Obbsessed with Zoya, Ch. 1

Obbsessed with Zoya, - Chapter 1

Posted by Shayna choudhary • Feb 20, 2025 01:14 PM

इस कहानी की शुरुआत एक खूबसूरत गाँव से होती है। गाँव के जमींदार की इकलौती बेटी, जोया, को बेहद लाड़-प्यार से पाला गया था। जोया, तीन भाइयों की इकलौती बहन, घर में सबसे छोटी थी। उस बड़ी-सी हवेली में हर तरह का ऐशो-आराम मौजूद था। जोया, जो एक बेहद खूबसूरत लड़की थी, को अपने ही घर में काम करने वाले खान बाबा के बेटे से मोहब्बत हो गई थी।

अरहम, खान बाबा का इकलौता बेटा था, जो शहर से अपनी हायर स्टडीज़ पूरी करके लौटा था। वह दिखने में बेहद डैशिंग और स्मार्ट था; कोई भी लड़की आसानी से उसकी ओर आकर्षित हो जाती थी। वह बेहद खूबसूरत पर्सनैलिटी का मालिक था।

जोया ने जब उसे देखा, तो उसे उससे मोहब्बत हो गई, और अरहम भी जोया को देखते ही उससे मोहब्बत करने लगा था। एक ओर इन दो जवान दिलों की मोहब्बत दिन पर दिन परवान चढ़ रही थी, वहीं दूसरी ओर जमींदार साहब की पुरानी दुश्मनी बाहर आ गई थी। जमींदार साहब ने अपने सगे साले, अशरफ़ अली को, जिसने उन्हीं के घर में काम करने वाली मुलाजिमा के साथ बदसलूकी की थी, पुलिस के हवाले कर दिया था।

जिससे अशरफ़ अली के मन में अपने जीजा के खिलाफ बगावत भर गई थी। वह उनसे बदला लेने के लिए जेल में मंसूबे बनाता रहा। उसकी सज़ा पूरी होने पर वह रिहा हो गया। सबसे पहले अशरफ़ अली ने कुछ बदमाशों के साथ मिलकर, एक रात, जब सब गहरी नींद में सो रहे थे, हवेली पर हमला कर दिया।

उसने सबसे पहले जमींदार साहब का गला चाकू से काट दिया, और फिर अपने तीनों भांजों को एक-एक करके मौत के घाट उतार दिया। और हवेली का सारा जेवर, माल, नकदी, पैसा सब लूट लिया। तब तक जोया, जो डर के मारे अपनी माँ के साथ छिपी हुई थी, अपनी और अपनी माँ की जान बचाने के लिए खान बाबा के घर जाने ही वाली थी कि अंदर से आने वाली आवाज़ों ने उसे चौंका दिया, और वह बुरी तरह काँप गई।

अंदर से आने वाली आवाज़ों ने जोया को बुरी तरह चौंका दिया था। खान बाबा, जो हवेली की सारी सिक्योरिटी की देखरेख करते थे—जिनकी मर्ज़ी के बगैर परिंदा भी पर नहीं मार सकता था—उनकी हँसी की आवाज़ से पूरा घर गूंज रहा था। अशरफ़ अली के साथ मिलकर उन्होंने ही इस वारदात को अंजाम दिया था। जोया का दिल वहीं थम सा गया था। एक ओर वह अपनी बीमार माँ को देख रही थी, तो दूसरी ओर अपने साथ हुए धोखे से बेहाल थी। एक ही दिन में उससे उसका घर, बाप, भाई और उसका प्यार सब कुछ छिन गया था। उसने जो अरहम के साथ ज़िंदगी जीने के सपने देखे थे, वे सब टूट कर बिखर चुके थे। अब उसे बस अपनी और अपनी माँ की जान बचानी थी। उसके पास अपनी माँ और उसके बाबा के दिए एक तोहफ़े के अलावा और कुछ नहीं बचा था।

