The bodyguard Bride - Chapter 2
लोकेशन: मल्होत्रा हाउस – मुंबई – रात 12:15 AM
बारिश फिर से शुरू हो चुकी थी। खिड़की पर टप-टप गिरती बूंदों की आवाज़ कमरे की ख़ामोशी में एक तरह की रिद्म बना रही थी।
दादू, यानी आर.के. मल्होत्रा, अपनी पुरानी कुर्सी पर बैठे थे — बगल में एक पुराना लकड़ी का संदूक खुला पड़ा था, जिसमें बहुत सारे पुराने एल्बम और फाइलें थीं।
उन्होंने एक तस्वीर निकाली — आर्या की।
विवेक की पत्नी, इनायत की माँ।
वो तस्वीर देखते हुए उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई, फिर आँखे भर आईं।
उनके हाथ काँपते हैं, पर वो तस्वीर को अपनी गोद में रखकर जैसे किसी से बात कर रहे हों।
दादू (धीरे-धीरे, खुद से):
“आर्या… तुम्हारी बेटी हर दिन बड़ा सवाल पूछती है, और हम सब हर रोज़ हार जाते हैं... कभी जवाब देकर, कभी चुप रहकर।”
(एक रुकावट)
“आज उसने पूछा... जब वो रोती है, तो क्या तुम भी रोती हो?”
(गहरी साँस लेते हैं)
“और उस वक़्त मुझे लगा… कि हाँ, तुम रोती हो... हर उस दिन, जब इनायत अकेले बैठती है… जब वो किसी से कुछ नहीं कहती… जब वो खुद को कसूरवार मानती है।”
(पल भर के लिए रुकते हैं, फिर तस्वीर को सीने से लगाकर)
“मैंने तुम्हारा बेटा खो दिया था उस दिन, जिस दिन तुम गईं थीं… विवेक सिर्फ इनायत का पापा नहीं रहा, वो एक मशीन बन गया है — बस काम करता है, बस चलता रहता है… वो हँसता नहीं अब। और वो समझता है कि ये ठीक है, क्योंकि वो सबके लिए स्ट्रॉन्ग बना हुआ है। पर मुझे पता है, वो अंदर से कितना टूटा हुआ है।”
(आँखें बंद करते हैं)
“और इनायत… तुम्हारी इनायत… वो तुम्हारी परछाई है। उतनी ही मासूम, उतनी ही सच्ची... और उतनी ही अकेली।”
फ्लैशबैक — 12 साल पहले का दिन
(हॉस्पिटल का कॉरिडोर, सफेद लाइट्स, बाहर बैठा विवेक अपने हाथों से सिर पकड़े रो रहा है। अंदर से डॉक्टर बाहर आता है।)
डॉक्टर:
“बच्ची बिल्कुल ठीक है… पर हम... माँ को नहीं बचा पाए।”
विवेक (बिलखते हुए):
“नहीं… नहीं! आप झूठ बोल रहे हैं! आर्या नहीं जा सकती… वो नहीं जा सकती…”
फ्लैशबैक एंड — वर्तमान
दादू की आँखों से आँसू गिरते हैं।
वो संदूक से एक पुराना लेटर निकालते हैं — आर्या का आखिरी लिखा हुआ पत्र।
दादू (पढ़ते हैं):
"प्यारे पापा,
अगर मैं कभी वापस ना आ सकूँ… तो मेरी बेटी को कहना कि मैं उससे बहुत प्यार करती हूँ। उसे हर रोज़ मेरे फूल देना… और उसे यह मत बताना कि मैं चली गई, उसे बताना कि मैं हर रोज़ उसे देखने आती हूँ, उसके ख्वाबों में, उसकी कहानियों में… और उसके पापा की आँखों में..."
दादू की आवाज़ भर जाती है। वो चुप हो जाते हैं।
कुछ देर बाद — दरवाज़े पर हल्की दस्तक होती है।
दादू (सँभलते हुए):
“आ जाओ… इनायत, तुम्हें कैसे पता चला कि मैं यहाँ हूँ?”
इनायत (धीरे से):
“पता नहीं… नींद नहीं आ रही थी। मम्मी की फोटो देखी तो लगा जैसे आपने उन्हें याद किया है।”
दादू (मुस्कुराते हुए):
“तो क्या तुम्हें भी उनकी खुशबू आई?”
इनायत (हँसकर):
“हाँ… जैसे गुलाब और बारिश की मिलीजुली सी खुशबू…”
दादू:
“तुम्हारी माँ की सबसे पसंदीदा खुशबू थी वो।”
इनायत दादू के पास आकर बैठ जाती है। दोनों एक-दूसरे का हाथ थाम लेते हैं।
इनायत:
“दादू, क्या मैं भी मम्मी जैसी बन सकती हूँ?”
दादू:
“तुम पहले से हो… बिल्कुल उन्हीं जैसी… पर एक बात याद रखना — मम्मी जैसी बनने के लिए तुम्हें माँ खोनी नहीं पड़ेगी। तुम जब चाहो, उनसे बात कर सकती हो। अपने मन में, अपनी कहानियों में, अपनी हँसी में।”
इनायत (धीरे से):
“पर क्या वो मेरी आवाज़ सुनेंगी?”
दादू (गले लगाते हुए):
“हर बार। तुम्हारे हर शब्द से पहले तुम्हारी माँ की धड़कन चलती है… वो तुम्हें सुनती हैं, महसूस करती हैं… और तुम्हारी हँसी से वो जीती हैं।”
(इनायत की आँखें भर आती हैं, पर चेहरे पर एक मुस्कान होती है)
इनायत:
“तो आज से मैं हर रोज़ मम्मी को अपनी एक कहानी सुनाया करूंगी।”
दादू:
“और मैं तुम्हारी ऑडियंस बनूंगा।”
कैमरा बाहर की ओर जाता है — खिड़की पर फिर से बारिश रुक गई है। बादल छंट चुके हैं, और चाँद की हल्की सी रौशनी इनायत के कमरे पर पड़ रही है।
वॉयस ओवर — इनायत की आवाज़:
“माँ… मुझे पता है, आप वहाँ हो… और मैं यहाँ… लेकिन जब तक आपकी याद मेरे पास है, मैं कभी अकेली नहीं हूँ…”