नकली नोट - Chapter 1
स्थान: ग्राम हरिपुर का सरकारी प्राथमिक विद्यालय
समय: मार्च का पहला सप्ताह, परीक्षा से कुछ दिन पहले
हरिपुर गाँव के इस सरकारी विद्यालय में जहाँ एक तरफ टूटे हुए बेंच, छत से झूलते पंखे और दीवारों पर धुंधले पोस्टर लगे थे, वहीं एक व्यक्ति था जो इन दीवारों से कहीं ज़्यादा रोशनी फैलाता था — महेश गुरुजी।
महेश गुरुजी को लोग प्यार से "अतरंगी गुरुजी" कहते थे, क्योंकि वे पढ़ाने के अजब-गजब तरीके अपनाते थे। कभी बच्चों को खेतों में ले जाते, कभी मंदिर की सफाई करवाते, और कभी पूरा स्कूल मैदान में बिठाकर कहानी सुनाते। और उनके इस अतरंगी व्यवहार से बच्चों को भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है ऐसा कुछ जो शायद बच्चे पढ़ कर ना सीख पाए पर उसको प्रेक्टिकल करके सीख सकते हैं और महेश गुरूजी के पढ़ने का तरीका ही इतना मस्त होता है कि बच्चों को क्या साथ पढ़ने में मजा आता है।
आज सोमवार था। मार्च की सुबह हल्की गरम और खुशनुमा थी। आरव, सिया, चिंटू, नेहा और कबीर – पाँचों बच्चे अपनी अपनी सीट पर बैठे थे। लड़कियों ने दो चोटी रिबन बंदे और लड़की भी बिल्कुल स्कूल यूनिफॉर्म पर वाइट शर्ट ब्लू पेंट टाई बेल्ट और जूते सब अपनी-अपने जगह पर बैठे थे ओर घंटी बज चुकी थी, लेकिन गुरुजी अभी तक नहीं आए थे। यह थोड़ी अजीब बात थी, क्योंकि गुरुजी कभी देर नहीं करते थे। गुरुजी हमेशा वक्त के पाबंद रहे हैं।
तभी दरवाज़ा खुला और महेश गुरुजी हाथ में कुछ पकड़े हुए भीतर आए। महेश गुरूजी एकदम सिंपल सादे इंसान व्हाइट शर्ट ब्लैक पेंट एक हाथ में घड़ी माथे पर कुमकुम का टीका और हाथ में पड़े कुछ किताबें आंखों पर चश्मा काली आंखें दिखाने में जितने सीधे दिखते हैं उतने ही समझदार और दिमाग के तेज हमारे महेश गुरूजी।
“बच्चो…” उन्होंने गंभीर आवाज़ में कहा, “आज एक बहुत ही अनोखी चीज़ तुम्हारे साथ साझा करनी है।”
सबके कान खड़े हो गए। सब सोचने लगे आज क्या गुरुजी मजेदार सिखाने वाले हैं।
गुरुजी ने धीरे से अपनी जेब से एक सौ रुपये का नोट निकाला और हवा में लहराते हुए बोले, सब जानते हो क्या
“ये क्या है?”
“नोट!” आरव ने सबसे पहले जवाब दिया।
“कितने रुपये का?” सिया ने पूछा।
“सौ रुपये का!” चिंटू चिल्लाया।
गुरुजी मुस्कराए, “ठीक है। अब ध्यान से देखो। और मुझे बताओ कि तुम्हें क्या दिख रहा है”
उन्होंने वह नोट सबको पास से दिखाया। नोट असली जैसा ही लग रहा था, लेकिन उसमें कुछ गड़बड़ थी – रंग थोड़ा हल्का था, गांधी जी की तस्वीर थोड़ी झुकी हुई थी, और नम्बरिंग की छपाई कुछ अलग।
“ये नोट नकली है।” गुरुजी बोले।
कक्षा में सन्नाटा छा गया। सब बच्चे विचार करने लगे यह क्या है यह क्या यह सच है ऐसा भी कुछ होता है हम बच्चों को क्या मालूम नकली और असली नोट भी होते हैं।
नेहा ने धीरे से पूछा, “गुरुजी, नकली नोट? आपके पास कैसे आया?”
