मीरा, A mistri girl - Chapter 1
माँ मीरा कहाँ है? आज उसकी तबीयत तो ठीक है ना? फिर से उसने कोई कुसीज किया तो नहीं? रंश ने बाहर से आते ही अपनी माँ से पूछा। माँ खेत से लाए भुट्टों के दाने निकाल रही थीं और पूरी तरह से ख्यालों में खोई हुई थीं। उनका मन उनके बस में नहीं था; बैठी तो वहीं थीं, पर उनका दिलोदिमाग कहीं और खोया हुआ था। जब उनके बेटे रंश ने उन्हें हिलाते हुए फिर पूछा-
"बोलिये ना माँ, मीरा कहाँ है?"
"वो, वो तो कॉलेज गई है ना बेटा। मुझसे कह रही थी, कोई प्रोजेक्ट है उसका।"
"क्या कहा? कॉलेज पर? आपने उसे जाने क्यों दिया, माँ?"
रंश हैरान हुआ। "माँ, ये क्या कह रही हैं आप? मीरा और कॉलेज? अगर उसने आज फिर वहाँ कुछ ऊँच-नीच कर दिया, तो जवाब कौन देगा? बोलिये, अभी पिछले हफ्ते ही तो वो अपने क्लास में पढ़ने वाले एक लड़के को दांत काट गई थी!"
"हाँ तो... तुम क्या मेरी बेटी को पागल समझते हो क्या, रंश?" रंश की माँ देवी भड़क उठीं मीरा की बुराई पर और उन्होंने रंश को डाँटा।
"पागल होती तो बात ही कोई और थी माँ, पर उसे तो ऐसे दौरे पड़ते हैं कि बस समझो सामने वाला उससे बच जाए तो बहुत है।"
"अरे, कुछ नहीं हुआ है मेरी लाडो को। वो एकदम ठीक है, समझा तू?" देवी ने अपने बेटे को डपट दिया और वापस भुट्टे छीलने लगीं। "वो उसके कॉलेज का लड़का मेरी मीरा को तंग भी तो कितना करता था ना, अच्छा हुआ मीरा ने उसे सबक सिखाया।"
"माँ, ये आप मुझसे बोल रही हैं या खुद को समझाना चाह रही हैं? क्योंकि आप भी अच्छे से जानती हैं कि सच्चाई क्या है और मीरा क्या है। वो कोई हमारी लाडो नहीं अब माँ, वो तो अब कुछ और ही बन गई है। मीरा पर साया है माँ, साया कोई बीमारी नहीं है, उसे जो उसका इलाज करेंगे तो वो ठीक हो जाएगी। और ये उस लड़के की ही बात नहीं, मीरा हर दूसरे-तीसरे दिन किसी ना किसी को चोट पहुँचाती रहती है।"
"तो तू बता कि क्या करूँ मैं, रंश? फेंक दूँ क्या उसे? या बेघर कर दूँ? या फिर जान से मार डालूँ अपनी बच्ची को?" देवी को गुस्सा तो नहीं आया था, पर वो इरिटेट जरूर हो गई थीं और दुखी भी।
रंश भी मायूस हो गया अपनी माँ की आँखों में आँसू देखकर। अफ़सोस से बोला- "माँ, मैं ये नहीं कहता कि आप उसे मारें या जान से मार डालें, पर वो हमारे घर की बेटी है। उसका ख्याल हम रखेंगे। भला उसकी वजह से किसी दूसरे को नुकसान हुआ, तो वो हमें ही ना आकर सुनाएगा कि क्यों हम उसको ऐसे खुले लोगों की भीड़ में छोड़ देते हैं?"
"बेटा, वो सुबह ठीक थी, तो मैंने जाने दिया उसे कॉलेज, रंश। आखिर उसकी पढ़ाई भी तो जरूरी है ना।"
"क्या माँ? उसका ठीक होना और बीमार होना उसके या हमारे हाथ में तो है नहीं। उसे कब क्या करने का मन हो जाए और क्या कर बैठे, कौन जानता है भला?"
