Revenge of Desire Ch. 2

Revenge of Desire - Chapter 2

Posted by Moon Star • Aug 25, 2025 11:56 PM

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हवेली की रात और भी घनी हो चुकी थी। बाहर हवाओं की सनसनाहट अब कमरे तक साफ़ सुनाई दे रही थी। लेकिन उस पल, उस कमरे में, बिस्तर पर लेटी लड़की के लिए सारी आवाज़ें गायब हो चुकी थीं।

वो केवल **एक छुअन** महसूस कर रही थी।

उसका नग्न शरीर चादरों पर सिकुड़-सा गया था, लेकिन फिर भी उसके उभार ऊपर-नीचे हो रहा थे। उसकी साँसें अब सामान्य नहीं थीं—हर साँस के साथ हल्की **आह्ह्हृ......** उसके होंठों से फिसल रही थी।

वो अदृश्य शक्ति अब उसके और क़रीब आ चुकी थी।

इतनी क़रीब कि लड़की को लग रहा था जैसे कोई झुककर उसके बदन को अपने में समेट रहा हो।

उसकी नाज़ुक त्वचा पर गर्म और ठंडी लहरें एक साथ दौड़ रही थीं।

एक पल ऐसा लगा, जैसे उसके ब्रेस्ट पर हल्का-सा दबाव बढ़ गया हो।

वो सिहर उठी।

उसकी आँखें अब भी खुली थीं, लेकिन सामने सिर्फ़ अंधेरा था।

फिर भी उसे महसूस हुआ—

कोई अदृश्य चेहरा उसके ब्रेस्ट पर झुक रहा है।

कोई उसे ऐसे छू रहा है, जैसे उसका हर अहसास पढ़ लेना चाहता हो।

उसके होंठों से अनायास एक **कराह** निकली।

धीमी, थरथराती, मगर स्पष्ट।

वो घबराई, मगर खुद को रोक न सकी।

उसका हाथ बिस्तर की चादर से छूटकर धीरे-धीरे हवा में उठा—जैसे किसी अदृश्य कंधे को पकड़ लेना चाहता हो।

लेकिन वहाँ कुछ नहीं था।

बस वही मौजूदगी, जो और गहरी होती जा रही थी।

कमरा अब आहों और सिसकियों से गूंजने लगा।

हर बार जब वो छुअन उसके ब्रेस्ट के इर्द-गिर्द घूमती, उसके गले से दबा-दबा **सिसकारा** बाहर निकल आता। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके ब्रेस्ट कोई पी रहा है |

उसके गाल लाल हो गए।

पलकों पर भारीपन था, मगर आँखें खुली रहना चाहती थीं।

वो देखना चाहती थी कि कौन है…

कौन है जो उसे इस तरह महसूस करा रहा है।

लेकिन उसकी नज़रें बार-बार हार जातीं।

सिर्फ़ हवा, सिर्फ़ सन्नाटा, सिर्फ़ अदृश्य लहरें।

वो अब डर और चाहत के बीच पूरी तरह बँट चुकी थी।

एक तरफ़ उसके भीतर की मासूमियत कह रही थी—“नहीं… ये ग़लत है।”

और दूसरी तरफ़ उसका थका हुआ तन उस स्पर्श को रोकना नहीं चाहता था।

उसने होंठ काट लिए।

उसके बदन से पसीने की बूँदें फिसलकर बिस्तर की चादर पर गिर रही थीं।

हर बूंद जैसे उस हवेली की खामोशी में एक नई ध्वनि बना रही थी।

अब वो अदृश्य शक्ति और बेबाक हो गई थी।

उसका स्पर्श नर्मी से गहराई तक उतर रहा था।

लड़की की कराहें और ऊँची होती जा रही थीं।

हर आह में डर और सुख का मिला-जुला स्वाद था।

उसके सीने से उठती हल्की सिसकियों ने कमरे की हवा बदल दी।

झूमर ज़्यादा तेज़ी से हिलने लगा।

खिड़की का परदा जैसे खुद-ब-खुद फड़फड़ाने लगा।

और फिर अचानक—

उसने आँखें भींच लीं।

उसका सिर पीछे की ओर झुक गया।

और होंठों से दबा-दबा एक लम्बा **“आह्ह…”** निकला।

उस पल, उसने खुद को रोकना छोड़ दिया।

वो उस अदृश्य छुअन को स्वीकार कर चुकी थी।

अब वो उसके साथ थी।

उसके बदन की हर नस उस रहस्यमयी शक्ति को आमंत्रित कर रही थी।

कमरा अब सिर्फ़ उसकी कराहों और सिसकियों से भरा था।

कभी धीमी, कभी तेज़।

कभी दबा-दबा स्वर, कभी खुला और मदहोश।

उसका शरीर चादरों पर तड़पता, करवटें लेता।

कभी हाथ कसकर चादर पकड़ते, कभी हवा में फैल जाते जैसे किसी को पकड़ना चाहते हों।

उसके बाल पसीने से भीगकर चेहरे से चिपक गए थे।

और वो अदृश्य शक्ति…

वो अब पूरे अधिकार से उसे छू रही थी।

उसकी साँसों में घुल रही थी।

उसके बदन पर अपनी मौजूदगी की लकीरें छोड़ रही थी।

लड़की अब पूरी तरह उसके साथ थी।

उसकी आँखों से डर मिट चुका था।

अब बस एक अजीब-सी तृप्ति की छाया थी, जो उसकी हर आह में गूंज रही थी।

उसके होंठों पर मुस्कान और सिसकी एक साथ तैर रही थी।

उसकी आँखें कभी खुलतीं, कभी बंद हो जातीं।

और हर बार उसे यही लगता कि कोई अदृश्य चेहरा उसके बेहद क़रीब है।

उसकी आहटों से हवेली की वीरानी अब और रहस्यमयी हो गई थी।

जैसे सदियों से खाली ये कमरा अब उसकी साँसों का घर बन गया हो।

वो अदृश्य शक्ति उसे पिघलाती रही…

वो लड़की उस अदृश्य आलिंगन में सिसकती रही…

और हवेली की दीवारें चुपचाप उस मिलन की गवाह बन गईं।

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