अनवांटेड सीइओ वाइफ - Chapter 1
मुंबई की शाम हमेशा भीड़भरी और शोर-शराबे से भरी रहती थी, लेकिन उस शाम रिया का दिल बिल्कुल शांत और खाली था।
“रिया बेटा, हमें ये शादी करनी ही होगी…”
पिता की आवाज़ में वो बेबसी थी जो रिया ने पहले कभी महसूस नहीं की थी।
उसके पापा की कंपनी, वर्मा ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्रीज़, दिवालियेपन की कगार पर खड़ी थी।
दूसरी तरफ़ था आरव मल्होत्रा—शहर का सबसे बड़ा बिज़नेस टायकून, जिसका नाम सुनते ही लोग सहम जाते थे।
वो ठंडा, कठोर और “बिज़नेस मशीन” कहलाता था।
रिया ने जब पहली बार उसके बारे में सुना तो उसके मन में डर बैठ गया।
“पापा, मैं किसी ऐसे इंसान से शादी कैसे कर सकती हूँ, जिसे मैं जानती तक नहीं?”
उसने रोते हुए कहा।
पिता की आँखें भर आईं—
“बेटा… ये सिर्फ शादी नहीं है, ये हमारे अस्तित्व की आख़िरी उम्मीद है। आरव ने कहा है अगर तुम शादी के लिए राज़ी हो जाओ, तो वो हमारी कंपनी को बचा लेगा।”
रिया का दिल टूट चुका था।
उसके सारे सपने, उसके ख्वाब, सब कुछ जैसे राख में बदल गए।
शादी का दिन
भव्य हॉल, चमकते झूमर, मीडिया की भीड़ और करोड़ों की डील जैसा माहौल।
हर कोई इस शादी को “बिज़नेस अलायंस” कह रहा था, लेकिन रिया के लिए ये उसके सपनों की मौत का दिन था।
दूल्हे की तरह नहीं, आरव वहाँ खड़ा एक सीईओ की तरह लग रहा था।
काले शेरवानी में, ठंडी आँखों के साथ, जैसे उसे इस शादी से कोई फर्क ही नहीं पड़ता।
फेरे शुरू हुए।
हर मंत्र के साथ रिया को लग रहा था कि उसके दिल पर एक और बोझ बढ़ रहा है।
फेरे खत्म होते ही आरव उसके कान में झुका और बेहद ठंडी आवाज़ में बोला—
“याद रखना, मिसेज़ मल्होत्रा… ये शादी सिर्फ़ एक डील है। तुम्हें मुझसे किसी प्यार या अपनापन की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।”
रिया की आँखों में आँसू छलक आए।
लेकिन उसने सिर झुका लिया—
क्योंकि उसके पास कोई और रास्ता ही नहीं था।
शादी के बाद का पहला दिन हर लड़की के लिए खास होता है,
लेकिन रिया की सुबह अजनबीपन और खालीपन के बीच हुई।
वो जब नींद से जागी, तो उसके बगल में कोई नहीं था।
आरव रात को ही ऑफिस चला गया था, और नौकरानी ने आकर सिर्फ़ इतना कहा —
“मैडम, सर ने नाश्ता डाइनिंग टेबल पर लगाने को कहा है… लेकिन वो शायद नहीं आएँगे।”
रिया ने एक लंबी साँस ली।
जिस रिश्ते को वो दिल से निभाना चाहती थी, उस रिश्ते में शुरुआत से ही दरारें थीं।
कॉफ़ी टेबल पर पहली मुलाक़ात
दोपहर के समय आरव लौटा।
वो अपनी टाई ढीली करते हुए सोफ़े पर बैठ गया और लापरवाही से बोला —
“मुझे कॉफ़ी चाहिए।”
रिया धीरे से बोली —
“मैं बना देती हूँ…”
कुछ ही देर बाद जब उसने कप उसके सामने रखा, तो आरव ने एक नज़र उठाकर उसे देखा।
उस नज़र में अपनापन नहीं, बल्कि ठंडापन था।
“तुम्हें मेरी इन आदतों की आदत डालनी होगी, मिसेज़ मल्होत्रा।”
उसकी आवाज़ में ऐसा लग रहा था जैसे वह पत्नी से नहीं, किसी कर्मचारी से बात कर रहा हो।
रिया ने हिम्मत जुटाकर पूछा —
“क्या हमारे बीच… कभी सामान्य रिश्ता नहीं हो सकता?”
आरव हँसा नहीं, गुस्सा नहीं हुआ, बस एकदम सपाट बोला —
“मैं शादी में यकीन नहीं रखता। मेरे लिए ये बस एक कॉन्ट्रैक्ट है। तुम्हें सिर्फ नाम के लिए मेरी पत्नी बनना है, और मुझे तुम्हारे पिता की कंपनी संभालनी थी। हम दोनों अपनी-अपनी वजहों से इस समझौते में बँधे हैं। बस।”
रिया की आँखों में आँसू भर आए, लेकिन उसने चुपचाप सिर झुका लिया।
दिन गुज़रते गए।
रिया पूरे घर में अकेली घूमती रहती, किताबों से दिल बहलाती, नौकरों से बात करती।
लेकिन असली साथी की कमी उसे हर पल सालती थी।
वो कभी-कभी छत पर जाकर तारों को देखती और सोचती —
“क्या ये ज़िंदगी मुझे इसी अकेलेपन में जीनी है?”
