Rebirth Novel ki Duniya mein Ch. 2

Rebirth Novel ki Duniya mein - Chapter 2

Posted by siya Rawat • Feb 05, 2025 08:36 AM

आंचल अजीब नज़रों से उन तीनों को देख रही थी। वहीं, वे तीनों अपनी बेटी और बहन की आँखों में अजनबीपन देखकर अपने सीने में बहुत भयानक दर्द महसूस कर रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उनके दिल को उनके सीने से बाहर निकालकर अपनी मुट्ठी में कैद कर लिया हो।

आंचल उन तीनों की तरफ देखकर बोली, "आप लोग अभी यहाँ से बाहर जाइए। मैं किसी से बात करने की स्थिति में नहीं हूँ। जब मुझे लगेगा कि मैं हकीकत को अपना लिया है, तो मैं आप लोगों से बात करूँगी।" और अपनी आँखें बंद कर लीं। वहीं, वे तीनों लोग उसे देखते हुए बाहर चले गए। दोस्तों, मैं अब आगे से आंचल को अक्षरा के नाम से बुलाऊँगा, तो आप लोग कंफ़्यूज़ मत होइएगा।

अक्षरा छत को देखते हुए बोली, "कैसी ज़िंदगी है मेरी! जिन्हें अपना माना, जिसे इतनी मोहब्बत की, जिनके लिए सब कुछ किया, उन लोगों ने तो मेरी कोई क़दर नहीं की। उनकी नज़रों में मैं एक बोझ थी; लेकिन अब मैं किसी के ऊपर बोझ नहीं बनूँगी। अब मैं खुद की ज़िंदगी, खुद के हिसाब से जीऊँगी। लेकिन मुझे इस फ़ैमिली के बारे में भी सोचना होगा ना? इस फ़ैमिली ने अपनी बेटी को खोया है, और उनकी बेटी के शरीर में मेरा पुनर्जन्म हुआ है।"

और अब मैं इन सब लोगों का ख़्याल रखूँगी, क्योंकि जब मैं यह नॉवेल पढ़ रही थी, तब मुझे पता चल गया था कि ये लोग अक्षरा से कितना प्यार करते थे; और अब अक्षरा भी उन्हें उतना ही प्यार करेगी।

पहले मैं धोखेबाज़ों पर विश्वास करती थी, और उन्होंने विश्वासघात किया। अब मैं किसी पर भी अंधा विश्वास नहीं करूँगी, और ना ही कभी किसी से दिल लगाऊँगी; क्योंकि यह दिल बहुत बुरी चीज़ होती है। जब टूटता है ना, बड़ी तकलीफ होती है।

अक्षरा छत को देखती रही, और देखते-देखते उसकी आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला। उसके सोने के दस मिनट बाद तीनों लोग कमरे में आए और उसे देखकर बोले, "क्या हालत हो गई है हमारी बच्ची की! सिर्फ़ और सिर्फ़ उस आदमी की वजह से! और अब मैं अपनी बहन को उसके पास कभी नहीं जाने दूँगा, क्योंकि वह मेरी बहन के लायक नहीं है।" मिस्टर प्रताप उसकी तरफ देखते हुए बोले, "हम भले ही कितनी भी कोशिश कर लें, लेकिन इतना हम भी जानते हैं कि उसे अब तक ख़बर मिल चुकी होगी कि अक्षरा को होश आ गया है।"

वहीं दूर, एक आलीशान महल में एक लड़का अपने कमरे की बालकनी में खड़ा था और फ़ोन पर किसी से बातें कर रहा था। डॉक्टर उसे पूरी अपडेट दे रहा था, और उसने यह भी बता दिया था कि अक्षरा की याददाश्त चली गई है। वह लड़का फ़ोन काटकर सामने घने अंधेरे को देखते हुए बोला, "आप हमें भूल जाएँ? यह तो पॉसिबल नहीं है, क्योंकि आपने हमसे मोहब्बत की है, और आप हमें भूल नहीं सकतीं, और हमें भूलकर अपनी ज़िंदगी में आगे नहीं बढ़ सकतीं।"

यह है हमारी कहानी का हीरो, अगस्त्य राणा। अगस्त्य राणा, राणा इंडस्ट्रीज़ का मालिक है, और पूरी दुनिया का बादशाह और एक क्रूर तानाशाह है। उसके आगे कोई नज़र उठाकर देख ले, इतनी भी किसी की औक़ात नहीं है। और क्यों? अगस्त्य नफ़रत करता है अक्षरा से, और उसे खुद से दूर भी नहीं जाने देता। क्या वजह है?

