"Cruel Love"-(The shades of Haterd!) - Chapter 2
आदर्श ने गुस्से से अख़बार दुआ के सामने फेंका और गेट की तरफ़ बढ़ गए। घर का दरवाज़ा खुला... और एक ज़ोर की आवाज़ के साथ बंद हुआ।
दुआ वहीं खड़ी रही —
साँसें तेज़ थीं...
पर चेहरा शांत।
जैसे हर अपमान अब उसका सांस लेने का हिस्सा..... उसकी नियति बन चुका था।
तभी वहां वरुण आ पहुंचा..... उसने गुस्से भरी नज़र से दुआ की तरफ़ देखा..... वरुण ने उसे देखकर अपनी भौहें सिकोड़ ली..... कि एन मौके पर अंजली ने भी वहां आते हुए..... दुआ पर अपने लफ्ज़ों का ज़हरीला बाण छोड़ा।
अंजली(आग में घी डालते हुए): झूठ बोलूं तो कौवा काटे..... दुआ तुम भी ना..... अच्छे से जानती हो कि पापा जी हाइ बीपी के मरीज़ हैं..... फिर भी उनके सामने आकर उन्हें जानबूझ कर गुस्सा दिलाती रहती हो.....।
वरुण(ठंडे लहज़े से): इसे इन सब बातों से क्या ही फ़र्क पड़ता है..... इसके लिए तो कोई भी मरे या जिए..... इसे कोई परवाह नहीं..... (सख़्ती से)..... चाहती क्या हो तुम आख़िर?..... जब तुम्हें पता है कि तुम्हारी शक्ल देखने से इस घर के लोगों को तकलीफ़ होती है..... तो क्यों बार –बार उनकी तकलीफ़ बढ़ाती हो?
दुआ(अपनी आंखों की नमी को पीते हुए): भाई ऐसा नहीं है..... मैं तो बस.....
वरुण(कड़वे स्वर में गुस्से से): मैं पहले भी कह चुका हूं..... और एक बार फिर से दोहरा रहा हूं..... यहां किसी को तुम्हारी शक्ल तक देखना भी गंवारा नहीं है..... हकीकत तो ये है कि तुम्हारी मौजूदगी से इस घर में सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है।
सुनैना जी(वरुण को टोकते हुए): वरुण बेटा बस कर दो..... सुबह–सुबह क्यों बेवजह बात बढ़ा रहे हो!
वरुण(बेरुखी से): मां मैं बात बढ़ा रहा हूं?..... (गुस्से से दुआ की ओर देखकर)..... या ये है जिसने हर मर्यादा..... हर हद को पार कर दिया है.....?
अंजली(मुंह बनाते हुए): झूठ बोलूं तो कौवा काटे..... मगर मम्मी जी सही तो कह रहे हैं वरुण जी..... आख़िर आप लोगों के लाड़ प्यार ने इस लड़की को इतनी छूट दे दी..... कि इसने सब बर्बाद कर दिया..... और अब भी आप इसे शह दे रही हैं..... (एक पल रुक कर)..... माफ़ कीजिएगा मम्मी जी..... झूठ बोलूं तो कौवा काटे.....मगर अबकी बार इसने कोई कांड किया..... तो आप सब को चुल्लू भर पानी में डूब मरना पड़ेगा.....।
वरुण(गुस्से से दुआ को घूरते हुए): अब ऐसा कुछ होने से पहले ही मैं इसकी जान ले लूंगा..... (अपनी मां की ओर देखते हुए).... बहुत जल्द अपना बोझ हल्का कर के हमेशा के लिए इसे इस घर से विदा कर देंगे..... फिर ये जाने और इसका काम..... तब तक समझा दीजिएगा इसे..... कि जब तक इस घर में है..... तब तक अपनी हद में रहे.....!
इतना कहकर वरुण गुस्से से वापस अपने कमरे की तरफ़ चला गया..... अंजली भी मुंह बनाते हुए उसके पीछे चल पड़ी..... जबकि पीछे दुआ की आंखों में आंसू भर आए..... वह चाह कर भी कुछ नहीं कह पाई.....।
माँ — जो चाहकर भी कुछ नहीं कर सकतीं थीं उसकी हालत पर बस खामोश खड़ी रहीं। ममता भरे स्पर्श से हाथ उसके सिर को हल्के से छुआ, फिर अचानक जैसे कुछ याद आया तो उन्होंने झट से अपना हाथ पीछे हटा लिया। कहीं किसी ने देख लिया तो?
