- Chapter 2
जैसे ही हिना अपने कमरे से बाहर निकली, वो कबीर से टकरा गई। कबीर थका हुआ और उलझन में डूबा हुआ था। हिना का दिल काँप उठा। कबीर कुछ बोले बिना ऊपर चला गया। हिना ने खुद से कहा कि क्या कबीर से उसकी शादी की बात चल रही है।
पूरी मिर्ज़ा फैमिली डाइनिंग टेबल पर बैठी हुई थी। दादा और दादी सबको देख रहे थे। तीनों बेटे और उनके बच्चे भी बैठे थे। तीनों बहुएँ खाना परोस रही थीं। मर्द और बच्चे पहले खाते थे, औरतें बाद में। सब चुपचाप खा रहे थे, क्योंकि दादा जान से सब डरते थे। वक़ार का स्वभाव नरम था, और वो औरतों को आज़ादी देने के पक्ष में था। खाना खत्म होने पर दादा जान ने तीनों बेटों को अपने कमरे में बुलाया।
खाने के बाद तीनों भाई मिर्ज़ा साहब के कमरे में गए। दादा सरकार ने कहा कि कबीर और हिना का रिश्ता तय कर देना चाहिए। अहमद ने कहा कि उसे कबीर से बात करनी होगी। वक़ार ने कहा कि उसे हिना से पूछना होगा। दादा सरकार ने कहा कि शादी तो बचपन में ही तय हो गई थी।
रात को वक़ार अपनी पत्नी शगुफ़्ता से बात कर रहा था। शगुफ़्ता ने कहा कि हिना और कबीर की सोच में बहुत फ़र्क है। वक़ार ने हामी भरी।
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-------- कबीर इस घर का बड़ा बेटा था, जिसने 12वीं तक की पढ़ाई की थी। वह ऐसा वक्त था जब वह अपने छोटे से कस्बे को छोड़कर इस बड़े शहर में आए थे। वहाँ पर उनकी जमीन थी, जो आज भी है। उन्होंने अपनी हवेली और जमीनें छोड़कर यहाँ पर कपड़ों का कारोबार शुरू किया। उस समय हालात ऐसे थे कि कबीर अपने अब्बा के साथ काम में लग गया था, और उनके घर में तब एजुकेशन की इतनी अहमियत नहीं थी।
मगर उसके बाद के सारे बच्चे पढ़े-लिखे थे। कबीर का छोटा भाई अयान, उसकी एम.कॉम. पूरी होने वाली थी और उसके बाद वह बिजनेस जॉइन करने वाला था। दूसरे भाई सैयद के बड़े बेटे शाहरुख ने बी.ए. किया था। वह हॉस्टल में रहकर पढ़ा था। तैमूर ग्रेजुएशन खत्म करने के बाद इसी शहर में एम.बी.ए. कर रहा था।
कबीर की बहन साहिबा, शाहरुख की बहन के कहकशां, और वकार मिर्जा की दोनों बेटियाँ — हवा और हिना — चारों कॉलेज जा रही थीं, मगर उन पर बहुत बंदिशें थीं। वे सीधा कॉलेज जातीं, घर से गाड़ी जाती थी और सीधा घर वापस आती थीं। घर की शादियाँ बड़े तय कर रहे थे।
कबीर जानता था कि उसकी शादी बचपन से हिना से तय है, मगर हिना को इस बारे में पता नहीं था। उसे अभी-अभी यह बात पता चली थी।
"तो अब आप क्या करेंगी, आपा?" हवा ने धीमे स्वर में अपनी बड़ी बहन हिना से पूछा।
दोनों बहनें अपने कमरे में थीं। उनका कमरा उनके अम्मी-अब्बू के कमरे से सटा हुआ था। मिर्ज़ा हाउस में बेटियों के सारे कमरे ज़मीन की मंज़िल पर थे, जबकि बेटों को ऊपरी मंज़िल पर कमरे मिले हुए थे।
हवा और हिना का कमरा सादा लेकिन खूबसूरत था, एक ही बेड पर दोनों बहनें आमने-सामने लेटी थीं। हवा ने अपनी ठोड़ी के नीचे हथेली टिकाकर बहन की ओर देखा। हिना की आँखों में गहराई थी, चिंता थी, और कहीं एक डर भी।
"तुम ही बताओ, मैं क्या कर सकती हूँ?" हिना की आवाज़ में बेबसी थी, "मैं सचमुच कबीर से शादी नहीं करना चाहती। तुम्हें अच्छे से पता है कि वह कैसा इंसान है।"
हवा ने हल्की-सी हामी में सिर हिलाया, "सही बात है आपा… मगर हम चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते। अब्बा ने तो कोशिश की थी दादाजान से बात करने की… मगर उन्होंने साफ़ मना कर दिया।"
"और पूछा तो कबीर भाईजान से भी नहीं गया होगा," हवा ने झुंझलाकर कहा, "उन्हें भी बस हुक्म सुना दिया गया होगा। इस घर में जब मर्दों की नहीं चलती तो औरतों की क्या चलेगी?"
