एक राज़ 🔥रूहानी सफ़र का By Archana Thakur Ch. 3

एक राज़ 🔥रूहानी सफ़र का - Chapter 3

Posted by Archana Thakur • Jul 28, 2025 08:00 PM

नर्स बाहर बरामदे तक लगभग दौड़ती हुई आती है तो सब हैरानी से उसका चेहरा देखते रह जाते है| इससे पहले कि जतिन या निधि के परिवार से कोई उससे कुछ पूछता नर्स आगे बढ़ जाती है| अब सब उसी दिशा की ओर देखते रहे| आपस में उनकी ख़ामोशी ही एक दूसरे के लिए मौन सहारा थी| सब देखते है कि डॉक्टर अब तेजी से वही चले आ रहे है साथ ही उनके पीछे पीछे नर्स भी चली आ रही है ये देख सब उनकी ओर लपकते है पर डॉक्टर उन्हें अपने हाथ से रुकने का इशारा करते हुए निधि के वार्ड तक अपने कदम तेज कर देते है|

सभी वही थमे रह जाते है| अन्दर जाती नर्स जैसे परिवार की मनोदशा समझती हुई धीरे से उनकी तरफ देखती हुई कहती है – “आपके पेशंट को होश आ गया है |” और अन्दर की ओर चल देती है|

नर्स की बात सुन जैसे सारे परिवार के मुरझाए चेहरे को नवजीवन मिल गया| वे एक दूसरे को अपनी अपनी मुस्कानों से बधाइयाँ देने लगे|

डॉक्टर और नर्स का वे सभी बेचैनी से बाहर इंतजार कर रहे थे| अगले कुछ क्षण बाद डॉक्टर बाहर आते है और परिवार की तरफ देखने लगते है जिससे सभी लगभग दौड़ते हुए उनके पास आते हुए एक जैसा प्रश्न कर बड़ी हसरत से डॉक्टर की तरफ देखने लगते है|

डॉक्टर गहरा उच्छ्वास छोड़ते एक एक का चेहरा देखते हुए धीरे से कहना प्रारंभ करते है – “देखिए आपके पेशंट की हालत अभी भी स्थिर बनी हुई है – नर्स ने मुझे आकर बताया कि पेशंट ने अपनी ऑंखें झपकाई पर जबतक मैं आया वह फिर कोमा में चली गई|”

एक ही क्षण में हँसते चेहरे फिर मुरझा गए|

“होप फॉर बेस्ट |” कहते हुए डॉक्टर तेज क़दमों से अपने केबिन की ओर बढ़ गए|

सब एक दूसरे का चेहरा देखते रहे इसी बीच जतिन तेजी से उठता हुआ निधि के वार्ड के दरवाजे पर खड़ा उस गोल शीशे से अन्दर की ओर अपनी नज़रे फेंक उसे देखने का प्रयास करता है|

बेड पर निस्तेज लेटी निधि की ऑंखें अभी भी बंद थी और पास ही खड़ी नर्स एक एक कर उसके शरीर से जुड़े मशीनी उपकरणों को चेक करती हुई एक नोट पैड पर लिखती जा रही थी| जतिन उस ख़ामोशी में भी निधि के आस पास की मशीनी आवाजो को सुनता हुआ उसकी क्लांत धड़कनों को दूर से ही महसूस कर पा रहा था| उस पल एक बेबसी सी उसके चेहरे पर उमड़ आई जिसे छुपाने जतिन तेजी से तुरंत गलियारे के दूसरी ओर अपने कदम बढ़ा देता है|

सब जतिन की स्थिति समझ रहे थे पर वे सब खुद हालातों के आगे बेबस थे तभी जतिन के पीछे निधि के भाई धीरज को जाते देख सब फिर वार्ड के बाहर अपनी अपनी सुनिश्चित जगह पर आकर बैठ गए|

“मुझे लगता है आपको आराम करने अब होटल वापस चले जाना चाहिए – सुबह से आप एक पैर पर खड़े है|”

समधी की हमदर्दी पर निधि के पिता का मन आद्र हो उठा| वे धीरे से अपना बोझिल चेहरा उठाते हुए कहते है – “आप भी तो कल से जब से आए है कहाँ आराम करने गए - |”हताशा में एक गहरा स्वांस लेते हुए कहते रहे – “अब जो ईश्वर की रज़ा होगी वही होगा – मेरे हिसाब से बहुत रात हो रही है और दामाद जी भी दस दिन से यही डटे है – मेरा कहा मानिए आप सब लोग आराम करिए - आज हम यही रुकते है|”