रंश ने बहुत ही परेशान से अंदाज़ में कहा- "वह कभी लोगों को मारती है, कभी जानवरों को दौड़ाती है, कभी बच्चों को उठाकर कुएँ में फेंक देती है, तो कभी लोगों की मुर्गियों को कच्चा नोच-नोचकर खा जाती है। माँ, हमसे उसकी कितनी सारी शिकायतें पहले ही गाँव वालों ने कर रखी हैं। अब फिर से उसने कोई उद्यम मचाया, तो समझो गाँव में रहना दुश्वार हो जाएगा हमारा।"
रंश की बात पर उसकी माँ प्यार जताते हुए, पर जैसे चिढ़कर बोली- "अरे, बस एक बार ही तो उसने कल्लू के बेटे को कुएँ में फेंका था और क्या? अब तुम सब लोग उसको विलेन ही करते रहोगे?"
"ओह... तो मतलब रोज़-रोज़ उसको ऐसे कारनामे करने चाहिए? आपकी ये मर्ज़ी है क्या माँ? जब वो कुछ उल्टा-पुल्टा करे, हम तब ही कुछ कह सकते हैं उसे? बाकी तो वो बहुत ही बढ़िया है?"
"तो तू बता मैं उसका क्या करूँ, रंश? वह हमारी बच्ची है।"
"बाँधकर रखा कीजिये उसे। आपसे कितनी बार बोला है ना मैंने!" देवी ने हारते हुए सामान्य रूप से पूछा। रंश अचानक देवी के करीब बैठ गया क्योंकि उनका कलेजा मुँह को आ गया था रंश की इस बात से।
रंश उन्हें समझाता हुआ बोला- "माँ, यही सही रहेगा। वो अब सिर्फ़ प्यारी सी भोली-भाली हमारी मीरा ही नहीं, वो तो पता नहीं कौन है जो ऐसे कारनामे करती है। हमारी गुड़िया सी मीरा तो ऐसी नहीं थी।"
"बाँधा तो था बेटा मैंने अपनी मासूम सी बेटी को अपने इन्हीं हाथों से कई बार। पर उसे कोई रस्सी, कोई जंजीर नहीं थाम सकती, रंश। जब उसे झटके आते हैं, तो वो बहुत ही ताकतवर और गुस्से वाली हो जाती है। तुझे तो मालूम ही है ना, रंश?"
"ठीक है माँ, मैं जाकर उसको कॉलेज में देखता हूँ, कहीं कुछ नया ना कर दिया हो उसने। आप घर पर ही रहना। शायद वो यहाँ आए।"
"हाँ, हाँ, जल्दी जा बेटा। और सुन रंश!!" रंश जाने को मुड़ा था तो देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया। "देख रंश, तू उसके एकदम से करीब मत जाना बेटा। पहले देखना कि वो ठीक है या फिर… … …!!"
"हाँ, मैं ध्यान रखूँगा माँ।" रंश के जाते ही देवी अपनी बेटी और बेटे के लिए भगवान से प्रार्थना करने लगी और फिर रसोई की तरफ भागी, खाना बनाने। जैसे डर था कि देर ना हो जाए।
***************
इधर कॉलेज में........
मीरा कॉलेज से बाहर आई और धीरे-धीरे चलते हुए कॉलेज की सीढ़ियों पर बनी रेलिंग पर हाथ फेर रही थी। जो दो चोटियाँ उसकी माँ ने बाँधी थीं, वो अब खुल चुकी थीं और मीरा के बालों का डेरा उसके आधे चेहरे को ढके हुए था।
"ए मीरा, तू यहाँ क्या कर रही है? चल अपनी क्लास में जाकर बैठ।" मीरा की एक प्रोफेसर ने आकर मीरा को पीछे से पुकारा। वो उछल गई और अपनी प्रोफेसर को एकटक देखने लगी। प्रोफेसर फिर से बोली- "मीरा, जा अपनी क्लास में बैठ। ये घूमने का नहीं, लेक्चर का टाइम है। तूने क्लास क्यों बंक की? तेरी मैडम अंदर क्लास में है। चल, जल्दी जा।"
मीरा उन्हें वैसे ही एकटक देखते हुए, अजीब सी भयानक गुर्राती आवाज़ में बोली- "मुझे पढ़ाई नहीं करनी, मैडम!"
"क्या कहा? पढ़ाई नहीं करनी...? पर क्यों, मीरा? तू यहाँ कॉलेज पढ़ने आती है या टाइमपास करने?"
