जिन्नजादे की आशिकी Ch. 2

जिन्नजादे की आशिकी - Chapter 2

Posted by Shayna choudhary • Jan 18, 2025 02:28 PM

आयशा पर उसकी सौतेली बहन ने गरमागरम कॉफी उड़ेल दी थी। उसकी गर्दन और चेहरे पर गहरे लाल निशान पड़ गए थे।

आयशा को जलन बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हो रही थी। वह सबकी परवाह किए बिना बाग़ में हेड पंप के नीचे बैठ गई।

हैंड पंप के नीचे बैठकर आयशा जोरों से रोने लगी। वह जानती थी उसकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं है।

वह रोते हुए अपने चेहरे, गर्दन और बाल धो रही थी। लेकिन जलन कम नहीं हो रही थी, क्योंकि कॉफी पूरी गरमागरम थी।

आयशा का दर्द से बुरा हाल था। उसे बहुत जलन हो रही थी। ठंडा पानी पड़ने पर उसे थोड़ा आराम मिला। वह घंटों वहीं बैठी रोती रही। अपनी बुरी किस्मत पर उसे बहुत गुस्सा आता था। कितनी बार उसने मरने के बारे में सोचा, लेकिन फिर अपने बूढ़ी दादी का ख्याल कर मरने का विचार छोड़ देती थी।

आयशा जिस हेड पंप के नीचे बैठी थी, उसके बराबर में एक ऊँचा, लंबा, घना पेड़ था। उस पेड़ पर जिन्न का बसेरा था।

आयशा को पता नहीं था कि कोई उसे देख रहा है। एक गहरी नीली आँखों वाला जिन्न-ज़ादा पेड़ पर सोया हुआ था। किसी के रोने की आवाज़ सुनकर वह जाग उठा।

वह गुस्से से लाल-पीला हो गया था। उसका इरादा चीखने वाले को सबक सिखाना था, लेकिन खूबसूरत लड़की को देखकर वह अपनी पलकें झपकना भूल गया।

एक जिन्न-ज़ादे को एक इंसान से मोहब्बत हो गई थी! पहली नज़र में ही उसे आयशा से मोहब्बत हो गई थी।

वह देर तक पेड़ पर बैठा उसे देखता रहा। आयशा के बाल झटकते हुए कुछ छींटें जिन्न-ज़ादे पर भी पड़ रही थीं।

लेकिन आयशा को कोई दिखाई नहीं दे रहा था। वह समझ रही थी कि वह अकेली है।

लेकिन आयशा की ज़िंदगी में खेलना-हँसना नहीं था। उसकी ज़िंदगी में सिर्फ़ रोना था। वह जी भरकर रो रही थी। जिन्न-ज़ादा देर तक उसे रोते हुए देखता रहा।

आयशा ने रोना बंद किया और हैंड पंप बंद करके जाने लगी, तभी जिन्न-ज़ादे ने एक सफ़ेद मोतियों की अंगूठी उसके पास फेंक दी।

आयशा का ध्यान अपनी जलन पर था। उसका गला और चेहरा बुरी तरह जल रहा था।

रोती हुई आगे बढ़ी तो उसके पैरों में कुछ चुभा। एक खूबसूरत अंगूठी देखकर वह हैरान हो गई और आस-पास देखने लगी।

वह सोचने लगी कि अंगूठी कहाँ से आई, क्योंकि उस बाग़ में उसके अलावा कोई नहीं आता था। कभी-कभी उसकी सौतेली माँ बाग़ की सैर करने आती थी, और आयशा की सफ़ाई चेक करती थी। लेकिन वह इस तरफ़ कभी नहीं आती थी। आयशा हेड पंप के पास थी, जो बाग़ के आखिरी छोर पर था।

अंगूठी हाथ में लेने के बाद आयशा इधर-उधर देखने लगी। वह सोच रही थी कि अंगूठी का मालिक आस-पास ही होगा।

क्योंकि किसी की चीज़ लेना उसके ख़िलाफ़ था।

इसलिए उसने अंगूठी अपने पास रख ली, यह सोचकर कि जब मालिक मिलेगा, वह उसे लौटा देगी।

यह सोचकर अंगूठी हाथ में लेकर आयशा अपने कमरे की ओर जाने लगी।

कमरे में जाते ही उसे एहसास हुआ कि चेहरे और गर्दन की जलन धीरे-धीरे ठीक हो रही थी।

आयशा को यकीन नहीं हो रहा था कि इतनी जल्दी जलन कैसे जा सकती थी।

रात हो चुकी थी, आयशा अपने कमरे में लेट गई। कुछ देर बाद उसकी दादी आई।

"मेरे बच्चे, तू ठीक तो है ना?" दादी ने पूछा।

आयशा की आवाज़ सुनकर, आयशा रोते हुए उनके गले लग गई।

"दादी, आज उन्होंने गरमागरम कॉफी मेरे ऊपर उड़ेल दी! और कितना अत्याचार करेंगे ये लोग मुझ पर!"