छह फ़ीट हाइट, गोरा रंग, काली, गहरी आँखें—जिनमें इतना अंधेरा है कि कोई देखे तो उन आँखों में ही डूब जाए, लेकिन उसे किनारा कभी ना मिले। बनाई हुई परफ़ेक्ट बॉडी, चेहरे पर इतनी कठोरता है कि देखने वाले की पलकें अपने आप झुक जाएँ।

अगस्त्य अपने कमरे से निकलकर बाहर आया और आकर सोफ़े पर बैठ गया। तभी उसके पास एक बूढ़ी औरत आई और बोली, "क्या बात है? आज इतने रिलैक्स कैसे लग रहे हो?"

"दादी, आपकी बहू को होश आ गया है, पर अनफ़ॉर्चुनेटली, उसकी याददाश्त चली गई है। वह भूल चुकी है हम सबको। यह भी भूल चुकी है कि उसकी शादी हमसे हुई थी, जो उसने जबरदस्ती की थी। और अब हम उसे खुद से आजाद तो नहीं करेंगे; उसे उसके लिए हुए हर एक गुनाह की सज़ा देंगे। उसने हमें, हमारे प्यार को, अलग किया था ना? अब हम उससे उसकी साँसें छीनेंगे। इस बार तो शायद वह बच गई, और तीन साल तक कोमा में रही; लेकिन अब नहीं बचेगी।"

गायत्री राणा, अगस्त्य राणा की दादी और राणा ख़ानदान की मुखिया हैं। उनके हुक्म के बिना पूरे राणा ख़ानदान में एक पत्ता तक नहीं हिल सकता। गायत्री जी अगस्त्य की तरफ़ देखती हुईं बोलीं, "अगस्त्य, कभी-कभी आँखों देखा भी धोखा होता है। ज़रूरी नहीं कि अक्षरा ने वह सब कुछ किया ही हो। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। हमने एक पहलू देखा है; दूसरा पहलू तो आज तक हमने देखा ही नहीं।"

अगस्त्य अपनी दादी की तरफ़ देखता हुआ बोला, "और हमें दूसरा पहलू देखना भी नहीं है। हमें उस लड़की की ज़िंदगी को ज़िंदा नरक बनाना है।"

गायत्री जी अगस्त्य की तरफ़ देखती हुईं बोलीं, "वह तो वैसे ही आपसे डरती है; आपके नाम तक से काँपती है। इतना टॉर्चर किया है आपने उसे दो सालों में! अगर आपका नाम भी ले ले ना, तो उसकी साँसें रुक जाती हैं। और कितना टॉर्चर करना चाहते हो आप? और हाँ, रास्ते और भी तो थे; आपको छोड़कर जाना पूर्वी की मर्ज़ी थी, अक्षरा की नहीं। इसीलिए हर बात के लिए अक्षरा को दोषी मत मानिए आप।"

अगस्त्य अपनी दादी की बातें सुनकर गुस्से में वहाँ से उठकर बाहर चला गया और अस्पताल के आगे जाकर अपनी कार रोक दी। वह अंदर गया तो देखा वहाँ पर सात्विक और उसके पापा खड़े थे। सात्विक उसे देखकर बोला, "क्यों आये हो यहाँ? क्या रखा है तुम्हारा यहाँ?"

अगस्त्य के सवाल पर सात्विक गुस्से मे बोला , "दोस्त हो हमारे, इसीलिए अभी तक ज़िंदा खड़े हैं; वरना कोई हमसे इस तरह बात करे तो हम इसकी सांस छीन लेते हैं।"

सात्विक अगस्त्य के आगे खड़ा हो गया और बोला, "तुमने जो हमारी बहन के साथ किया है ना, उसके बाद हमारी दोस्ती बहुत पहले ही ख़त्म हो गई। और हम तुम्हें आज एक बात बता देते हैं: अगर हमारी बहन के आसपास भी तुम दिखे ना, तो कसम से, हम तुम्हें चूर-चूर कर देंगे, लेकिन उसे एक खरोच भी नहीं आने देंगे। और एक बात: पूर्वी का आपको छोड़कर जाना, पूर्वी की मर्ज़ी थी, उसमें मेरी बहन का कोई दोष नहीं था। वह मंडप में सिर्फ़ इसीलिए बैठी थी कि आपकी बेइज़्ज़ती ना हो; लेकिन आपने उसे कभी पूछा इस बारे में? नहीं! आपने सिर्फ़ उसे सज़ा दी, और उसकी ऐसी हालत कर दी कि वह पिछले तीन साल से एक ज़िंदा लाश की तरह पड़ी थी।"

