लाल जोडे़ का शराप - Chapter 1
अध्याय: "लाल जोड़े का श्राप"
गहरे जंगल की सन्नाटे में, बांसुरी की आवाज भी जैसे खो सी जाती थी। अंधेरे में सिर्फ टहनियों की चरचराहट और पत्तियों की सरसराहट सुनाई दे रही थी। सरजू और पूष्पा की सांसें तेज़ थीं, और उनका दिल दहलीज़ पार करने को तैयार था। वे दोनों जंगल के बीच में किसी अज्ञात शक्ति से भाग रहे थे, जैसे कुछ बुरा उनके पीछे आ रहा हो।
"पूष्पा ! तेज़ चलो!" सरजू ने घबराए हुए स्वर में कहा। उसकी आंखों में डर और शंका के मिश्रण से कुछ झलक रहा था। पुष्पा की हालत भी कुछ वैसी ही थी, लेकिन वह जानती थी कि अगर इस पल को वे हार गए, तो उनका कोई भविष्य नहीं होगा।
"मैं कोशिश कर रही हूं, लेकिन यह जंगल बहुत गहरा है, सरजू!" पुष्पा ने अपने सांस को शांत करते हुए कहा, और उसकी आंखों में एक अदृश्य भय था।
तभी अचानक पुष्पा ने देखा कि उनके सामने एक मंदिर दिखाई दिया। मंदिर की विशाल दीवारें और वहां का माहौल जैसे अजनबी था, लेकिन उन्हें वहां एक असामान्य शांति का एहसास हो रहा था।
"वह देखो, सरजू! मंदिर!" पुष्पा ने हाथ से इशारा करते हुए कहा।
सरजू ने भी तुरंत उसकी ओर देखा और दोनों ने बिना कुछ कहे मंदिर की ओर दौड़ना शुरू कर दिया। जैसे ही वे मंदिर के पास पहुंचे, दोनों बडे खुश हुए सोचे चलो अब सब ठीक होगा |
चांदनी में नहाया पुराने मंदिर की सीढ़ियों पर गिर रही थीं, धूल से अटे हुए थे, लेकिन आँखों में एक जिद थी—साथ रहने की, किसी भी हाल में।
मंदिर खंडहर-सा था, लेकिन उसका गर्भगृह अब भी अखंड था। वहीं पर एक वृद्ध पुजारी बैठा मंत्रों के उच्चारण में लीन था। पुष्पा आगे बढ़ी और पुजारी के सामने हाथ जोड़ कर विनती की—
"पंडितजी, कृपा करें… हमें अभी और इसी क्षण विवाह करना है। हमारे पास समय नहीं है… कोई देख लेगा तो सब बर्बाद हो जाएगा।"
पुजारी ने एक पल उनकी आँखों में देखा। फिर बिना कोई प्रश्न किए, धीरे से उठ खड़ा हुआ।
"मंदिर के पीछे एक छोटी कुटिया है। बेटी, वहाँ जाकर अपने विवाह के वस्त्र धारण कर ले। मैं यहीं तैयारी करता हूँ।"
पुष्पा ने थैले में से लाल जोड़ा निकाला। धूल में लिपटा, लेकिन सपनों से भीगा। मंदिर की बाईं ओर पगडंडी पर चलकर वह उस छोटी-सी कुटिया तक पहुँची। झाड़ियाँ रास्ता रोकती थीं, लेकिन वह बिना रुके बढ़ती गई।
कुटिया में पहुँचते ही उसने द्वार बंद किया। बाहर से सरजू की आवाज़ सुनाई दे रही थी—"जल्दी आओ, पुष्पा… मैं यहीं हूँ।"
पुष्पा ने लाल जोड़ा पहना। दर्पण नहीं था, लेकिन उसने आँखें बंद कीं और माँ का आशीर्वाद अपने माथे पर महसूस किया।
तभी हवा में एक अजीब-सी गंध उठी… जैसे लोबान और पुराने खून की मिली-जुली सी गंध। उसने सिर झटका और द्वार खोला।
मंदिर में लौटते ही, पुजारी ने मंत्रों का उच्चारण शुरू किया। दीयों की लौ काँप रही थी। सरजू ने उसके गले में मंगलसूत्र पहनाया, और सिंदूर भरा और देखते ही देखते दोनों ने साथ फेरे भी ले लिया | पुजारी ने आशिर्वाद दिया | दोनों खुशी से गले मिले
" अब हमें हमारे परिवार कभी अलग नहीं कर सकेगे | पुष्पा आज हमारे प्यार कि जीत हुई है, " सरजू ने खुश से मुस्कुरा कर कहा |
