मीरा, A mistri girl Ch. 3

मीरा, A mistri girl - Chapter 3

Posted by Miss Novelist • Jan 27, 2025 02:47 PM

इस वीडियो को मैं दो महीने से पचास बार देख चुका था और इस वीडियो को मैं जानना चाहता था। मुझे जानना था कि यह लड़की आखिर कौन है, कैसी है और कहाँ पर है... यह ऐसी है तो क्यों है? समीर अपने आप से बातें कर रहा था।

"मुझे आज तो इसके बारे में कुछ नहीं पता, पर मैं यह सब जानकर ही रहूँगा, क्योंकि मैं भी समीर हूँ... समीर माहिवाल और मैं इतनी जल्दी हार नहीं मान सकता।"

समीर ने अपने लैपटॉप की स्क्रीन को जोर से लात मारी थी। वह सरक कर बेड से नीचे जा गिरा। तभी, बेड के नीचे बैठी उसकी पालतू व्हाइट, खूबसूरत सी प्यारी बिल्ली यानी म्याऊ ने जोर से आवाज की थी। इस पर समीर और भी इरिटेट हो गया।

"क्या है बिल्ली-बिलौटा? तू यहां मेरे कमरे में क्या कर रही है? चली जा, वरना फेंक दूँगा उठाकर तुझे।"

समीर ने म्याऊ को अपनी गोद में उठा लिया था और अपने बेड पर लाकर पटक दिया। "गंदी बिल्ली! तुझे देखकर ही मेरा खून खौल जाता है। मम्मी की प्यारी नखरैल परी कहीं की! मम्मी मुझसे ज़्यादा तुझे इम्पोर्टेंस देती हैं, इसीलिए मैं तुझसे चिढ़ता हूँ, समझी तू?"

समीर अपने सिर से पैर तक चादर लपेटकर अपने बेड पर लेट गया था। कुछ ही पल हुए थे कि उसे लगा जैसे कोई उसकी चादर उस पर से खींच रहा हो। समीर ने उसे झटक दिया क्योंकि उसे लगा था कि यह ज़रूर उसकी प्यारी बिल्ली म्याऊ ही होगी, जो उसकी चादर हटाकर उसे नींद से जगाने की कोशिश कर रही है।

समीर ने बिना अपना मुँह चादर से बाहर निकाले, उसी तरह उसे पूरी तरीके से खुद पर ताने हुए, म्याऊ को झटकने लगा था। चादर के ऊपर से ही बार-बार हाथ-पैर पटक रहा था ताकि म्याऊ वहाँ से चली जाए। पर वह जब बार-बार उसकी चादर खींचती ही रही, तो अब समीर ने इरिटेट होकर जरा सा अपना चेहरा चादर से बाहर निकालकर झाँका था।

"ओह्ह हो... क्या बात है म्याऊ? तेरी समझ में नहीं आता क्या? जा चली जा यहाँ से, प्लीज़ सोने दे मुझे, वरना मैं तुझे!!" समीर ने तिलमिलाते हुए झल्लाकर कहा था। जबकि वहाँ म्याऊ थी ही नहीं। जिससे वह हैरान रह गया था कि जब वहाँ उसकी बिल्ली नहीं थी तो फिर उसकी चादर खींचने वाला कौन था?

समीर चादर से उसी तरह बाहर झाँकता हुआ इधर-उधर पूरे कमरे में देख रहा था, जैसे कुछ ढूँढ़ रहा हो। जब एकदम से उसकी नज़र छत की तरफ ऊपर गई, तो उसकी रूह काँप गई। ऊपर छत पर एक ब्लैक फ्रॉक पहने लड़की उसके छत के फ़ैन से लटकी हुई थी।

