लव इज लव (एक अनोखी शादी) - Chapter 3
रात का समय था जब उस कमरे का तापमान एकदम से गिर चुका था । दत्ता और मानव आमने सामने खड़े थे । मानव के अंदर का गुस्सा फूट पड़ा था । दत्ता को दो थप्पड़ लगाने के बाद उसने एकदम ही दत्ता की कॉलर पकड़ ली । उसे झकझोरते हुए मानव चिल्ला कर बोला "क्या किया आपने मेरी बहन के साथ ? मार दिया ना जैसे बाकी लोगो को मारते हो ?"
दत्ता ने आंखे बंद कर दूसरी तरफ चेहरा कर लिया । उसकी सांसे तेज हो चली थी । मानव की पकड़ उसकी कॉलर पर कस गई "क्या हुआ ? जवाब दो ना ? जब सब कहते थे तब मुझे विश्वास नहीं हुआ । लेकिन आज अपनी आंखों से आपका असली चेहरा देख लिया । बदला लेना था ना आपको मेरे परिवार से ? तो हमे भी मार दिया होता । ये तमाशा करने की क्या जरूरत थी ? बस इतना ही था आपका बदला या कुछ और करना बाकी है अभी? "
दत्ता ने गहरी सांस भर ली । फिर मानव की कलाईया पकड़ कर उसकी भीगी आंखो मे देखा "आज तक मेरे मां बाप ने भी कभी उंगली नही उठाई मुझ पर । दो थप्पड़ मार लेने के बाद तुम कॉलर पकड़ रहे हो?
खैर जिंदगी में हर बारे में अनुभव लेना चाहिए । थोड़ा भारी लगा लेकिन कोई बात नही ।"
दत्ता ने एक हाथ से अपना गाल सहला दिया । विश्वास करना मुश्किल था इतने गंभीर माहोल में वो गंभीरता से ऐसी बात कह रहा था जिसे सुनकर किसी का भी पारा चढ़ जाए ।
"आई हेट यू दत्ता गायकवाड़ । शक्ल भी नही देखना चाहता मै आपकी ।" मानव ने उसकी कॉलर को झटके से छोड़ दिया । लेकिन दत्ता ने दुबारा उसकी कलाईयां पकड़ ली ।
"तू हेट कर , नको करू ... रहना तुम्हे मेरे साथ ही है । शादी जो हुई है हमारी ? वो क्या बोलते है ..... सात जन्म का रिश्ता ! वो जुड़ गया हमारे बीच । जब तक मैं जिंदा हु , या जब तक मुझे तुम याद हो ... मुझसे पीछा नहीं छुड़ा पाओगे ।" दत्ता ने कहा तो उसके चेहरे पर शैतानी मुस्कान थी ।
मानव अपने हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगा । दत्ता ने उसे छोड़ दिया ।
मानव चेहरा फेर कर खड़ा हो गया "नही मानता मैं इस शादी को ना ही किसी रिश्ते को । दूर रहना मुझसे । आज से हमारे बीच दोस्ती का भी रिश्ता नही । आप अजनबी हो मेरे लिए ।"
दत्ता ने आंखे घुमा ली । उसे जरा भी फर्क नही पड़ा था मानव की बात से । उसने एक नजर कमरे में डाली "अब सबसे पहले कपड़े और सामान का इंतेजाम करना होगा अगर यहां रहना है । लगता नही है आई जल्दी घर में आने देगी । तू आराम कर मै पहले तो कुछ खाने के लिए मंगाता हु ।"
मानव ने कोई जवाब नही दिया । आगे बहस बढ़ाकर फायदा भी नही था । क्युकी दत्ता उसकी बातो को गंभीरता से ले ही नही रहा था । बिस्तर पर जाकर उसने खुदको चादर में पूरी तरह ढक लिया । दत्ता ने सर हिला दिया ।
बाहर जाने के लिए उसने जैसे ही कमरे का दरवाजा खोला नीचे कुछ सामान रखा हुआ था । शायद वेधा ने डर के कारण दरवाजा नही खटखटाया । उसमे खाना और कपड़े दोनो थे ।
दत्ता ने अंदर आते हुए कहा "माउ उठ जा , कुछ खाकर सो । "
मानव अपनी जगह से हिला भी नही । दत्ता ने उसकी चादर को हटाया तो मानव ने अपना मुंह तकिए में घुसा लिया ।
"तेरी नाराजगी मुझ पर है । खुदको क्यू तकलीफ दे रहा है? अगर खाना नही खाएगा और तू बीमार हुआ तो तेरी मां क्या कहेगी , मैने उसके माऊं का खयाल नहीं रखा ?" दत्ता ने उसे उठाना चाहा लेकिन मानव भी ठहरा जिद्दी । उसने एक ना सुनी ।
एक मिनट बाद ही मानव के कानो मे दत्ता की आवाज सुनाई दी "हा एकलव्य , माऊ का सामान ला रहे हो ना ? आते हुए सासुमा को बताना उनका बेटा खाना नही खा रहा । हा अब उसके बाद वो भी भूखी रहे तो हमे क्या करना है ?"