हवा ने करवट बदली, और उल्टे लेटते हुए ठंडी साँस ली।
"आपकी पढ़ाई भी यहीं रुक जाएगी, है न?" हवा ने धीरे से पूछा।
हिना की आँखों में कुछ भीगे-से सपने थे। "हाँ, ग्रैजुएशन तो खत्म हो गया, लेकिन मैं मास्टर्स करना चाहती थी… तुम्हें तो पता है ना मुझे लिटरेचर में कितनी दिलचस्पी है।"
"कोई फ़ायदा नहीं आपा। कबीर भाई को कहाँ पढ़ाई की कद्र है। देख लेना, वह धीरे-धीरे दादाजान की तरह हो जाएंगे — सख्त मिज़ाज, औरतों को बस घर की चारदीवारी में रखने वाले, और सबसे पहले आप पर ही हुक्म चलाएँगे।"
"क्यों डरा रही हो यार मुझे?" हिना ने नर्म लहजे में कहा।
"सच कह रही हूँ," हवा ने तड़पकर कहा, "आप उनकी बीवी बनेंगी, और इस घर की सबसे समझदार लड़की होने के बावजूद आपकी कोई सुनवाई नहीं होगी।"
हिना चुप रही। उसने करवट बदली और आंखें बंद कर लीं।
"सो जाओ आपा," हिना ने कहा, और खुद भी आंखें मूंद लीं। मगर नींद दोनों की आँखों से कोसों दूर थी।
हिना सोच रही थी... क्या वह कबीर को पसंद करती है?
कभी नहीं।
कबीर — गुस्से से भरा, एटीट्यूड वाला, सिर्फ अपनी चलाने वाला लड़का। उसने शायद ही कभी सूट पहना हो। घर में बाकी लड़के ट्राउज़र-शर्ट में रिलैक्स होते थे, मगर कबीर हमेशा पठानी सूट या पायजामा-कुर्ते में ही दिखाई देता था। ऑफिस भी वह जीन्स और शर्ट में जाता था, ऊपर से कभी-कभी जैकेट डाल लेता — मगर सूट? शायद ही कभी।
और शाहरुख…
हिना के ज़ेहन में जैसे उसकी तस्वीर उतर आई।
शाहरुख, कबीर से कोई तीन साल छोटा था, मगर बिल्कुल अलग। वह हॉस्टल में पढ़ता था, बहुत बातें करता, मुस्कुराता, हँसता — लड़कियाँ उसे पसंद करतीं, उसकी मौजूदगी से महफ़िल रौशन हो जाती।
हिना को शाहरुख में अपने अब्बा की झलक दिखती थी — खुले विचारों वाला, ज़िंदगी को समझने वाला लड़का।
काश…
काश वो अपनी पसंद से जी पाती। मगर इस घर में लड़की की पसंद का क्या मतलब?
किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी।
"आ जाओ," कबीर ने कहा, और वो वापस फाइल की तरफ देखने लगा।
अयान अंदर आ गया।
"भाईजान, कैसे हैं आप?" उसने मुस्कुराकर पूछा।
कबीर ने बिना मुस्कराए फाइल से नज़र उठाई और उसकी तरफ देखा, "काम बताओ," उसने सीधा कहा।
अयान थोड़ा मुस्कराया और कमरे के भीतर आकर बेड पर बैठ गया। कबीर की आँखों में ठंडी-सी नज़रें थीं।
"कुछ चाहिए था?" उसने रूखे लहजे में पूछा।
अयान हल्के से हँसा, "नहीं, बस मिलने चला आया… देखना था कि आप कैसे हैं।"
"जैसा हमेशा था, वैसा ही हूँ," कबीर ने नज़रें वापस फाइल पर टिकाईं, "अब बताओ, असल बात क्या है?"
अयान ने गहरी साँस ली, फिर मुस्कराकर बोला, "पता है, आजकल घर में आपकी और हिना की शादी की बातें चल रही हैं।"
कबीर ने उसकी तरफ देखा नहीं, सिर्फ हल्का-सा सिर हिलाया, जैसे ये बात नई न हो।
अयान, जो भले ही कबीर से छोटा था, लेकिन हिना से उम्र में बड़ा था, थोड़ा रुककर बोला, "मैं सोच रहा था… आप दोनों साथ में कितने अच्छे लगेंगे।"
"तो सोचते रहो," कबीर ने सूखी आवाज़ में कहा, "लेकिन जहां से आए हो, वहाँ लौट जाओ।"
अयान को थोड़ी हैरानी हुई, "इतना भी क्या सख्त मिज़ाज होना, भाईजान? अब तो भाभी ही आपको सीधा करेंगी।"
इस पर कबीर ने पहली बार उसकी तरफ सीधी नज़र से देखा, उसकी नज़र तीखी थी, मगर अंदर कोई खामोशी भी थी।
"अब जो जहां से तुम्हारी बातें हो चुकी हैं…
अयान ने मुस्कुराते हुए सिर झुकाया, "ठीक है भाईजान, मैंने तो बस बात करने की कोशिश की थी।"
अयान चुपचाप उठकर कमरे से बाहर चला गया।