जोया जैसे-तैसे अपने वफ़ादार रसोइये के साथ अपनी माँ को और खुद को बचाने में कामयाब रही थी। वह अपने गाँव से भागकर एक बड़े शहर में आ गई थी। वहाँ उसके लिए सब कुछ नया था; हवेली से बाहर की दुनिया उसने कभी नहीं देखी थी। और आज हालात ने उसे एक बड़े शहर में लाकर खड़ा कर दिया था।

वहीं दूसरी ओर, जब अरहम को जोया और उसके परिवार के साथ हुए हादसे का पता चला, तब वह पागलों की तरह दौड़ता हुआ हवेली पहुँचा। वह बड़े जमींदार और उनके तीनों बेटों की लाशों को देखकर काँप उठा। उसके दिल में बस यही ख्याल आया, "जोया कहाँ है? वह कैसी है?" क्योंकि वह जोया को सचमुच बेहद चाहता था और उसे दुनिया की सारी खुशी देना चाहता था। लेकिन उसी के पिता ने उसके सब सपने तोड़ दिए थे। अपने पिता द्वारा किए गए जघन्य अपराध के बाद उसे अपने पिता से नफ़रत हो गई थी।

अशरफ़ अली अब उस हवेली का मालिक बन बैठा था; कोई उसके खिलाफ़ जाने की हिम्मत नहीं कर सकता था, क्योंकि उसने चार लोगों को मार डाला था, जिससे सबके मन में उसके लिए दहशत बैठ गई थी। उसका प्यार उससे बिछड़ चुका था। उसने पूरा गाँव खंगाल डाला, पर जोया और उसकी माँ का कहीं कुछ पता नहीं चला।

निराश होकर वह शहर चला गया था। अपने इकलौते बेटे को जाते देख खान बाबा अपने होश खो बैठे थे, और दिल के दौरे से उनका निधन हो गया था। अपने बेटे के भविष्य को उज्जवल करने के लिए उन्होंने अपने मालिक से दगा किया था, और वही बेटा उनसे मुँह मोड़ चुका था। वह हमेशा के लिए शहर चला गया था।

एक पल ने जोया और अरहम दोनों की ज़िंदगी बदल कर रख दी थी। एक ओर अरहम हर हाल में, हर कीमत पर सिर्फ़ जोया को पाना चाहता था, वहीं दूसरी ओर जोया की गहरी मोहब्बत कब की शदीद नफ़रत में बदल चुकी थी। पर शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। दोनों अनजाने में एक ही शहर में आ पहुँचे थे। एक ओर रहीम खान था, जो बरसों से जमींदार की हवेली में खाना पकाने का काम देखता था, जिसने अपनी जान जोखिम में डालकर जोया और उसकी माँ की जान बचाई थी। वहीं दूसरी ओर खान बाबा, जिसने वफ़ादारी के नाम पर सिर्फ़ धोखा दिया था।

दोनों बरसों पुराने मुलाज़िम थे। पर कौन कितना वफ़ादार है, यह सिर्फ़ वक़्त ही बताता है। जोया की माँ ना जाने कब से ये सब बातें सोच रही थी, और अपने परिवार, शौहर, बच्चों को अपने ही भाई के हाथों क़त्ल होते देखकर वह ज़िंदा होकर भी ज़िंदा नहीं थी।

रहीम खान ने उस वक़्त अपनी वफ़ादारी साबित करके दुनिया में इंसानियत के ज़िंदा होने का सबूत दिया था। बहरहाल, अपनी माँ को बेतहाशा रोते देख जोया अपना रोना, अपना ग़म सब अपने अंदर पी गई थी। अपनी माँ के लिए अब वह इकलौता सहारा थी। या यूँ कहें, इतनी बड़ी दुनिया में वह माँ-बेटी ही एक-दूसरे का सहारा थीं।

