Blood And Iron - Chapter 1
मुख्य किरदार:
· वीर: उम्र - 300 साल पुराना। एक vampire जो लोगों से नफ़रत करता है, लेकिन उन्हीं की रक्षा करने को मजबूर है। उसका अपना एक code है, और वह hero नहीं, बल्कि एक anti-hero है। वह अपनी प्यास पर कंट्रोल रखता है, लेकिन कभी-कभी...
जगह: आजकल का Mumbai। Its dark underbelly - छुपे हुए clubs, deserted warehouses, और elite parties जहाँ असली खतरा छिपा है।
Start of the story
मुंबई की रातें कभी सोती नहीं। यहाँ की हवा में गाड़ियों का शोर, नमक की खुशबू, और... खून की गंध मिली होती है।
वीर ने अपनी आँखें बंद करके गहरी सांस ली। वह एक पचास मंजिला इमारत की छत के किनारे पर खड़ा था, अपनी खास तरह की काले चमड़े की जैकेट पहने। नीचे, मुंबई की रोशनियाँ एक जिंदा जीव की तरह धड़क रही थीं। उसे यह नज़ारा पसंद था। यह उसे याद दिलाता था कि वह दुनिया से कितना ऊपर है... और कितना अलग।
तभी, उसकी अति संवेदनशील सुनवाई ने तीन दिल की धड़कनों को पकड़ा। एक तेज़, डरी हुई। दो... भारी, लालची, हिंसक। नीचे की गली में।
फिर से? उसके मन में आया। क्या ये इंसान और कुछ नहीं कर सकते?
वह मुड़ने ही वाला था। यह उसकी लड़ाई नहीं थी। लेकिन तभी, धातु की चीख़ने जैसी आवाज़ आई। एक चाकू। और फिर एक चीख। डर की नहीं... दर्द की।
खून की गंध, जो पहले एक हल्की सी पृष्ठभूमि थी, अचानक एक जबरदस्त राग बन गई। उसके जबड़े में एक तीव्र, सर्द दर्द उठा। उसके नुकीले दाँत, जो हमेशा छुपे रहते थे, अपने आप बाहर निकल आए, उसके निचले होंठ को छीलते हुए। उसकी आँखों का रंग फीके नीले से एक चमकदार, खतरनाक लाल में बदल गया।
"प्यास..." उसके दिमाग में एक आवाज गूंजी। "तृप्ति। इंसाफ।"
वह एक धुंधली सी छाया बन गया। एक पल वह छत पर था, अगले ही पल वह गली की दीवार पर, परछाइयों में चिपका हुआ था, बिल्कुल एक मकड़े की तरह।
नीचे, दो बड़े-कद के गुंडे एक कॉलेज के छात्र को घेरे हुए थे। एक ने उसका लैपटॉप का बैग छीन लिया था, दूसरे ने उसके हाथ पर चाकू से वार किया था, जिससे खून बह रहा था।
"और क्या है? फोन निकाल!" एक गुंडा गुर्राया।
वीर ने अपनी जीभ से अपने नुकीले दाँत छुए। उसका शरीर एक कमान की तरह तन गया। वह नियंत्रण खोने वाला था।
नहीं, उसने खुद से कहा। बस ज़रूरत भर। ज़्यादा नहीं।
वह दीवार से गुप्त रूप से नीचे उतरा। उसकी चाल इतनी शांत थी कि उसने कूड़ेदान के पास पड़े एक खाली डब्बे को भी नहीं हिलाया।
वह सीधे उस गुंडे के पीछे खड़ा हो गया जिसके हाथ में चाकू था। उसने अपना एक हाथ उसके मुँह पर रखा, उसे चीखने से रोका। दूसरा हाथ उसकी गर्दन पर गया।
"शhhह..." वीर ने एक कर्कश, लगभग भावनात्मक फुसफुसाहट में कहा। "बस एक पल। दर्द नहीं होगा।"
उसने अपने दाँत गुंडे की गर्दन में घोंप दिए।
