से फूलों से सजाया गया था।ओर मंदिर के नीचे ढोल नगाड़े वाले खड़े थे।
पंडित जी जोर जोर से मंत्र उच्चारण कर रहे थे और हवन में आहुति दे रहे थे।
हवन में प्रसिद्धि प्राप्त किए हुए ओर ज्ञानी पंडित थे।
उनमें से एक मुख्य पंडित जी ने दोनों बच्चों के चेहरे की तरफ देखा।फिर शिव भगवान की प्रतिमा की तरफ उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गई।
पंडित जी ने चावल से भरी थाल ली और उस पर नाम लिख दिया।
पंडित जी(जोश भरी तेज आवाज में): आज से दिग्विजय प्रताप सिंग के पोते को रूद्र प्रताप सिंग के नाम से जाना जाएगा।जो खुद एक शिव का रूप है। दिखने में शांत पर गुस्से में सब कुछ जला देने वाला।
ओर विक्रम सिंग ठाकुर की पोती को शक्ति सिंग ठाकुर के नाम से जाना जाएगा जो देवी का रूप है। राक्षस का नास करने वाली।
कभी किसी के सामने न झुकने वाली।
रूद्र ओर शक्ति एक दूसरे की किस्मत है। शक्ति के बिना रूद्र अधूरा है।
पंडित जी के इतना कहते ही जोर जोर से ढोल नगाड़े बजने लगे।
तेज हवा चलने लगी।
मंदिर की घंटियां बजने लगी।
जैसे प्रकृति शिव ओर देवी के इन रूप का स्वागत कर रहे हो।
वही वो दोनों बच्चे मुस्कुरा रहे थे।
दिग्विजय जी ओर विक्रम जी ने पंडित जी को दक्षिणा दी।
ओर उनका आशीर्वाद लिया।
पंडित जी ने शक्ति ओर रूद्र का हाथ एक दूसरे के हाथ में दिया ओर उनकी किस्मत को जोड़ दिया।
दोनों दोस्त अपने अपने महल चले गए।खुशियां मनाते हुए।
वक्त गुजरा दोनों परिवार में रिश्ता मजबूत होता गया।
10 साल बाद।
आज विक्रम सिंग ठाकुर जी अपने पूरे परिवार के साथ उदयपुर आए थे।
रूद्र ओर शक्ति दस साल के हो गए थे।ओर आज उनका दसवां जन्मदिन था।
दिग्विजय जी के महल में बहुत बड़ी पूजा रखी थी।
दिग्विजय प्रताप सिंग जी ने विक्रम जी का अपने महल में स्वागत किया।
महल के आंगन में एक 10 साल की मासूम ओर प्यारी सी बच्ची (अपने नाम के बिल्कुल उल्ट।)अपनी गुड़िया से खेल रही थी।उसने राजपूती कपड़े घाघरा चोली पहन रखा था। हाथों में छोटी सी चूड़ियां। गले में पतला सा हार छोटे छोटे खुले बाल।ये थी हमारी छोटी सी शक्ति
वो अभी अपनी गुड़िया से खेल ही रही थी कि तभी उसके पास एक 10 साल का लड़का दौड़ कर शक्ति के पास आया।
उसके घुटने में थोड़ी सी चोट लगी थी और हाथ में एक पुरानी लकड़ी की तलवार थी।
वो रूद्र था जो अभी अभी बाहर से खेल कर आया था।
रूद्र: शक्ति देखो मैने शेर को हरा दिया।
रूद्र ने गर्व के साथ कहा हालांकि वो शेर बस मिट्टी का एक ढेर था।
शक्ति ने अपनी गुड़िया साइड में रखी ओर गुस्से में अपना छोटा सा चेहरा ऊपर किया।
कुंवर सा आपने फिर से फोलो की कायरी खराब कर दी। हम दादा सा से आपकी शिकायत करेंगे।
रूद्र थोड़ा थमा। फिर शरारती अंदाज में मुस्कुरा दिया।
रूद्र: कह दो! दादा सा तो खुद कहते है कि हम एक योद्धा है। ओर योद्धा फूलों की चिंता नहीं करते।
शक्ति: पर हम करते हैं। शक्ति की आंखों में नमी आ गई।
शक्ति बहुत प्यार से ओर मेहनत से वो फूल लगाए थे।
शक्ति को उदास देख रूद्र का सारा योद्धा वाला रॉब हवा हो गया।
रूद्र ने अपनी जेब से एक सुनहरा पत्थर निकाला जो उसे पानी में मिला था।
रूद्र ने शक्ति को वो पत्थर दिया। ओर बोला
रूद्र:ये लो ये उन फुलों से भी सुंदर है। इसे रखो और रोना बंद करो।
रुद्र ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा।
शक्ति ने उस पत्थर को देखा फिर रूद्र को।
शक्ति: कुंवर सा आप हमेशा सब कुछ तोड़ देते हैं।
बाकी अगले भाग में।