आयशा की बात सुनकर, उसकी दादी तड़प गई।

"मेरा बच्चा! मुझे दिखा, कहाँ से जलाया है उन मक्कारों ने! मेरे पास तेरे लिए मरहम है, मैं अभी मरहम लगा देती हूँ।"

आयशा ने अपनी गर्दन और मुँह दादी को दिखाया।

"दादी, यहाँ जल रहा था, लेकिन अब जलन का एहसास नहीं हो रहा है। क्योंकि मैं गार्डन में हेड पंप के नीचे बैठ गई थी, उसके ठंडे पानी से मुझे काफ़ी राहत मिली है।"

आयशा की बात सुनकर, उसकी दादी उसे हैरानी से देखने लगी। आयशा के जिस्म पर कहीं भी जलने का निशान नहीं था। आयशा की रंगत और भी खूबसूरत और उजली हुई सी दिखाई दे रही थी। उसकी दादी के आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं था।

लेकिन कुछ ज़्यादा ना सोचते हुए, उसकी दादी ने उसके सर पर हाथ रखा।

"मेरी बच्ची, तू फ़िक्र मत कर, ऊपर वाला तेरा निगहबान है। वह हमेशा तेरी रक्षा करेगा, वह हमेशा तुझे अपनी हिफ़ाज़त में रखेगा। मुझे पूरा यक़ीन है।"

अपनी दादी की बात सुनकर, आयशा ने अपनी दादी को गले लगा लिया। उसकी दादी ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए, उसके माथे को चूमा।

"आराम कर, मेरी बच्ची। फिर सुबह पाँच बजे ये लोग तुझे उठा देंगे और तुझे जानवरों की तरह पूरे घर का काम करवाएँगे, और फिर मारेंगे-पीटेंगे। इसीलिए तेरे शरीर को आराम की सख़्त ज़रूरत है।"

"दादी, फ़िक्र ना करें, अब मुझे आदत हो गई है।" आयशा ने हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा।

"ये लोग तेरे साथ मुझे भी सोने नहीं देते हैं। कहीं रात में मैं तुझे कुछ सीखा-बुझा ना दूँ, इसीलिए ये लोग मेरे साथ तुझे अकेला ज़्यादा देर नहीं छोड़ते हैं। देखती है ना तू सब अपनी आँखों से।" दादी ने कहा।

"फ़िक्र मत कीजिए, दादी। मैं अपना ख़्याल रख लूँगी। आप जाइए और आराम कीजिए। और अगर आपको किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो, तो आप मुझे बताइएगा।" आयशा ने कहा।

उसकी दादी उसके गाल को प्यार से चूमती हुई चली गई।

दूसरी ओर, सकीना और उसकी माँ हँस रही थीं। आयशा की खूबसूरती दोनों की आँखों में चुभा करती थी। सकीना ने आयशा पर गरम कॉफ़ी उड़ेलकर उसकी खूबसूरती को बर्बाद करने का पहला क़दम उठा दिया था।

"मुझे क्या लगता है, उसकी खूबसूरती बदसूरती में बदल गई होगी ना? अब तो बहुत भयानक दिखाई दे रही होगी ना?" सकीना ने अपनी माँ से कहा।

"हाँ, मेरी बच्ची, हाँ! बहुत गुमान है ना उस बूढ़िया को अपनी पोती की खूबसूरती पर! अब तू देख, जब सुबह हम उसका चेहरा देखेंगे, तो कितना भयानक और डरावना दिखेगा!" उसकी माँ ने हँसते हुए कहा। वह दोनों माँ-बेटी आयशा का मज़ाक़ उड़ा रही थीं।

दूसरी ओर, आयशा निढाल सी चटाई पर जा गिरी। उसके कमरे में सोने के लिए सिर्फ़ एक मैली-कुचली चटाई थी, जो नौकरों को दी जाती थी। माँ के गुज़रने के बाद से आयशा उसी चटाई पर सोती थी।

आयशा के पिताजी ने कभी भी आयशा की ज़रूरत का ख़्याल नहीं रखा था।

आयशा ने अंगूठी एक छोटे से संदूक में रख दिया।

आयशा के पास अलमारी के नाम पर सिर्फ़ एक छोटा सा संदूक था, जो उसकी अम्मी, मुमताज़ बेगम इस्तेमाल करती थीं।

अंगूठी संदूक में रखने के बाद आयशा लेट गई।

हल्की नींद में उसे एहसास हुआ कि कोई उसके आस-पास है और उसे कहीं ले जा रहा है।

यह एहसास होते ही, उसने डर के मारे आँखें खोल लीं। उसने अपने आप को अपने कमरे में पाया। लेकिन यह अजीब सा एहसास उसे परेशान कर गया।

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