यह एक विस्फोट की तरह था। एड्रेनालाईन, डर, और जीवन शक्ति का एक गर्म, शक्तिशाली मिश्रण उसके गले में उतरा। उसकी हर कोशिका ऊर्जा से भर उठी। दुनिया और भी तेज, और भी स्पष्ट हो गई। उसने खुद को रोका। बस कुछ ही क्षण। जानलेवा नहीं, बस अशक्त करने वाला।
गुंडा उसकी बाहों में बेहोश होकर लुढ़क गया।
दूसरा गुंडा और कॉलेज छात्र, हैरानी से यह सब देख रहे थे, उनके दिमाग यह प्रक्रिया ही नहीं कर पा रहे थे कि यह काली परछाई कौन है।
वीर ने धीरे से गुंडे को ज़मीन पर रखा और मुड़ा। उसकी लाल आँखें अब दूसरे गुंडे पर टिकी थीं। खून उसके होंठों पर लगा था, जो चांदनी में चमक रहा था।
"भ...भूत!" गुंडा चीख़ा, और भागने लगा।
वीर ने अपनी आँखें बंद कीं। उसने अपनी गति का इस्तेमाल किया। एक पल में, वह गली के निकास पर खड़ा था, गुंडे के सामने।
गुंडा रुक गया, उसकी सांसें तेज हो गईं, उसकी आँखें डर से फैल गईं।
"अगली बार," वीर ने अपनी नीची, कंपकंपाती आवाज़ में कहा, जो गली की दीवारों से टकरा रही थी, "किसी मासूम को निशाना मत बनाना। मुंबई में एक नया रखवाला है। और उसे तुम्हारे जैसे लोग... बिल्कुल पसंद नहीं हैं।"
वीर ने अपना हाथ उठाया। अपनी अविश्वसनीय गति से, उसने गुंडे के सिर पर एक जोरदार चोट मारी। वह बेहोश होकर वहीं गिर पड़ा।
वीर वापस उस college student के पास मुड़ा, जो दीवार से सटकर, काँपता हुआ खड़ा था, अपने घाव को पकड़े हुए।
वीर ने उसकी ओर एक कदम बढ़ाया। लड़का सिकुड़ गया।
वीर रुक गया। उसने महसूस किया कि वह कितना डरा हुआ है। उसने अपने दाँत वापस अंदर कर लिए, उसकी आँखों का रंग slowly वापस normal हो गया। उसने अपनी जैकेट की जेब से एक clean, white handkerchief निकाला और लड़के की ओर बढ़ाया।
"अपने हाथ पर बाँध लो। घर जाओ। किसी को कुछ मत बताना," वीर ने कहा, उसकी आवाज़ अब पहले जैसी threatening नहीं थी, बल्कि थकी हुई और annoyed थी।
वह मुड़ा और गली से बाहर निकलने लगा।
"आ...आप कौन हैं?" लड़के ने हकलाते हुए पूछा।
वीर ने रुककर जवाब दिया, बिना पीछे मुड़े। "एक necessary evil."
और फिर, वह shadows में dissolve हो गया, जैसे कभी था ही नहीं।
वह अपनी काली, मॉडिफाइड कार में बैठा, जो एक सुनसान सड़क पर खड़ी थी। उसने स्टीयरिंग व्हील पर अपना सिर टिका दिया। उत्तेजना का जोश उतर रहा था, और उसकी जगह ले रही थी सामान्य खालीपन की भावना।
तभी, उसके एन्क्रिप्टेड फोन की स्क्रीन जगमगा उठी। एक एकल संदेश, एक अज्ञात नंबर से।
अज्ञात नंबर: "वे तुम्हारे लिए आ रहे हैं, वीर। वे सिर्फ़ हमें ही नहीं, तुम्हारे जैसे सबको मिटा देना चाहते हैं। 'काल चक्र'। तुम्हारी मदद की ज़रूरत है। मैंने तुम्हारे बारे में सुना है। तुम ही एक उम्मीद हो।"
वीर ने संदेश को पढ़ा। उसके होठों पर एक कड़वी, थकी हुई मुस्कान आई।
"काल चक्र?" उसने खुद से कहा। "बढ़िया। बस यही कमी थी।"
उसने संदेश मिटाया नहीं। उसने इंजन शुरू किया। गर्जना सुनसान सड़क में गूंज उठी।
वह एक नई लड़ाई की ओर बढ़ रहा था... और यह सिर्फ़ शुरुआत थी।
To be Continued guys