गांव मे ईमानदारी की परीक्षा - Chapter 3
नेहा के बाद गुरुजी ने सब बच्चों से कहा,
“बच्चों, क्या तुम जानते हो कि सिर्फ स्कूल ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को ईमानदारी की ज़रूरत होती है?”
सबने सिर हिलाया।
“तो क्यों न हम इस नकली नोट का उपयोग करके पूरे गाँव में एक सच्चाई की परीक्षा करें?”
कबीर ने पूछा, “कैसे गुरुजी?”
गुरुजी बोले, “अब ध्यान दो। हम नकली नोट को एक प्रयोग के रूप में उपयोग करेंगे। मैं इसे गाँव की चार दुकानों पर दूँगा — लेकिन मैं पहले से दुकानदार को नहीं बताऊँगा कि यह नकली है। हम देखेंगे कौन दुकानदार ईमानदारी से इसे वापस करता है और कौन नहीं।”
सभी बच्चे चकित हो गए।
चिंटू थोड़े घबराए स्वर में बोला, “लेकिन गुरुजी, अगर पकड़े गए तो?”
गुरुजी मुस्कराए, “मैं अपनी पहचान छिपाकर जाऊँगा — जैसे एक आम ग्राहक। फिर तुम्हें पूरी रिपोर्ट दूँगा। यह हमारा समाजिक प्रयोग होगा — ताकि हम जान सकें कि गाँव में कितनी ईमानदारी बची है।”
🏪 पहला दुकानदार – रमेश किराना
अगले दिन गुरुजी साधारण कपड़ों में, बिना अपनी पहचान बताए, रमेश किराने की दुकान पर पहुँचे।
“भाई साहब, एक साबुन दीजिए,” गुरुजी बोले।
रमेश ने मुस्कराते हुए साबुन दिया। गुरुजी ने नकली सौ रुपये का नोट आगे बढ़ाया।
रमेश ने नोट देखा, हल्का सा सिकुड़ा, फिर बोला — “थोड़ा रुकिए…”
वह नोट को रौशनी में ले गया, गौर से देखा, फिर वापस लाकर गुरुजी को पकड़ाते हुए बोला,
“माफ़ कीजिए, यह नोट असली नहीं लगता।”
गुरुजी के चेहरे पर सच्ची मुस्कान फैल गई।
“आपने ठीक किया,” गुरुजी बोले और असली नोट देकर सामान लिया।
बाहर निकलते ही उन्होंने अपनी डायरी में लिखा —
रमेश किराना: ✅
🧃 दूसरा दुकानदार – सुरेश पान वाला
दोपहर को गुरुजी गाँव के कोने में पान की दुकान पर पहुँचे। वहाँ भीड़ कम थी।
“एक पान लगाइए, मीठा वाला,” गुरुजी बोले।
सुरेश पान बनाकर लाया। गुरुजी ने फिर वही नकली नोट बढ़ाया।
सुरेश ने नोट देखा, मुस्कराया, और बिना कुछ बोले नोट जेब में डाल लिया।
गुरुजी को झटका लगा। “भैया, ठीक तो है न?”
सुरेश बोला, “हाँ-हाँ... नया नोट है, छपाई अलग लग रही है।”
गुरुजी ने वहीं खड़े होकर कहा,
“अगर ये नकली है, तो आप क्या करेंगे?”
सुरेश थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला,
“अब तो ले लिया है... आगे देखा जाएगा।”
उसने उसे अपना नोट वापस मागा फिर
गुरुजी ने गहरी साँस ली और बिना कुछ कहे वहाँ से चल दिए।
डायरी में लिखा गया:
सुरेश पान वाला: ❌ फेल
📚 तीसरा दुकानदार – गीता दीदी की स्टेशनरी
गुरुजी अब गाँव की स्कूल के पास वाली दुकान पर पहुँचे — जहाँ गीता दीदी स्टेशनरी की छोटी दुकान चलाती थीं।
गुरुजी ने कहा, “एक पेंसिल और रबर दीजिए।”
गीता दीदी ने सामान दिया। गुरुजी ने नकली नोट थमाया।
गीता दीदी ने देखा, मुस्कराईं, फिर बोलीं,
“गुरुजी, यह नोट तो थोड़ा अजीब लग रहा है। आपने ध्यान नहीं दिया क्या?”
गुरुजी ने कहा, “क्या फर्क पड़ता है?”