समीर फटी-फटी नज़रों से ऊपर देख रहा था और डर से काँपता हुआ घबरा उठा था। वह एकटक छत को निहारता रहा और पलकें तक झपकाना भी भूल गया था। जबकि वह लड़की पंखे के एक पर पर आराम से बैठी, उसे अपनी बड़ी-बड़ी लाल आँखों से घूर रही थी। उस लड़की की वह ब्लैक फ्रॉक बेहद ही गंदी और जगह-जगह से कटी-फटी सी थी। उसका चेहरा पूरी तरह से उसके लंबे गंदे बालों से ढका हुआ था, नाखून बढ़े हुए थे, हाथों में लाल-हरी चूड़ियाँ, नंगे पैरों पर ज़ख्म जिनमें से खून रिस रहा था। जब समीर ने उसे देखा तो जैसे उसके होश ही उड़ गए थे और वह मरे डर के मानो साँस भी नहीं ले पा रहा था।

वह लड़की पंखे के पर पर बैठी रही और फिर अचानक ही उठकर छत पर उल्टा चलने लगी। वह उल्टी छत पर ऐसे चल रही थी जैसे जमीन पर चल रही हो। और वह जैसे-जैसे छत पर पैर बढ़ा रही थी, उसके कदमों के गाढ़े लाल निशान पूरी छत पर बनते जा रहे थे। समीर सब कुछ काँपते हुए हैरान सा देख रहा था और वह चादर से लिपटा रहा। उसने बस अपनी आँखों तक का ही मुँह बाहर खोल रखा था।

वह कुछ करता, कुछ बोलता, कि वह लड़की जो उसे ही देखे जा रही थी, एकदम से ही छत से नीचे उसके चेहरे पर कूदी और समीर डर से चीख उठा था।

"मम्... मम्मी, मम्मी बचाओ, मम्मी!" समीर की चीख निकली थी और उसने अपनी आँखों पर दोनों हाथ रख लिए।

कुछ पल का सन्नाटा गुज़र गया और फिर समीर ने काफी देर बाद कंपकपाते हुए धीरे-धीरे अपने हाथ आँखों पर से हटाए थे और अपनी दर्द में थर्राती अधखुली नज़रों से वापस ऊपर छत की तरफ देखने लगा था, जहाँ पर अब कोई भी नहीं था। उसने एक रफ़्तार से उछलकर पहले खुद को, फिर पूरे बेड को घूम-घूमकर देखा और अब वह जोर-जोर से हाँफ रहा था। फिर फ़ौरन ही बेड से नीचे उतरा और पूरा कमरा छानने लगा, पर वह लड़की उसे कहीं भी दिखाई नहीं दी।

"ये सपना... सपना नहीं हो सकता, बाई गॉड... नेवर! पर ये सच था तो वह लड़की गई कहाँ और... और वह थी कौन? यहाँ कैसी आई?" समीर अपने आप से ही सवाल कर रहा था। आखिर वह डर ही इतना जो गया था और पूरे कमरे में इधर-उधर टहल रहा था, जब उसके कमरे में नॉक हुआ तो वह जो पहले से ही डर हुआ था और भी डर गया।

समीर ने दरवाजे की तरफ़ देखा तो एक सर्वेन्ट खड़ा था। जिसे देखकर अब उसकी जान में जान आई। "क्या हुआ? तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"

"समीर बाबा, आपको बड़े साब और मैडम जी बुला रही हैं!" उस सर्वेन्ट ने सर झुकाकर जवाब दिया था।

समीर अभी उस लड़की के बारे में सोच-सोचकर परेशान हो रहा था, जब एक और डर भरा बुलावा आ गया। उसको उसके मॉम-डैड ने बुलाया था, यानी कि एक और बड़ी मुसीबत। समीर अपने पैरेंट्स के सामने जाने से बहुत कतराया करता था।

समीर ने नौकर से पूछा, "क्यों? अब क्या कर दिया मैंने? क्यों बुलाया है मुझे?"

"बाबा, मुझे नहीं पता। उन्होंने आपको बुलाने को कहा और वो दोनों अभी नीचे ही हैं, हॉल में आपका वेट कर रहे हैं। आप जल्दी चलिए।" नौकर ने बड़े रिक्वेस्टली और रिस्पेक्टली कहा था।

"ठीक है, तुम जाओ, मैं आता हूँ!" समीर ने बेमन से जवाब दिया और वापस कमरे में इधर-उधर देखने लगा क्योंकि उसके दिमाग पर वह लड़की जो छाई हुई थी।

और आगे……

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