सात्विक सबकी तरफ़ देखकर कमरे में घुस गया। वे तीनों लोग पीछे-पीछे उसके पीछे आए। तभी सात्विक ने एक हाथ बढ़ाकर अक्षरा को खींच लिया। अक्षरा लड़खड़ा गई, लेकिन वह खुद को संभालकर खड़ी हो गई। तभी उसे ख़्याल आया—यही तो है उसकी ज़िंदगी का विलेन, जिसने बेचारी अक्षरा को मार दिया। लेकिन वह अक्षरा नहीं थी जो अगस्त्य से डर जाएगी; वह आंचल थी, आंचल जो अपनी इज़्ज़त के लिए अपनी जान दे बैठी थी।

अक्षरा भी अपने दोनों हाथों को कसकर बांधते हुए, बिल्कुल अगस्त्य की आँखों में आँखें डालकर बोली, "कौन हो आप? और यह क्या बदतमीज़ी है आपकी? और आपकी हिम्मत कैसे हुई मुझसे बिना इजाज़त मुझे हाथ लगाने की? मुझे ऐसा लगता है कि शायद आपकी फ़ैमिली ने आपको मैनर्स नहीं सिखाए, कि एक अजनबी इंसान से कैसे बात की जाती है।"

अक्षरा की बात सुनकर एक बार को तो अगस्त्य की आँखें हैरानी से फैल गईं; लेकिन फिर उसकी आँखों में पहले की तरह गुस्सा और नफ़रत आ गई। वह अक्षरा का हाथ पकड़कर खींचते हुए बोला, "चलो मेरे साथ, अभी के अभी!"

अक्षरा उसका हाथ झटक देती हुई बोली, "कौन हो आप? क्यों जाऊँ मैं आपके साथ?"

अगस्त्य अपने आप को संभालते हुए बोला, "बीवी हो मेरी, इसीलिए जाओगी मेरे साथ!"

"लेकिन मुझे कुछ याद नहीं है; और जब मुझे कुछ याद नहीं, तो आप मेरे साथ जबरदस्ती नहीं कर सकते। और एक बात: मैं कोई खिलौना नहीं हूँ, जिसे जब मर्ज़ी आया खेला, और जब मर्ज़ी आया फेंका। इसीलिए आइंदा से मुझ पर हुक्म चलाने की ग़लती मत करना, क्योंकि मैं आग हूँ! अगर मेरे करीब आओगे ना, तो जल जाओगे!! पहली बात तो मुझे याद नहीं कि मेरी शादी कभी आपसे हुई थी; और दूसरी बात, अगर कोई भी होगी ना, तो मुझे आप जैसा पति तो बिल्कुल नहीं चाहिए। और एक बात: अगर मेरे साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती करने की कोशिश की ना, तो आप जानते नहीं हैं मुझे! इसीलिए, लीव! और दोबारा अपना मुँह उठाकर मेरे पास मत आना!"

अक्षरा का यह रूप देखकर अक्षरा के माँ-बाप और भाई सात्विक तीनों का मुँह खुला का खुला रह गया, क्योंकि अक्षरा इतनी डेयरिंग तो कभी नहीं थी, जितनी वह इस वक्त है।

तभी सात्विक बोला, "इसका मतलब तुम्हारी याददाश्त नहीं गई है?"

अक्षरा सात्विक की तरफ़ देखती हुई बोली, "हाँ, मुझे जब पहले होश आया था, तो मुझे कुछ याद नहीं था; लेकिन मैं जब दोबारा नींद से जागी, तो मुझे सब कुछ याद था; और इस इंसान ने जो मेरे साथ किया है ना, उसके बाद तो मैं इस ज़िंदगी में कभी माफ़ नहीं कर सकती।"

"और एक बात: सच्चाई जाननी है ना? तो सच्चाई का पता लगाओ! कौन थी पूर्वी? कहाँ से आई थी? क्यों आई थी? माँ-बाप कौन थे? भाई कौन था? परिवार कौन था? अगर इतनी ही पॉवर है ना तुम्हारे अंदर, तो पता लगाओ; और सारा सच अपने आप तुम्हारी आँखों के सामने आ जाएगा। और अगर मैं ग़लत साबित हुई ना, तो मैं तुम्हें तुरंत तलाक दूँगी। अगर तुम ग़लत साबित हुए, तब भी मैं तुमसे तलाक लूँगी। यह मेरा आख़िरी फ़ैसला है।"