गीता दीदी ने गंभीरता से कहा,
“ईमानदारी हर जगह ज़रूरी है, चाहे ग्राहक हो या दुकानदार।”
गुरुजी ने चुपचाप असली नोट दिया और मुस्कराते हुए बोले,
“आप पास हो गईं। मैं महेश गुरुजी हूँ — यह एक सामाजिक प्रयोग था।”
गीता दीदी थोड़ा शर्माईं लेकिन गर्व से मुस्कराईं भी।
डायरी में लिखा गया:
गीता स्टेशनरी: ✅ पासस्थान: ग्राम हरिपुर का सरकारी प्राथमिक विद्यालय
समय: मार्च का पहला सप्ताह, परीक्षा से कुछ दिन पहले
हरिपुर गाँव के इस सरकारी विद्यालय में जहाँ एक तरफ टूटे हुए बेंच, छत से झूलते पंखे और दीवारों पर धुंधले पोस्टर लगे थे, वहीं एक व्यक्ति था जो इन दीवारों से कहीं ज़्यादा रोशनी फैलाता था — महेश गुरुजी।
महेश गुरुजी को लोग प्यार से "अतरंगी गुरुजी" कहते थे, क्योंकि वे पढ़ाने के अजब-गजब तरीके अपनाते थे। कभी बच्चों को खेतों में ले जाते, कभी मंदिर की सफाई करवाते, और कभी पूरा स्कूल मैदान में बिठाकर कहानी सुनाते। और उनके इस अतरंगी व्यवहार से बच्चों को भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है ऐसा कुछ जो शायद बच्चे पढ़ कर ना सीख पाए पर उसको प्रेक्टिकल करके सीख सकते हैं और महेश गुरूजी के पढ़ने का तरीका ही इतना मस्त होता है कि बच्चों को क्या साथ पढ़ने में मजा आता है।
आज सोमवार था। मार्च की सुबह हल्की गरम और खुशनुमा थी। आरव, सिया, चिंटू, नेहा और कबीर – पाँचों बच्चे अपनी अपनी सीट पर बैठे थे। लड़कियों ने दो चोटी रिबन बंदे और लड़की भी बिल्कुल स्कूल यूनिफॉर्म पर वाइट शर्ट ब्लू पेंट टाई बेल्ट और जूते सब अपनी-अपने जगह पर बैठे थे ओर घंटी बज चुकी थी, लेकिन गुरुजी अभी तक नहीं आए थे। यह थोड़ी अजीब बात थी, क्योंकि गुरुजी कभी देर नहीं करते थे। गुरुजी हमेशा वक्त के पाबंद रहे हैं।
तभी दरवाज़ा खुला और महेश गुरुजी हाथ में कुछ पकड़े हुए भीतर आए। महेश गुरूजी एकदम सिंपल सादे इंसान व्हाइट शर्ट ब्लैक पेंट एक हाथ में घड़ी माथे पर कुमकुम का टीका और हाथ में पड़े कुछ किताबें आंखों पर चश्मा काली आंखें दिखाने में जितने सीधे दिखते हैं उतने ही समझदार और दिमाग के तेज हमारे महेश गुरूजी।
“बच्चो…” उन्होंने गंभीर आवाज़ में कहा, “आज एक बहुत ही अनोखी चीज़ तुम्हारे साथ साझा करनी है।”
सबके कान खड़े हो गए। सब सोचने लगे आज क्या गुरुजी मजेदार सिखाने वाले हैं।
गुरुजी ने धीरे से अपनी जेब से एक सौ रुपये का नोट निकाला और हवा में लहराते हुए बोले, सब जानते हो क्या
“ये क्या है?”
“नोट!” आरव ने सबसे पहले जवाब दिया।
“कितने रुपये का?” सिया ने पूछा।
“सौ रुपये का!” चिंटू चिल्लाया।
गुरुजी मुस्कराए, “ठीक है। अब ध्यान से देखो। और मुझे बताओ कि तुम्हें क्या दिख रहा है”
उन्होंने वह नोट सबको पास से दिखाया। नोट असली जैसा ही लग रहा था, लेकिन उसमें कुछ गड़बड़ थी – रंग थोड़ा हल्का था, गांधी जी की तस्वीर थोड़ी झुकी हुई थी, और नम्बरिंग की छपाई कुछ अलग।
“ये नोट नकली है।” गुरुजी बोले।
कक्षा में सन्नाटा छा गया। सब बच्चे विचार करने लगे यह क्या है यह क्या यह सच है ऐसा भी कुछ होता है हम बच्चों को क्या मालूम नकली और असली नोट भी होते हैं।
नेहा ने धीरे से पूछा, “गुरुजी, नकली नोट? आपके पास कैसे आया?”
गुरुजी ने मुस्कराते हुए कहा, “वही तो आज की कहानी है।”
साथ में तुम लोगों का इम्तिहान भी है और अब देखते हैं कौन-कौन इसमें सफल होता है तो तुम सब तैयार हो*
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priyanka bagani.....