मानव झटके से उठ कर पैर पटकते हुए दत्ता के पास आया । उसने फोन छीन लिया , सामने सच में एकलव्य से उसकी बात हो रही थी ।
"खा रहा हु खाना ।" मानव ने रुंधे गले से कहा और फोन काट दिया ।
दत्ता ने कुछ कहने की जगह हल्के से अपना गला खराश दिया । फिर मानव को बैठने का इशारा कर वो प्लेट में खाना निकालने लगा ।
एक निवाला खाया मानव ने और उसकी सिसकियां रोने में बदल गई ।
दत्ता ने परेशान होकर उसे देखा "क्या हुआ ? पसंद नही आया या फिर तीखा है ? तुम रोने लगो ऐसा कुछ नही किया मैने ?"
मानव मुंह खोल कर रोने लगा ।
"अरे ... चुप चुप ! रोना बंद करो ।" दत्ता उसके आगे हाथ हिलाने लगा जैसे किसी बच्चे को धमका रहा हो वो रोया तो उसे मार पड़ेगी । अब क्या करे , उसने आज तक ऐसी परिस्थिति का सामना नहीं किया था । और बिचारे को अनुभव भी चाहिए था हर चीज का ।
अचानक ही दत्ता ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया ताकि वो रोए नहीं । मानव चौक गया मगर उसकी आवाज और रोना बंद जरूर हुआ । दत्ता ने ये देख कर राहत की सांस लेनी चाही । पर उसे कहा पता था उसकी शादी नही जिंदगी भर की कसरत शुरू हुई थी ।
मानव ने उसका हाथ पकड़ा और अगले ही पल जोर से काट लिया । दत्ता की आंखे बंद हुई । ठंडी सिसकारी भरते हुए उसने कहा "आज पता चला तेरी मां ने तेरा नाम माऊ क्यू रखा । ऐसे ही काटता फिरता होगा बचपन में ।"
उसने कहा पर मानव का मुंह नही छोड़ा । क्युकी मानव की आंखे डबडबा गई थी । वो दुबारा रो सकता था इसलिए पहले ही दत्ता ने तैयारी रखी "बच्चो की तरह रो रहे हो ? किसी ने देखा तो क्या कहेगा ?"
मानव भरी आंखों से उसे देखने लगा । दत्ता ने आगे कहा "वादा करो रोना शुरू नही करोगे तो मै हाथ हटा लूंगा। "
मानव ने कुछ पल सोचा और फिर पलके झपका दी तो आंसू बहकर दत्ता के हाथ पर आ गए। लंबी सांस भरते हुए दत्ता ने हाथ हटा लिया। मानव नही रोया जानकर उसे राहत भी मिली।
उसने कहा "जो हुआ वो बदलने नही वाला। रोकर तुम्हे कुछ हासिल भी नहीं होगा। मर्जी हो या ना हो तुम्हे मेरे साथ रहना है।"
मानव ने उलटे हाथ से आंसू साफ किए "मुझे ना रहना हो तो ?"
"पर्याय मैने रखा ही नही तुम्हारे सामने।" दत्ता लापरवाही से बोला । मानव ने नजरे झुका ली । वो जानता था अगर यहां से भाग भी जाए तो कोई फायदा नही होगा । एक मिनट में दत्ता के लोग उसे ढूंढकर दुबारा यहां लाकर पटक देंगे ।
"तो अब दिमाग को ठंडा कर । बाकी मेरे साथ तुम्हे कोई परेशानी नहीं होगी तू जानता है।" दत्ता ने कहा तो मानव झट से खड़ा हो गया।
"मेरा पेट भर गया । बहुत कर लिया आपने आज। इससे ज्यादा मेरे परिवार को परेशान मत करना ।" मानव ने कहा और हाथ धोने चला गया ।
दत्ता ने खाना वैसा ही छोड़ दिया ।
मानव बाहर आया तो वेधा के दिए कपड़ो में उसने चेंज कर लिया था। आकर बिस्तर पर लेटते हुए उसने फिर खुदको चादर में पूरा ढक लिया। अगले ही पल अपने पैर और हाथ फैला कर वो सो गया । दत्ता की आंखे छोटी हो गई । उसके ही दोस्त के घर में उसे बिस्तर पर जगह नही थी । काउच पर तकिया सही कर मुंह बनाते हुए वो लेट गया। आज तक उसके साथ ऐसा कुछ करने की किसी ने हिम्मत नही की थी। मानव ने भी नही । बल्कि वो तो दत्ता को बहुत ज्यादा पसंद करता था। उसकी जिंदगी का अब तक काफी ज्यादा समय दत्ता और उसके दोस्तो के साथ गुजरा । यहां कोई उसके लिए अनजान नहीं था। लेकिन आज दत्ता ने जो भी किया उसकी वजह से मानव का मासूम दिल टुकड़ों में बिखर गया। जिस पर वो आंखे बंद कर विश्वास कर सकता था उसने ही सब बिगाड़ कर रख दिया।
मानव की सिसकियां फिर शुरू हुई तो दत्ता के लिए सो पाना मुश्किल हो गया। कमरे में सीलिंग को घूरने के अलावा वो कुछ नही कर सकता था।
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बालकनी से आते उजाले की तरफ देखते हुए दत्ता समझ गया सुबह हो चुकी थी । एक मिनट भी नहीं सो पाया वो पूरी रात। ना ही मानव की सिसकियां रुकी ! बस कुछ समय पहले ही उसकी आवाज आना बंद हो गई। दत्ता ने उठकर उसे देखा। मानव सो चुका था।
जितना दत्ता ने सोचा था ये सब उससे कही ज्यादा मुश्किल था। उसने मानव से समझदारी की उम्मीद नही की थी। लेकिन वो पहले इतना परेशान भी नही करता था।
तैयार होकर दत्ता जब किचन में पहुंचा तो वेधा को देख उसने सवाल किया "कल रात कहा था ?"