सभी एक दूसरे का सहारा बने एक दूसरे को वक़्त और ईश्वर पर भरोसा रखने को कहते फिर खामोश हो गए| लेकिन डॉक्टर वहां भीड़ कम करने का इशारा दे चुके थे तो अब सभी ने होटल वापस जाने की तैयारी शुरू कर दी| हमेशा की तरह जतिन वहां से हिलने को तैयार नही था, उसे लगता पता नही कब निधि को होश आ जाए और तब वह झट से उसका हाथ थामे उसे अकेला छोड़ देनी की माफ़ी मांग ले| लेकिन मन मसोजे उसे जाना पड़ा और इस बार सभी को जबरन आराम करने भेज कर वहां निधि का भाई धीरज अपनी माँ के साथ रुक गया|

जैसलेर की ठंडी रातें अपना विस्तार तेज करने लगी थी| यहाँ दिन जितना तपता था रातें उतनी ही ठंडी हो जाती| दिन भर स्वर्ण सा दमकता ये शहर रात की चांदनी ओढ़े चुपचाप सो रहा था पर निधि के वार्ड के बाहर उसकी माँ धड़कती धड़कनों के साथ क्लांत बैठी थी| धीरज अपनी माँ को दिलासा दे रहा था और वे गुज़रे वक़्त को लगातार कोस रही थी| फिर आधी रात होते होते माँ को आराम करने की स्थिति में वह बैंच में लेटा कर साथ वाली बैंच पर पैर फैला कर लेट जाता है, पर रूठी हुई नींद में वह बार बार अपना पहलू बदलता रहता| आखिर बहुत देर बाद ऊब कर धीरज उठकर बैठ गया, उसने समय देखा रात के एक बज रहे थे, बगल की बैंच पर उसकी माँ अभी भी सो रही थी| सुबह होने में अभी काफी समय था और नींद न आने से उसे कॉफ़ी पीने की बेहद तलब उठी तो वह हॉस्पिटल के कैंटीन की ओर चल दिया|

धीरज उनसे दूर जा चुका था और उनकी माँ आँख बंद किए लेटी थी कि अचानक एक आवाज पर उनका समस्त ध्यान अपने बगल की खाली जगह पर आ सिमटा|

“माँ ...!!”

वे अवाक् देखती रह गई निधि उनके बगल में बैठी उन्हें ही पुकार रही थी|

***

“माँ – माँ – माँ|” वे आवाज़ सुन हडबडा कर उठ बैठी| वे अपनी निन्दासी आँखों को मलती हुई अपने पैर बैंच से नीचे करती हुई देखती है कि ठीक उनके बगल वाली बैंच पर कोई बैठी है| वह हॉस्पिटल के बरामदे की हलकी रौशनी में देखती है कि हॉस्पिटल के कपड़ों में वह तो निधि थी| ये देखते वह झट से उसके पास सरकती हुई बोल उठी – “निधि तू ठीक हो गई – मेरी बच्ची कैसी है तू !!” माँ का दिल ममता से उमड़ पड़ा|

वे सरकती हुई निधि के पास आती है, वे उसका हाथ पकड़ती हुई उसका चेहरा देखती है कि शांत सपाट चेहरे पर अनजाने भाव से वह उनकी तरफ बिना देखे ही माँ बुला रही थी| उन्हें लगा बेटी के शरीर में दर्द है वे उसका हाथ सहलाने लगती है| उस पल उसका हाथ बर्फ सा ठंडा था, वे चौंक कर कहती है – “तुम्हेँ तो ठण्ड लग रही है – देखो कैसा सर्द पड़ा है हाथ – पर उठकर क्यों आई – रुको मैं डॉक्टर को बुलाती हूँ – तुम्हें दवाई देंगे न तो देखना सब ठीक हो जाएगा – जाने क्या हाल कर दिया इस जैसलमेर ने मेरी बेटी का |”

“माँ – माँ |”

“हाँ बेटा – मैं अभी डॉक्टर को बुला कर लाती हूँ |” झट से उसका हाथ नीचे रखती हुई वे अपनी हर संभव कोशिश में फुर्ती से उठ जाती है और तेज़ी से बरामदे से बाहर अपने कदम बढ़ा लेती है|