आरव देर रात तक काम करता।
घर आता भी तो उसके चेहरे पर थकान और चिड़चिड़ापन होता।
उनके बीच बातचीत बस कुछ औपचारिक शब्दों तक सीमित रह गई थी।
एक रात डाइनिंग टेबल पर आरव और रिया आमने-सामने बैठे थे।
रिया ने हिम्मत करके कहा —
“मैंने तुम्हारे लिए कढ़ी-चावल बनाए हैं। सुना था तुम्हें पसंद हैं।”
आरव ने बस एक चम्मच खाया और तुरंत नैपकिन रखते हुए बोला —
“मुझे समय बर्बाद करना पसंद नहीं। अगली बार से शेफ ही बनाएगा। तुम अपनी पढ़ाई या किताबों में ध्यान दो।”
रिया का दिल जैसे टूटकर बिखर गया।
उसने सोचा था शायद उसके हाथों का बना खाना कोई रिश्ता जोड़ देगा, लेकिन वहाँ दीवार और ऊँची हो गई।
उस रात उसने तकिये में मुँह छिपाकर आँसू बहाए।
और तभी उसके दिल में एक वादा जन्मा—
“अगर ये रिश्ता मजबूरी से शुरू हुआ है… तो मैं ही इसे अपनी सच्चाई और प्यार से बदलूँगी।”
बरसात की रात
मुंबई की सड़कों पर मूसलाधार बारिश हो रही थी।
रिया खिड़की के पास खड़ी थी।
उसने कभी बारिश को इतना उदास न देखा था।
आरव फिर से देर से घर आया।
वो हमेशा की तरह भीगा हुआ, मोबाइल पर बिज़नेस डील की बातें करते हुए अंदर आया।
रिया ने धीरे से कहा—
“तुम भीग गए हो… पहले कपड़े बदल लो, मैं अदरक वाली चाय बना देती हूँ।”
आरव ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं।
बस फोन पर बात करता हुआ अपने कमरे में चला गया।
रिया चुपचाप मुस्कराने की कोशिश करती रही, लेकिन उसकी आँखें भर आईं।
अगली सुबह रिया तेज़ बुख़ार में थी।
बारिश में खड़े-खड़े वो ठंड खा गई थी।
जब आरव ने देखा कि वो सोफ़े पर लेटी काँप रही है, तो उसके कदम रुक गए।
दिल में पहली बार चिंता की हल्की-सी लहर उठी।
“रिया…” उसने धीरे से पुकारा।
रिया ने आँधी-सी आवाज़ में कहा—
“मैं ठीक हूँ…”
आरव ने तुरंत डॉक्टर बुलाया, सारी दवाइयाँ लाकर खुद अपने हाथों से उसे दीं।
रात भर वो उसके पास बैठा रहा।
पहली बार उसका चेहरा नरम और आँखें बेचैन थीं।
रिया ने धुंधली नज़रों से देखा—
“तुम्हें परवाह है मेरी?”
आरव चौंक गया।
उसने नज़रें चुराते हुए कहा—
“मतलब… तुम मेरी ज़िम्मेदारी हो। तुम्हें कुछ हो गया तो लोग उँगली मुझ पर उठाएँगे।”
लेकिन उसके दिल ने भी सच छुपाया नहीं—
वो परवाह कर रहा था। बहुत गहरी।
कुछ दिन तक आरव ने रिया का ख्याल रखा।
उसके लिए सूप बनवाया, दवा का टाइम याद रखा, और ऑफिस भी जल्दी आने लगा।
रिया जब मुस्कराकर “थैंक यू” कहती, तो उसके चेहरे पर एक अनजानी शांति उतर आती।
धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि रिया सिर्फ़ मासूम नहीं, बल्कि बहुत मजबूत भी है।
वो नौकरों से हँसी-मज़ाक करती, घर की हर चीज़ को अपनेपन से सँवारती, और ज़रा-सी बात पर सबका दिल जीत लेती।
एक शाम आरव ने उसे बालकनी में बैठा किताब पढ़ते देखा।
उसने अनायास पूछ लिया—
“तुम इतनी खुश कैसे रहती हो… जबकि मैं तुम्हें कभी खुश नहीं रख पाया?”
रिया ने मुस्कराकर कहा—
“खुशी छोटी-छोटी चीज़ों में ढूँढनी पड़ती है। अगर हम दूसरों से उम्मीद करें, तो कभी खुश नहीं रह सकते।”
आरव चुप हो गया।
उसके दिल में पहली बार रिया की बात गहराई से उतर गई।
अब जब भी वो ऑफिस से लौटता, तो अनजाने में उसकी नज़रें रिया को ढूँढतीं।
रिया की हँसी, उसकी देखभाल, और उसकी मासूमियत—सब उसे बाँधने लगे।
वो मानना नहीं चाहता था, लेकिन सच ये था—
रिया धीरे-धीरे उसके दिल की जमी बर्फ़ पिघला रही थी।
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