कमज़ोर दिल की जोया में ना जाने कहाँ से ताकत आ गई थी। वह हर हाल में अपनी माँ के लिए एकदम मज़बूत सहारा बन चुकी थी। अब सबसे बड़ी परेशानी उसके सामने थी; वह इस शहर को कैसे फ़ेस करेगी? उसने अपनी हवेली से बाहर की दुनिया बहुत कम जानी थी।

थोड़ी-बहुत बाहर शहर की बातें कभी-कभी अरहम ही उसे बताया करता था। इस पर जोया उससे हमेशा यह कहती थी, "मैं तुम्हारा हाथ पकड़कर पूरा शहर घूमना चाहती हूँ।" तब अरहम उससे बहुत प्यार से कहता था, "मैं शहर नहीं, पूरी दुनिया तुम्हारे साथ देखना चाहता हूँ।" इस पर दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ते थे, पर अब सब कुछ बदल चुका था। जोया, जो अरहम को अपने परिवार की बर्बादी का ज़िम्मेदार मान चुकी थी, उसे लगता था कि उसके बाप के साथ अरहम भी इन सब में शामिल था।

पर ऐसा नहीं था। अरहम को तो सपने में भी भनक नहीं थी कि ऐसा कुछ होने वाला है। उसके बाबा ने उसी दिन उसे अपनी दवाइयों का हवाला देकर उसे दवाइयाँ खरीदने के लिए शहर भेज दिया था। और जब वह अगले दिन लौटा, तो उसकी दुनिया लूट चुकी थी।

चूँकि जोया को अब नए सिरे से अपनी ज़िंदगी की शुरुआत करनी थी, उसने अपनी माँ के लिए अपने सब दर्द और ग़म छिपा लिए थे। रहीम खान के एक कमरे के घर में उनका गुज़ारा नहीं हो सकता था। शहर में रहीम खान का बरसों पुराना एक छोटा सा घर था, जो जमींदार साहब ने यूँ ही अनजाने में किसी बात से खुश होकर रहीम खान को दिला दिया था। एक ग़रीब आदमी के लिए एक कमरे का घर, वह भी शहर में, उसके लिए बहुत बड़ी बात थी। पर वह कभी शहर आकर नहीं रह पाया। और इस हादसे के बाद अब वह जमींदार साहब की बेटी और बीवी को यहाँ ले आया था।

रहीम खान ने जो पैसे थे, उसने घर का राशन का सामान भर दिया था। वह हर हाल में अपनी मालकिन की हर संभव मदद कर रहा था। पर जोया को पता था कि वह ज़्यादा दिन उन दोनों का बोझ नहीं ढो सकते थे। आखिर वह बिचारा बूढ़ा आदमी कब तक काम कर सकता था? जोया ने सोच लिया था कि अब उसे ही कुछ करना है; उसे कुछ न कुछ काम करके घर चलाना होगा, और साथ ही साथ अपनी माँ का इलाज भी करना है। इसलिए उसने नौकरी करने का फैसला किया था, पर उसके पास उसकी कोई डिग्री या डॉक्यूमेंट्स नहीं थे।

इन हालात में उसे नौकरी मिलना बहुत मुश्किल था। वहीं दूसरी ओर अरहम अपने खुद के शानदार बंगले में पहुँच गया था, जो उसके बाबा ने शहर में स्टडी करते वक़्त उसे दिला दिया था। उसे बस अब जोया को ढूँढना था। इसके लिए उसने अपने अच्छे-खासे कनेक्शन्स को यूज़ करने का फैसला किया। उसने अपनी ज़िंदगी का आधा से ज़्यादा हिस्सा शहर में बिताया था; यही कारण था कि शहर का हर बड़ा आदमी उसका दोस्त-जानकार था। वह शहर के अच्छे-खासे रहिवासियों में से एक था। उसका बाप उसे दुनिया का सबसे अमीर आदमी बनाना चाहता था, और शायद इसीलिए उसने अशरफ़ के साथ मिलकर जोया के परिवार को मरवा डाला था।

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