बंधन ( एक मर्यादा ) Ch. 3

बंधन ( एक मर्यादा ) - Chapter 3

Posted by Shalini Chaudhary • Jan 16, 2025 11:55 AM

बंधन ने केशव को डाँटते हुए कहा, जिस पर केशव ने अपने दोस्तों के साथ न जाने की बात मान ली। कुछ देर चलने के बाद बंधन अपनी कक्षा के लिए चली गई। केशव का स्कूल वहीं से थोड़ी ही दूरी पर था, और वह भी अपने स्कूल के लिए निकल गया।

दिल्ली (गुड़गाँव)

एक आकर्षक बहुमंजिला इमारत थी, जिसकी दीवारों पर बड़े अक्षरों में "भार्गव्स कॉर्पोरेट" लिखा था। यह इमारत इस इलाके की शान थी और अपने अनोखे ढाँचे के कारण अलग पहचान रखती थी। इस इमारत के सातवें तल पर कंपनी के मालिक का कार्यालय था। इस पूरे तल पर केवल चार केबिन थे—पहला मालिक का, दूसरा उनके सहायक का, तीसरा उनके दाहिने हाथ का और चौथा उनके बाएँ हाथ का।

बीच वाला केबिन मालिक का था। उस केबिन में छब्बीस वर्षीय एक आकर्षक युवक हेड चेयर पर बैठा था। उसके ठीक सामने दो कुर्सियाँ लगी थीं, जिन पर उसी उम्र के दो अन्य युवक बैठे थे। दाहिनी ओर बैठा युवक अज्ञेय ठाकुर था, और बायीं ओर बैठा युवक राजवीर ओबेरॉय। तीनों दोस्त थे।

अज्ञेय (हेड चेयर पर बैठे युवक से):

"यार करण, मैं अकेला इतना काम कैसे संभालूँगा? मतलब, समझ नहीं आ रहा है यार! प्रोजेक्ट्स भी देखने हैं और ऊपर से तेरा यह सहायक का काम। अरे, अब एक सहायक रख ले। बेचारा वह चौथा केबिन भी खाली पड़ा हुआ है, उसे थोड़ा उपयोग में तो ला।"

करण (सीधा होकर बैठते हुए):

"अबे यार, तू जानता है ना कि मुझे कामचोर कर्मचारी पसंद नहीं हैं। इसलिए मेरी ज़रूरतें पूरी करने वाला कोई हो, तो बता।"

राजवीर (पानी का घूँट लेते हुए):

"ऑनलाइन आवेदन कर देते हैं, और सुविधाएँ भी दे देते हैं। कोई न कोई तो तेरे हिसाब का होगा ही।"

करण (फाइल पलटते हुए):

"जो तुम दोनों को ठीक लगे! लेकिन हाँ, एक बात और है—उम्मीदवारों का इंटरव्यू तुम दोनों ही लोगे।"

अज्ञेय और राजवीर ने हाँ में सिर हिलाया। तभी केबिन का दरवाज़ा खुला, और बाहर से एक बेहद खूबसूरत लड़की अंदर आई। उसने लाल रंग का ऑफ-शोल्डर वन-पीस पहना हुआ था, जिसकी लंबाई उसकी जाँघों तक थी। उसके गोरे बदन पर लाल रंग का वह परिधान बेहद खूबसूरत लग रहा था। उसने ऊँची एड़ी के जूते पहने हुए थे। उसका चेहरा बहुत खूबसूरत था—पतले होंठ, लंबी नाक और खूबसूरत आँखें। वह परी जैसी लग रही थी। बड़े नखरे से चलते हुए वह करण के बगल में आकर खड़ी हो गई।

यह थी निया भार्गव, करण भार्गव की छोटी बहन, जो बिलकुल बिगड़ी हुई थी।

निया (अपने बाल पीछे झटकते हुए):

"भाई, मुझे आपका कार्ड चाहिए, क्योंकि मुझे खरीदारी के लिए जाना है।"

करण (निया को एक नज़र देखकर):

"पर तुम तो परसों ही खरीदारी करके आई हो।"

निया (राजवीर को ताड़ते हुए):

"हाँ, लेकिन आज कपड़ों के कुछ नए कलेक्शन आए हैं। तो वे भी तो मेरे वॉर्डरोब में होने चाहिए ना।"

करण (निया को देखकर):

"निया, तुम बच्ची नहीं हो कि जो भी बाजार में आएगा, वह तुम्हारे पास होना ही चाहिए। थोड़ी सी तो परिपक्व बनो।"

निया (आँखें गोल-गोल घुमाते हुए):

"ठीक है, अगली बार आपकी बात ध्यान में रखूँगी। पर अभी तो दे दीजिये।"

करण ने ना में सिर हिलाते हुए अपना कार्ड निकालकर उसे दे दिया।

करण (राजवीर को देखते हुए):

"तुम दोनों के बीच में कुछ हुआ है क्या?"

करण के इस सवाल पर राजवीर को रात की बात याद आई।

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फ्लैशबैक

दिल्ली के एक महँगे बार, स्काई हेवेन बार, जो अपनी लग्ज़री के लिए प्रसिद्ध था, में एक लड़का और लड़की नशे में धुत एक-दूसरे की बाहों में बाहें डाले डांस फ्लोर पर नाच रहे थे। वहीं, बार काउंटर पर बैठा राजवीर अपनी आँखों में गुस्सा लिए बस उन दोनों को घूर रहा था। वह लड़की कोई और नहीं, बल्कि निया ही थी।

निया और राजवीर रिलेशनशिप में थे, और यह बात दोनों के परिवार को पता थी। अपनी आँखों के सामने अपनी प्रेमिका को किसी और की बाहों में देखकर, राजवीर का खून खौल रहा था। उसका मन कर रहा था कि उस लड़के की हत्या कर दे।

कुछ देर नाचने के बाद निया उस लड़के के साथ ऊपर जाने लगी। बार के ऊपर का क्षेत्र विश्राम क्षेत्र था, लेकिन वहाँ किस तरह से विश्राम किया जाता है, यह किसी से छिपा नहीं था।

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