वे अपने तेज़ क़दमों से डॉक्टर के पास पहुँच जाना चाहती थी इसी जल्दबाजी में गलियारे से मुडती हुई वे किसी से टकरा जाती है, वे बस टकरा कर गिरने ही वाली थी पर उन हाथों ने उन्हें संभाल लिया|

“माँ कहाँ जा रही हो ?” वो धीरज था, माँ सिर उठाकर देखती है|

“क्या हुआ माँ – इतनी जल्दी में कहाँ जा रही है आप ?” वह अभी भी माँ को संभाले था जो अपनी जल्दबाजी में अपनी चढ़ती सांसो पर नियंत्रण करने का प्रयास कर रही थी|

फिर किसी तरह से अपनी सांसो को सभालती हुई वे अपने पीछे की ओर इशारा करती हुई कहतीं है – “निधि को होश आ गया बेटा – जरा जल्दी से डॉक्टर को बुला ला - |”

“क्या – सच में – अच्छा मैं बुलाता हूँ आप वही उसके पास चलिए !” वह अपनी माँ को संभाले हुए निधि के वार्ड तक आता है|

“आप यही बैठिए|” माँ को बैंच पर बैठा कर वह देखता है कि माँ अपने आस पास बेचैनी से देख रही थी|

“क्या हुआ माँ ?”

माँ जल्दी से कहती है - “निधि यही तो बैठी थी |”

“क्या कह रही हो आप वो यहाँ कैसे आ सकती है |” वह अपनी माँ का आश्चर्य में डूबा चेहरा देखता हुआ कहता है – “आपने कोई सपना तो नहीं देखा !!”

माँ बिफ़रती हुई झट से उठ गई और वार्ड के दरवाजे की ओर बढ़ गई इसपर धीरज भी उनके पीछे पीछे हो लिया| जब तक वह कुछ समझता माँ उसका दरवाजा खोल अन्दर आ गई| अब वे दो जोड़ी ऑंखें देखती है कि निधि अभी भी बेड पर निस्तेज लेटी थी|

धीरज तुरंत कहती है - “देखा माँ – ये तो यहाँ है |”

माँ औचक उस ओर देखती रही और इस हलचल से वहां किनारे कुर्सी पर अपने घुटनों पर सर टिकाए उंघती नर्स एकदम से उठ बैठी|

“क्या हुआ माता जी !”

नर्स आश्चर्य से उनकी तरफ देख रही थी|

“कोई बात है क्या - ?”

“नही नही माँ को भ्रम सा हो गया कि निधि बाहर आई थी !”

धीरज की बात सुन नर्स को जैसे हलकी हँसी आ गई पर जल्द ही उसपर काबू करती हुई वह कहती है – “भ्रम ही हुआ होगा क्योंकि ऐसी हालात में मरीज न खुद उठ पता है और न मैं इतनी बेखबर यहाँ बैठी थी – आप फ़िक्र न करे सब ठीक है – माता जी ने जरुर कोई सपना देखा होगा|”

नर्स की बात सुन वे और परेशान हो उठी – “मैं सच कहती हूँ वो कोई सपना नहीं था – बेटा तुम तो यकीन करो मेरा – सच में निधि मेरे पास आई थी मैंने उसका हाथ भी पकड़ा था – कितना सर्द था उसका हाथ |” वे कहती कहती निधि के पास पहुँच कर उसकी हथेली पकड़ती हुई कहती है – “ये देखो उसका हाथ अभी भी कितना सर्द है |” वे घबराहट में कभी बेटे की ओर देखती तो कभी नर्स की ओर जो अभी भी आश्चर्य से उनकी तरफ देख रही थी|

नर्स जल्दी से उठकर उनके पास आती हुई कहती है – “माता जी ग्लुकोस चढ़ता है तो शरीर ऐसे ही ठंडा रहता है – मुझे लगता है आप ने जरुर कोई सपना देखा है तभी आप परेशान हो उठी – आप बेफिक्र रहिए मैं हूँ यहाँ |” वे ढांढस बंधाती हुई उनके कंधे पर अपना हाथ रखती हुई कहती है इस पर धीरज आगे बढ़कर माँ को संभालते हुए उन्हें बाहर की ओर ले जाते हुए समझाता रहता है –

“अभी आप बाहर चलिए – थोड़ा आराम करिए – सुबह हम डॉक्टर से बात करते है |”

माँ बेबसी में एक पल निधि के सुप्त चेहरे को देखती हुई हताश होती बाहर की ओर चल देती है|

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