जूनुनि प्यार कि दास्तां Ch. 3

जूनुनि प्यार कि दास्तां - Chapter 3 ( वाइल्ड इंटीमेसी )

Posted by Moon Star • Jul 02, 2025 11:48 AM

*Chapter 3**

शगुन बाथरूम का दरवाज़ा खोलती हैं, बाथरूम से हल्की-हल्की भांप उठ रही थी। गर्म पानी की फुहारों के बीच, माधवन बिना कपड़ों के शावर के नीचे खड़ा था, शगुन माधवन को ऐसे देखकर शर्माती है, और उसकी धीमी आवाज़ माधवन के कानों में पड़ती हैं, " माधवन...." माधवन शगुन की तरफ मुड़ कर गुस्से में दांत भींच कर बोला," तुम अब तक यूं ही खड़ी, फटफट कपड़े उतार "

शगुन माधवन की बात सुनकर बोली," आप ही उतार दिजिए," माधवन बेमन से शगुन की नाइटी फाड़ कर बाथरूम के कोने में फेंक कर बोला," तुम कुछ ज्यादा ही फिल्में देखने लगी हो," फिर माधवन शगुन की ब्रा और पैंटी भी उतार कर दीवार से सटा देता, और वो शर्म कर मुड़ जाती हैं, शगुन दीवार से टेक लगाए खड़ी थी। माधवन पीछे से आया, उसने बिना कुछ कहे उसकी कमर थामी, और होंठ उसकी गर्दन पर रख दिए।

शगुन ने अपनी आंखें बंद कर लीं। ये वही पल था जिसका सपना वो किताबों में हर रात देखती थी। उसका बदन सिहर गया, उसने धीमे से अपने हाथ माधवन के सीने पर रख दिए। “अब तो वक्त मिला तुम्हें…” शगुन ने हौले से कहा, आवाज़ में शिकायत घुली हुई थी।

माधवन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसके हाथ फिसलते हुए उसके पेट से नीचे सरका गए गुप्त अंग पर। बदन से गर्म पानी की बूंदें फिसल रही थीं, लेकिन शगुन की आंखें अब भी बंद थीं — शायद वो उस एहसास को पकड़ना चाहती थी, जो अब तक हर बार अधूरा रह जाता था। माधवन ने उसे मोड़ा, और अगले ही पल उसको अपने आगोश में भर लिया, शगुन कांप उठी, माधवन हमेशा ऐसी ही बेरूखी से उसको अपने आगोश में भर लेता था, कोई फोरप्ले नहीं, बस सीधे फिजिकल रिलेशन| कभी उसके उभार को काटता तो कभी उसे किसी छोटे बच्चे जैसे चूस ने लगता | फिर वो अपने हार्डनेस को शगुन कि सोफ्टनेस पर रख , अंदर धकेल देता है शगुन कि चिख निकली और पुरे। बाथरूम में गुज गई ,

माधवन शगुन की कमर पकड़ कर अपनी कमर मूव कर रहा था, ना कोई प्यार ना कोई नर्मी, शगुन माधवन के कंधे पकड़ कर सिसकियां ले रही थी, शगुन की सिसकियों से बाथरूम भर चुका था, कुछ पल…

सिर्फ दो नग्न जिस्मों की टकराहट। कोई बात नहीं… कोई इमोशन नहीं।

कुछ ही मिनटों में सब खत्म हो गया। माधवन ने शावर बंद किया, टॉवेल लपेटा और बाहर निकलने लगा।

शगुन वहीं खड़ी रह गई। उसकी आंखें खुलीं — वो गीली ज़मीन पर अब भी अकेली थी। एक दम नेक्ड,उसने धीरे-धीरे एक तौलिया लिया और खुद को लपेटते हुए बाहर आई।

माधवन बाल सुखा रहा था। शगुन लड़खड़ाते हुए उसके पास आई, और पीछे से उसे गले लगा लिया।

"थोड़ी देर और पास रहो ना, अभी मेरा मन नहीं भर" उसकी आवाज़ बहुत नरम थी, जैसे किसी टूटते सपने से बाहर आने की कोशिश कर रही हो। माधवन ने आईने में उसकी परछाईं को देखा, फिर सीधे हो कर उसके हाथ अलग किए और दो कदम पीछे हुआ। "और कितना रोमांस करोगी ?" उसकी आवाज़ में झुंझलाहट थी।

शगुन ठिठक गई।"मतलब?" उसने धीमे से पूछा।

"हर बार तुम्हें नजदीकियां चाहिए… प्यार, स्पर्श, फीलिंग्स… ये सब कोई फिल्मी कहानी नहीं है।"

शगुन की आंखें भर आईं। "मैं सिर्फ तुम्हारा साथ चाहती हूं… कुछ लम्हे, जो सिर्फ हमारे हों।" माधवन ने गहरी सांस ली और तौलिया रखकर कुर्सी पर बैठ गया। वो इस वक्त भी बिन कपड़े था और शगुन भी ,

"मैं पूरी रात ऑफिस में था… सर फट रहा है। और तुम यहां अपनी अधूरी फैंटेसी लिए मुझे बहस कर रही हो… सोचो ज़रा, तुम्हें क्या चाहिए हर वक्त?" शगुन चुप रही। उसके पैरों के नीचे जैसे ज़मीन ही नहीं बची थी।

"तुम्हें क्या लगता है, ये सब आसान होता है? काम, प्रेशर, लाइफ… और ऊपर से ये रोमांस की भूख," माधवन अब सीधे उसकी आंखों में देख रहा था।

"और मेरी जिस्म कि भूख का क्या?" शगुन की आवाज़ टूटने लगी थी, "तुम तो ऑफिस में थक जाते हो… मैं क्या करूं? पूरी रात किताबों के साथ, अकेली?" माधवन उठ खड़ा हुआ। "तो छोड़ दो वो किताबें… उन्हीं में डूबी रहती हो। असली ज़िंदगी में थोड़ा रियलिटी देखो।"

शगुन की सांसें उखड़ गईं। उसने एक पल को कुछ कहने के लिए मुंह खोला, पर फिर होंठ बंद कर लिए। माधवन ने शर्ट उठाई, पहनते हुए बोला,"मैं बाहर जा रहा हूं, कुछ काम है। ब्रेकफास्ट मत बनाना, बाहर खा लूंगा।" माधवन रेड होकर निकल गया, बिना शगुन की चाहतो की चाहतो की परवाह करें बिना|

शगुन वहीं खड़ी रही, भीगे बाल, खाली आंखें… और एक गले में अटका सवाल ,"क्या मैं सिर्फ किसी की थकान मिटाने का ज़रिया हूं… प्यार नहीं?" शगुन बेड पर बैठ कर रोने लगती हैं, छे महीने में ही उसका पति उससे दूर हो गया, या उसका पति कभी उसके करीब ही नहीं आया|

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