"रात को इंसान सो जाता है मेरे खयाल से ?" वेधा खाना बना रहा था । उसने तिरछी नजर दत्ता पर डाली जो ग्लास में पानी डालकर उसे पी रहा था।
फिर दत्ता ने कहा "तू कमरे में नही था ।"
वेधा ने दिल पर हाथ रख खुद से कहा "मतलब ये सच में चेक करने आया था । अच्छा हुआ नही था मैं कमरे में। वरना तू सच में मेरी बैंड बजा देता । अच्छा हुआ की वो आदमी भी मर गया वरना तेरी फ्रस्ट्रेशन झेलने के बाद दुबारा जन्म लेने की हिम्मत ना करता।"
बात को बदलते हुए वेधा ने शरारत से कहा "शादी का ग्लो चेहरे पर नजर आ रहा है। देखो तो कैसे लाल हो चुके है गाल ?"
दत्ता ने जोर से ग्लास को दूसरी तरफ पटक दिया । वेधा की बात का मतलब उसे साफ समय आया था।
"रोटियां बना तू।" दत्ता ने ठंडी आवाज में कहा ।
"मै बना तो लूंगा लेकिन खाने के लिए कोई आएगा ? मानव कहा है?" वेधा ने सवाल किया ।
"वो सो रहा है ।" दत्ता की आवाज में मायूसी थी। जाकर वेधा की बगल में खड़ा होकर वो मदत करने लगा।
"ठीक से सोया था? आंखे तो पूरी लाल हो चुकी है?" वेधा इस बार गंभीर होकर बोला ।
"ये समय जल्दी से गुजर जाए बस । मुझे अपनी चिंता नही।" दत्ता की आवाज धीमी थी ।
"तू कभी परिणाम की चिंता नही करता। लेकिन ये करते हुए तुझे दस बार सोचना था। तेरे फैसले में किसी ऐसे इंसान की जिंदगी जुड़ी थी जो तेरे लिए सबसे खास है। मुझे पछतावा हो रहा है पहली बार तेरा साथ देकर। मै बता रहा हु , वो मेरे लिए छोटे भाई जैसा है। उससे किसी बात की उम्मीद मत करना वो तुझे समझे या तेरी भावनाओ को समझे। उसे समय दे। और फिर भी कुछ ना हुआ तो उसे शांति से जीने देना। वैसे अब ये होना मुश्किल है। क्युकी दुनिया उसे जीने नही देगी।" वेधा की बातो में नाराजगी झलक रही थी।
"मैने जो किया वो आज गलत लगेगा। पर मेरी नजर में ये जरूरी था। माऊ से बढ़कर मेरे लिए मैं खुद भी नही हु। आगे मुझे कुछ भी कहने की जरूरत नही क्युकी तू सच्चाई से परिचित है।" दत्ता का पूरा ध्यान चॉपिंग बोर्ड पर था और हाथ में चाकू को वो लगातार घुमा रहा था।
वेधा ने उसके हाथ से चाकू ले लिया "तू जा! बाहर इंतजार कर ना? मै अकेला बना लूंगा खाना।"
असली वजह तो ये थी की जैसी हालत में दत्ता था , उसके हाथ से हथियारों को दूर रखना बेहतर था।
इसी बीच कोई जोर जोर से दरवाजा पीटने लगा । वेधा ने उसे जाने का इशारा किया । दत्ता सर हिला कर दरवाजा खोलने चला गया ।
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