"तू ठीक है न?"..... उनकी आवाज़ में ममता घुली थी मगर डर के साए में।
दुआ मुस्कराई– मगर वो मुस्कान नहीं, एक नकाब था।
"हाँ माँ डोंट वरी... मैं ठीक हूँ।"..... उसने इतना कहा और फिर बिना रुके अपने कमरे की ओर बढ़ गई।
कमरे की खिड़की से आती धूप दुआ के चेहरे को छू रही थी, जैसे समय ने भी उसे जगाने की आखिरी कोशिश की हो। लेकिन उसके भीतर तो एक ऐसी रात थी जो डेढ़ साल से कभी खत्म ही नहीं हुई।
बिस्तर पर बैठी वो वही पुराना सूती दुपट्टा अपनी उंगलियों में लपेटे बैठी थी, जो अब जगह-जगह से उधड़ चुका था — ठीक वैसे ही जैसे उसका विश्वास, उसकी ज़िन्दगी। वो हेडबोर्ड से सर टिकाए उन यादों को याद करने लगी..... जब सब लोगों की जान उसमें बसती थी।
[फ्लैशबैक: दो साल पहले — शर्मा निवास की रौशनी भरी सुबह]
घर का आँगन, सुबह के 7 बजे।
धूप धीरे–धीरे सीढ़ियों पर से उतर रही थी और उसके नीचे खिलखिलाहटें बिखरी थीं। दुआ, पीले सूट में, बालों में चमेली के फूल लगाए, माँ के साथ रसोई में झूम-झूमकर पराठे बेल रही थी या यूं कहें कि बेलने की नाकाम कोशिश कर रही थी।
दुआ (मस्ती में गाते हुए):"तेरे मुहल्ले में रहेंगे हम........
माँ(झुठी संजीदगी से): अरे, बेल कम रही हो..... नाच ज़्यादा रही है। पराठा फिर से गोल नहीं बना दुआ.....।
दुआ (चिढ़ाते हुए): आपका दिल गोल है मम्मा, पराठा थोड़ा त्रिकोण भी चलेगा!
इतने में वरुण नीचे आया.... ऑफिस जाने की जल्दी में।
वरुण(टेबल पर बैठते हुए): "दुआ! जल्दी नाश्ता दे दो..... मीटिंग है मेरी दस बजे!
दुआ(टशन से नाश्ते की प्लेट आगे रखते हुए): भाई, तुम मेरे लिए मेरी जिंदगी की किसी भी मीटिंग से ज़्यादा ज़रूरी हो..... (मासूमियत भरे लहज़े से)..... लीजिए पराठा खाएं..... बहुत प्यार से बनाया है मैंने — थोड़ा सा जल गया है, पर इमोशंस 100% हैं।
वरुण(हँसते हुए): थोड़ा सा या पूरा?
सुनैना जी(हंस कर): रहने दो वरुण बेटा..... ये पराठा खाओगे..... तो पराठों से संन्यास लेना पड़ेगा.....।
दुआ(मुंह लटका कर): मांआआआआ..... कम से कम मैंने कोशिश तो की ना.....।
वरुण(प्यार से मुस्कुरा कर): बिल्कुल..... और कोशिश करने वालों की हार नहीं होती.... एंड डोंट वरी मैं तुम्हारा बनाया पराठा ही खाऊंगा..... आफ्टर ऑल मेरी बहन ने इतने प्यार से जो बनाया है.....।
सुनैना जी(ना में अपनी गर्दन हिलाते हुए): एक तो पहले ही इसे किचेन का कुछ नहीं आता.....और चढ़ाओ इसे सर..... ।
वरुण(प्यार से दुआ का गाल छूते हुए): हां मेरी बहन है ही इतनी प्यारी..... ये ना..... ये सच में इस घर की धूप है।
तभी वहां शिवानी आती है — अपने कॉलेज की ड्रेस में।
शिवानी(दुआ की ओर बढ़ते हुए): दी..... आज भी मेरी हेयर स्टाइल आप ही बनाओगी ना?
दुआ(हाथ फैलाकर मुस्कुरा कर): तेरी चोटी ही नहीं, तेरी ज़िंदगी भी अगर कभी उलझे तो सुलझा दूंगी..... अब आ जल्दी से चल!
शिवानी(मुस्कुरा कर): थैंक्यू दी..... यू आर द बेस्ट.....।
तभी आदित्य वहां भागकर आए— हाथ में मैथ्स की किताब लिए..... जो आधी फटी हुई थी.....।
आदित्य(किताब आगे करते हुए): दी..... देखो डब्बू ने मेरी किताब फाड़ दी!
दुआ(आदित्य का कान पकड़ते हुए): शरारती..... बिल्ली ने किताब फाड़ी है, या तूने बोर होकर खुद फाड़ी?
आदित्य(अपनी गर्दन स्क्रैच करते हुए): मैंने तो बस थोड़ी सी.....
दुआ(झूठी संजीदगी से): बुरी बात.....।
आदित्य(मासूमियत से): सॉरी दी..... आगे से नहीं होगा.....!
दुआ(मुस्कुरा कर): इट्स ओके..... चलो, मिलकर ठीक कर देंगे — ऑफ्टर ऑल ये सुपर सिस्टर है तेरे पास!"