"और हाँ, अब आप यहाँ से जा सकते हो, क्योंकि यह हॉस्पिटल है, आपका घर नहीं, जहाँ आपकी हुकूमत चले। और मैं आपकी बीवी नहीं, बल्कि किसी की बेटी और बहन हूँ; तो मुझ पर हुकूमत सिर्फ़ मेरे पापा और भाई की चल सकती है, किसी और इंसान की नहीं। और हाँ, आपका बदला तो उस वक़्त पूरा हो गया था, जिस वक़्त आपने मुझे जानबूझकर ट्रक के सामने फेंका था। आपको क्या लगा? आप बच जाओगे? नहीं! भगवान ने मुझे बचाया था, जिस दिन मुझे ट्रक के आगे धक्का दिया था; और उस ट्रक के आगे मेरी मासूमियत और मेरी इंसानियत ख़त्म हो गई। अगर जो आपके सामने खड़ी है ना, वह एक नई अक्षरा है, जो अपने सामने खड़े हुए इंसान को उसकी औक़ात दिखाना बहुत अच्छे से जानती है।"

अक्षरा का यह रूप देखकर अगस्त्य की बोली बंद हो गई। उसे तो समझ ही नहीं आ रहा था। वह वहाँ से निकलकर बाहर चला गया। वहीं, सात्विक ने एकदम से जाकर अक्षरा को अपने गले लगा लिया और बोला, "वाह! मेरी शेरनी! मुझे नहीं पता था कि तू अगस्त्य राणा की बोलती बंद कर सकती है, जिसके आगे कोई बोलता तक नहीं है, यार!"

अक्षरा सात्विक की तरफ़ देखती हुई बोली, "भाई, इन लोगों ने बहुत टॉर्चर किया है मुझे, इतना कि मेरी आत्मा तक ख़त्म हो गई है। मेरे अंदर की इमोशनल फ़ीलिंग्स, सब कुछ ख़त्म हो गया है। अगर मैं आपको बताऊँगी ना, तो शायद आप सुन नहीं पाओगे जो मैंने बर्दाश्त किया है।"

अक्षरा की माँ अक्षरा के पास आई और उसे गले लगाकर बोली, "हम भले ही तुम्हारे दर्द से अनजान थे, लेकिन तुम तो हमें बता सकती थी ना कि उस घर में तुम्हारे साथ क्या हो रहा था! अरे, तुमने तो अपनी दोस्ती निभाने के लिए अगस्त्य से शादी की थी, और उसने तो तुम्हें ही इन सब का ज़िम्मेदार मान लिया!"

"ग़लती मेरी थी, माँ, जो मैंने उस इंसान की मदद की, जो मदद के लायक ही नहीं था। और आज मैं आप तीनों से वादा करती हूँ: मैं अगस्त्य को वही दर्द, वही तकलीफ़ दूँगी जो उसने मुझे दी है। मेरे सामने वह नई-नई लड़कियों को लेकर मेरे ही कमरे में जाता था; अब मैं उसके सामने वही सब करूँगी। लेकिन आप फ़िक्र मत करना; आपकी बेटी आपकी परवरिश और संस्कार को कभी कलंकित नहीं करेगी; लेकिन उसे उसकी औक़ात याद दिलाना बहुत ज़रूरी है। वह खुद को तानाशाह समझता है ना? तो वह भूल गया है कि उसके सामने भी अक्षरा प्रताप सिंह खड़ी है, जो कभी किसी से नहीं डरती! भले ही मैं थोड़े टाइम के लिए डर गई थी, लेकिन अब नहीं! और मेरी असली पहचान क्या है, यह आप तीनों बहुत अच्छे से जानते हो। और अब मैं अपना बदला लेकर रहूँगी, और उसके लिए मैं साम , दाम, दण्ड, भेद सबका इस्तेमाल करूँगी।"

सात्विक ने अपनी बहन को गले लगा लिया और कहा , "मैं हर क़दम पर, और हर लड़ाई में तेरे साथ हूँ। जब भी अगर तू कमज़ोर पड़ेगी ना, मुझे अपने पास समझना। जब तू डगमगाएगी ना, तो मैं तुझे संभाल लूँगा; और जब तू आगे बढ़ेगी, तो मैं तेरी ताक़त बनूँगा।" अक्षरा सात्विक के गले लग गई , क्योंकि उसकी पिछली ज़िंदगी में कोई भी ऐसा इंसान नहीं था जो उसे समझता हो, उसे टाइम देता हो।

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