"मैं यहाँ खेलने आई हूँ, तुमसे मतलब!"
"तेरी तो! पागल लड़की, बदतमीज़ कहीं की! रुक, बताती हूँ मैं तुझे!" वो प्रोफेसर मीरा की तरफ गुस्से से बढ़ीं और उसका हाथ पकड़ लिया। "मीरा, तू मेरा मज़ाक बना रही है क्या?"
"हाथ छोड़ मेरा, टीचर!!" मीरा उसी भयानक सी अजीब आवाज़ में गुर्राई।
"प्रोफेसर ने उसका हाथ और कसकर थाम लिया और उसे डाँटती हुई बोली- "नहीं छोड़ा तो क्या करेगी? एक तो गलती करती है, ऊपर से अकड़ भी दिखा रही है तू मुझे। चल, क्लास में चुपचाप।"
"टीचर, मैंने कहा मेरा हाथ छोड़, वरना…!!" इस बार मीरा ने गुस्से में काफी स्पीड और जोर की आवाज़ से चीखकर अपनी उस प्रोफेसर की तरफ एक झटके में गुस्से से देखा। प्रोफेसर डर से काँप गई।
मीरा के चेहरे पर काफी तेज़ गुस्सा था। वह ज्वाला हो रही थी और उसकी आँखें अब लाल-लाल, जैसे खून सी जख्मी, झिलमिलाई हुई थीं। बालों की कई सारी लटें उसके चेहरे पर हवा में झूमती हुई बिखर रही थीं।
मीरा ने प्रोफेसर का गला अपने पंजे में जकड़ लिया और उसे एक हाथ से दबाते हुए उसे ही घूर रही थी। प्रोफेसर का दम घुटने लगा। वो हाथ-पैर चला रही थी और जिस हाथ से मीरा की कलाई थामी थी, वो पकड़ ढीली हो गई थी जब मीरा ने उसे वहीं से सीढ़ियों पर से नीचे फेंक दिया।
मीरा को ऐसे करते देख, उसके कॉलेज की दो क्लासमेट्स लड़कियाँ, जो उसके ही गाँव की उसकी सबसे करीबी सहेलियाँ थीं, दोनों एक साथ चीखते हुए मीरा के पास दौड़ती हुई आ गईं।
"अरे मीरा, मीरा! तूने ये क्या किया...? मीरा, मीरा! तूने प्रोफेसर को नीचे कैसे गिरा दिया? तू पागल हो गई है क्या, मीरा?" दोनों लड़कियाँ मीरा को जोर-जोर से पुकार रही थीं। "मीरा, ये तूने क्या कर दिया आज?"
मीरा ने अब जैसे होश में आते हुए हँसकर सर झटक दिया- "मैंने कुछ नहीं किया।"
"झूठ मत बोल, मीरा। हमने खुद देखा है तुझे प्रोफेसर को यहाँ सीढ़ियों से नीचे धक्का देते हुए।" वो दोनों लड़कियों ने नीचे देखा जहाँ उस प्रोफेसर को कई सारे टीचर स्टाफ उठाने की कोशिश कर रहे थे और वो बेहोश थीं।
"मीरा, तू ठीक तो है ना?"
"हाँ तो! मेरे करीब कोई आने की कोशिश करेगा, तो मैं क्या उसे छोड़ दूँगी क्या? जान... मैं उसकी जान ले लूँगी जिसने मुझे डाँटा या परेशान किया।" मीरा ने उन दोनों लड़कियों को और फिर अपनी बेहोश, खून से लथपथ पड़ी उस प्रोफेसर को खौलती नज़रों से देखते हुए कहा और वहाँ से चली गई।
मीरा अब कॉलेज से निकलकर बाहर आते हुए अचानक से तेज-तेज कदमों से दौड़ते हुए घर की तरफ भाग खड़ी हुई थी। रास्ते में खेतों की पगडंडियों पर चलते हुए वो दोनों हाथों से खेत की लहलहाती फसलों को उजाड़ती जा रही थी और गाजर, मूली, टमाटर, बैंगन, करेला; जो भी रास्ते में मिलता, सब कुछ दोनों हाथों से नोचती, उसे जानवरों की तरह खाती जा रही थी।
वो कभी खेतों में इधर जाती तो कभी उधर निकलती, सारे खेतों की फसलों को नष्ट करती। वो उनसे खेल रही थी और तालियाँ बजा-बजाकर अपने आप में ही कहकहे लगाकर हँस रही थी।
वह जब अपने घर आई थी, तो उसकी माँ देवी आँगन में चूल्हों पर बड़े-बड़े बर्तनों में खाना पका रही थीं। मीरा को देखते ही उनका दिल घबरा गया और उन्हें जाने क्या हुआ, वो बस घबराहट में तेज़-तेज़ हाँफने लगी थीं और अपनी फूली-फूली, अटकती साँसों के साथ मीरा के पास आ गईं।
"अरे, क्या हुआ मीरा बिटिया?"