अब सब कुछ शांत और सुखद लग रहा था | अचानक ही एक तेज़ आंधी का झोंका आ गया। मंदिर के चारों ओर से अजीब तरह की आवाज़ें आ रही थीं, जैसे कोई बुरी ताकत उन्हें अपने घेरे में घेरने के लिए तैयार हो।
"क्या हो रहा है?" पुष्पा ने भयभीत स्वर में पूछा, और सरजू ने भी डरते हुए उसका हाथ पकड़ लिया।
"यह क्या हो रहा है?" पुष्पा ने विस्मित होकर पूछा।
सरजू की आंखों में भी अजीब सा डर था। वह जानता था कि यह शादी कोई साधारण शादी नहीं थी।
"हम गलत जगह पर आ गए हैं!" सरजू चिल्लाया।
मंदिर की दीवारें अचानक सिहर उठीं। हवा की तीव्र गूँजों में जैसे कोई शराप बुदबुदा रहा था। सरजू और पुष्पा एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े थे, लेकिन जैसे ही दीयों की लौ एक झटके में बुझी, पूरा मंदिर घुप्प अंधकार में डूब गया।
और तभी... एक काला धुआँ मंदिर के गर्भगृह से उठने लगा।
वह धुआँ न कोई साधारण धुंध थी, न ही कोई प्राकृतिक हवा। उसमें कुछ था—कुछ ऐसा जिसे देख कर देह की सारी चेतना जैसे ठिठक जाए। धुआँ धीरे-धीरे चारों ओर फैलने लगा। मंदिर की दीवारों पर लहराता, पुरानी मूर्तियों की आँखों से टकराता, वह अब सरजू और पुष्पा के चारों ओर चक्रवात-सा घूमने लगा।
पुष्पा की आँखें चौड़ी हो गईं। उसने सरजू का हाथ और कसकर थाम लिया, लेकिन उसका चेहरा स्याह पड़ने लगा।
"सरजू...!" वह चीखी, लेकिन उसकी आवाज़ जैसे धुएँ में घुट गई।
पुजारी ने आंखें फाड़ कर देखा। उसने कुछ मंत्रों का उच्चारण शुरू किया, लेकिन उसके शब्द उस धुएँ में समा कर कहीं खो गए। उसकी आँखें भय से फैल गईं।
धुआँ अब जीवित था।
आंधी की गूंज, मंदिर की घंटियों की विकृत झंकार में मिल गई।
और अगले ही पल...
सब कुछ थम गया।
जब सरजू को होश आया, वह मंदिर की शिला पर गिरा पड़ा था। पुजारी वहीँ खड़ा, पत्थर-सा जड़। चारों ओर चुप्पी। लेकिन वह चुप्पी, मौन नहीं... मृत्यु का सन्नाटा था।
सरजू ने आँखें खोलीं, उसका सिर घूम रहा था। उसने चारों ओर देखा।
"पु...पुष्पा?" उसकी आवाज़ काँपी।
"पुष्पा!" उसने पुकारा।
मंदिर खाली था।
मंडप के बीच में अब कुछ नहीं था... सिर्फ एक लाल दुपट्टा।
धूल से सना, मंदिर की सीढ़ियों पर बिखरा हुआ… जैसे अभी-अभी किसी की आत्मा उस पर से गुज़री हो।
सरजू की आँखें फटी रह गईं। उसने पुजारी की ओर देखा, लेकिन वह भी सन्न था—शब्दहीन, शापित।
और फिर...
"पुष्पा!!"
सरजू का गला फट गया। उसने पागलों की तरह मंदिर के हर कोने में दौड़ना शुरू किया।
"पुष्पा!!"
"कहाँ हो तुम!!"
उसकी चीखें मंदिर की दीवारों से टकरा कर लौटने लगीं।
"पु…पुष्पा, मैंने तुझे खो दिया…?"
वह दुपट्टा उठाया और सीने से लगा लिया।
"तूने वादा किया था… साथ चलने का… तो फिर चली कहाँ गई…"
अब वह रो नहीं रहा था… वह चिल्ला रहा था। उसकी चीखों में एक ऐसा खालीपन था जो किसी आत्मा को भी काँपने पर मजबूर कर दे।
"पु…ष्पा…!!"
जंगल के सन्नाटे में एक ही नाम गूंजता रहा…
और मंदिर की टूटी छत से लाल जोड़े की परछाईं धीरे-धीरे ओझल होती रही।