आदित्य(दुआ के गले लगते हुए): आई नो..... आप सबसे बेस्ट हो.....।
सुनैना जी मुस्कुरा कर दूर से देख रही थीं— उनके चेहरे पर गर्व था.....।
सुनैना जी(धीरे से आदर्श जी से): इस घर की हर सुबह दुआ से शुरू होती है।
आदर्श जी(अखबार नीचे रखते हुए): बिल्कुल..... आख़िर मेरी गुड़िया है, उसकी हँसी इस घर की संजीवनी है।
और फिर — इसी खुशनुमा माहौल में अंजली भाभी की एंट्री होती है..... वो हमेशा से दुआ से चिड़चिड़ी रहती थी..... शायद ये उसकी इनसिक्योरिटीज थी..... उसकी जलन जो उसे दुआ के इस घर में मुकाम से थी.....।
अंजली(थोड़े नकचढ़े अंदाज़ में): दुआ, तुम्हारी हँसी के शोर में मेरी नींद ख़राब हो गई।
दुआ(प्यारी सी मुस्कान के साथ): भाभी, मेरी हँसी में नींद कम और सपने ज़्यादा होते हैं — आप भी ज़रा मुस्कुरा के तो देखिए!
वरुण(मुस्कुरा कर): बिलकुल! सबका मूड दुआ चुटकियों में ठीक कर देती है।
उसी दिन शाम का समय था। पूरा परिवार छत पर बैठा था। गुनगुनी चाय, पकौड़े, और दुआ की आवाज़ के साथ। वो गिटार लेकर एक पुराना गाना गा रही थी।
दुआ (गुनगुनाती है): "जीना यहाँ, मरना यहाँ..."
सभी परिवार उसके साथ एक साथ गा उठते हैं, हँसी-ठिठोली में लिपटे इस नज़ारे में जज़्बातों का एक कमरा धीमे से सबके चेहरों पर घूमता है — माँ की आँखों में ममता, पिता की आँखों में गर्व, वरुण की मुस्कान, शिवानी की नज़रों में दीदी के लिए प्यार, और आदित्य की मासूम उत्सुकता और सबकी मुस्कान की रूह थी दुआ.....।
(फ्लैशबैक एंड.....)
"एक समय था जब मेरी हँसी इस घर की रूह थी।
अब मैं हूँ, तो सब खामोश हैं —
क्योंकि जब रौशनी ही बुझ जाए,
तो साए भी डरा करते हैं...।
अंधेरे कमरे में, दुआ सिर झुकाए अपनी डायरी पर ये लाइन लिखते हुए बड़बड़ा रही थी.....।
दुआ (धीरे से): मैं वहीं दुआ हूँ... बस अब मुझे देखने वाली निगाहें बदल गई हैं।
दुआ ने कुछ लाइन्स लिख कर डायरी बंद की..... कि तभी अंजली की तीखी आवाज़ उसके कानों में पड़ी..... दुआ फ़ौरन ही कमरे से बाहर निकली...... वो समझ गई थी..... कि उसके पिता और वरुण अपने –अपने काम पर घर से जा चुके हैं..... और अब उसे रोज़ की तरह अपने काम निपटाने थे..... दुआ नीचे पहुंची..... तो मां रोज़ की तरह मंदिर जा चुकी थी..... शिवानी कॉलेज..... और आदित्य अपनी ट्यूशन..... अब घर में सिर्फ़ अंजली और दुआ बाकी थे..... दुआ को देखते ही अंजली ने एक तंज़ भरे लहज़े से अपनी चुप्पी तोड़ी।
अंजलि (तेज़ आवाज़ में): अब क्या इसी तरह पड़े–पड़े दिन बिताने हैं?..... कितनी बार समझाना पड़ेगा..... कि ये घर है कोई होटल नहीं है..... जहां तुम्हें फ्री की सेवा मिलती रहे..... (एक पल रुक कर)..... अब ये रोनी सी शक्ल पर ज़रा फुर्ती लाओ..... और घर की साफ़ –सफ़ाई के साथ ही जल्दी से किचेन के गंदे बर्तन समेटो..... (तंज़ भरे लहज़े से)..... और हां इसी काम में अब पूरा दिन मत निकाल देना..... ज़रा जल्दी–जल्दी हाथ चलाओ..... उसके बाद कपड़े भी धोने है.....।
दुआ(मद्धम लहज़े से): जी भाभी.....।
अंजली(तंज़ भरे लहज़े से): अब क्या है मम्मी जी ने तुम्हें खाना बनाना तो सिखाया नहीं है..... अब कम से कम इन्हीं छोटे–मोटे कामों में मदद कर दो.... (तीखे लहज़े से)..... एक बात बताओ..... कब तक अपनी किस्मत के रोने रोती रहोगी आख़िर..... और प्लीज़ ये हर वक्त ना बिचारी सी शक्ल बना कर मत घूमती रहा करो..... (तंजिया भाव से)..... क्योंकि असल में तुम ख़ुद भी जानती हो कि तुम बिचारी तो बिल्कुल नहीं हो..... और जो ये सब कुछ हो रहा है..... तुम्हारे ख़ुद के कर्म..... और अपने किए की भरनी है..... तो इसीलिए ये विक्टिम कार्ड खेलना बंद करो..... हुंह.....।
इतना कहकर अंजली फोन चलाते हुए..... अपने कमरे की तरफ़ बढ़ गई..... जबकि उसकी इतनी बातें सुनकर भी..... दुआ बिलकुल खामोश थी..... वो चुप ज़रूर थी — पर गहराई से अंदर कुछ काँप गया था।