"माँ, मुझे भूख लगी है, खाना दो!" मीरा ने किसी छोटे बच्चों सा सवाल किया। "माँ, मैं जब तक खाना नहीं खाऊँगी, बड़ी नहीं हो पाऊँगी!"
"बेटा, खाना... खाना बस बन ही रहा है। तू दो मिनट यहाँ बैठ, मेरी बच्ची।"
"दो मिनट? इन दो मिनट का मतलब भी समझती है क्या तू बुढ़िया? मैं इतना सारा इंतज़ार करूँगी?" मीरा को अचानक ही गुस्सा आ गया और वो हाथ-पैर पटकने लगी। "मुझे इंतज़ार करना पसंद नहीं। मुझे खाना चाहिए, सिर्फ़ खाना।"
"बेटा, बस दो मिनट। अभी खाना तैयार हो रहा है। चूल्हे पर सारी हाँडी चढ़ी है। मैं जल्दी-जल्दी से तेरे लिए रोटियाँ डाल लाती हूँ। मैं अपनी बच्ची को बहुत अच्छा-अच्छा खाना खिलाऊँगी और बहुत सारा खाना खिलाऊँगी, ठीक है मीरा?" मीरा की माँ का कलेजा बैठ रहा था। मीरा जाने कब क्या कर दे, भला कौन जानता था? और देवी थी तो उसकी माँ ही, पर उसे भी मीरा से उतना ही डर लग रहा था जितना कि बाकी के और गाँव वाले लोग उससे डरते थे।
"चूल्हे पर अब खाना चढ़ा है, मतलब बुढ़िया तूने अब खाना बनाना शुरू किया है? सुबह से क्या कर रही थी तू? मर गई थी क्या?" मीरा का गुस्सा परवान चढ़ गया था और उसने अपनी माँ के बाल खींच डाले और उन्हें एक ही झटके से दूर फेंक दिया। "मुझे बहुत जोर से भूख लगी है। मुझे खाना, खाना, खाना! बस खाना चाहिए!"
"मीरा, बेटा, तू बैठ। मैं अभी तेरे लिए कुछ लेकर आती हूँ।" मीरा की माँ देवी जल्दी-जल्दी, जैसे अपनी जान बचाने को वहाँ से हटकर घर से बाहर की तरफ भागते हुए घबराहट से बोली और बाहर दरवाज़े पर आकर वो लम्बी-लम्बी साँसें लेती हुई दरवाज़े के पास बैठकर सुस्ताने लगी क्योंकि मीरा ने उन्हें पीटकर रख दिया था।
देवी बेचारी घर के बाहर अनाथ बैठी रोते हुए अपने आँचल से अपना चेहरा रगड़ने लगी थीं। ये आज कोई नई बात नहीं थी!
मीरा का रोज़ का यही तो काम था। वह खाना खाने के लिए कुछ भी कर सकती थी और खाना इतना कि दो-दो, तीन-तीन बड़े बर्तन एक बार में ही खाली कर जाती और तब भी भूखी रह जाती। घर का राशन उसी की वजह से खत्म हो जाता और उसके बाप-माँ, भाई को खेती करने के साथ-साथ राशन बाहर से और भी खरीदना पड़ता क्योंकि मीरा का पेट तो भरना ही था। आखिरकार अब वो उनकी इकलौती बेटी और बहन थी जो अब जाने ही क्या बन गई थी?
और आगे………....