गुरुजी ने मुस्कराते हुए कहा, “वही तो आज की कहानी है।”
साथ में तुम लोगों का इम्तिहान भी है और अब देखते हैं कौन-कौन इसमें सफल होता है तो तुम सब तैयार हो*
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समय: मार्च का पहला सप्ताह, परीक्षा से कुछ दिन पहले
हरिपुर गाँव के इस सरकारी विद्यालय में जहाँ एक तरफ टूटे हुए बेंच, छत से झूलते पंखे और दीवारों पर धुंधले पोस्टर लगे थे, वहीं एक व्यक्ति था जो इन दीवारों से कहीं ज़्यादा रोशनी फैलाता था — महेश गुरुजी।
महेश गुरुजी को लोग प्यार से "अतरंगी गुरुजी" कहते थे, क्योंकि वे पढ़ाने के अजब-गजब तरीके अपनाते थे। कभी बच्चों को खेतों में ले जाते, कभी मंदिर की सफाई करवाते, और कभी पूरा स्कूल मैदान में बिठाकर कहानी सुनाते। और उनके इस अतरंगी व्यवहार से बच्चों को भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है ऐसा कुछ जो शायद बच्चे पढ़ कर ना सीख पाए पर उसको प्रेक्टिकल करके सीख सकते हैं और महेश गुरूजी के पढ़ने का तरीका ही इतना मस्त होता है कि बच्चों को क्या साथ पढ़ने में मजा आता है।
आज सोमवार था। मार्च की सुबह हल्की गरम और खुशनुमा थी। आरव, सिया, चिंटू, नेहा और कबीर – पाँचों बच्चे अपनी अपनी सीट पर बैठे थे। लड़कियों ने दो चोटी रिबन बंदे और लड़की भी बिल्कुल स्कूल यूनिफॉर्म पर वाइट शर्ट ब्लू पेंट टाई बेल्ट और जूते सब अपनी-अपने जगह पर बैठे थे ओर घंटी बज चुकी थी, लेकिन गुरुजी अभी तक नहीं आए थे। यह थोड़ी अजीब बात थी, क्योंकि गुरुजी कभी देर नहीं करते थे। गुरुजी हमेशा वक्त के पाबंद रहे हैं।
तभी दरवाज़ा खुला और महेश गुरुजी हाथ में कुछ पकड़े हुए भीतर आए। महेश गुरूजी एकदम सिंपल सादे इंसान व्हाइट शर्ट ब्लैक पेंट एक हाथ में घड़ी माथे पर कुमकुम का टीका और हाथ में पड़े कुछ किताबें आंखों पर चश्मा काली आंखें दिखाने में जितने सीधे दिखते हैं उतने ही समझदार और दिमाग के तेज हमारे महेश गुरूजी।
“बच्चो…” उन्होंने गंभीर आवाज़ में कहा, “आज एक बहुत ही अनोखी चीज़ तुम्हारे साथ साझा करनी है।”
सबके कान खड़े हो गए। सब सोचने लगे आज क्या गुरुजी मजेदार सिखाने वाले हैं।
गुरुजी ने धीरे से अपनी जेब से एक सौ रुपये का नोट निकाला और हवा में लहराते हुए बोले, सब जानते हो क्या
“ये क्या है?”
“नोट!” आरव ने सबसे पहले जवाब दिया।
“कितने रुपये का?” सिया ने पूछा।
“सौ रुपये का!” चिंटू चिल्लाया।
गुरुजी मुस्कराए, “ठीक है। अब ध्यान से देखो। और मुझे बताओ कि तुम्हें क्या दिख रहा है”
उन्होंने वह नोट सबको पास से दिखाया। नोट असली जैसा ही लग रहा था, लेकिन उसमें कुछ गड़बड़ थी – रंग थोड़ा हल्का था, गांधी जी की तस्वीर थोड़ी झुकी हुई थी, और नम्बरिंग की छपाई कुछ अलग।
“ये नोट नकली है।” गुरुजी बोले।
कक्षा में सन्नाटा छा गया। सब बच्चे विचार करने लगे यह क्या है यह क्या यह सच है ऐसा भी कुछ होता है हम बच्चों को क्या मालूम नकली और असली नोट भी होते हैं।
नेहा ने धीरे से पूछा, “गुरुजी, नकली नोट? आपके पास कैसे आया?”
गुरुजी ने मुस्कराते हुए कहा, “वही तो आज की कहानी है।”
साथ में तुम लोगों का इम्तिहान भी है और अब देखते हैं कौन-कौन इसमें सफल होता है तो तुम सब तैयार हो*
plz follow me....
priyanka bagani.....