Obbsession of Kaynaat - Chapter 1
ठाकुरगंज गाँव में आज फिर एक जवान लड़की की लाश मिली। जैसे ही गाँव वालों को उस लड़की की लाश मिली, गाँव में बुरी तरह रोना-पीटना शुरू हो गया। क्योंकि उस लड़की की लाश केवल लाश नहीं थी, बल्कि उसके कुछ संवेदनशील अंग भी गायब थे!
सभी लोगों ने फिर बातें बनाना शुरू कर दिया कि एक और लड़की जिस्म की प्यासी आत्मा के कब्ज़े में आ गई थी, जिसकी वजह से उसका ऐसा हाल हुआ था। लड़की के माता-पिता अपना सिर पटक-पटक कर रो रहे थे।
आस-पास के गाँव के लोग हैरानी से उस लड़की की आधी-अधूरी लाश को देख रहे थे। यह उस गाँव की कोई पहली या दूसरी लाश नहीं थी; यह उस गाँव की पूरी 51वीं लाश थी। लड़की के माँ-बाप सिर पटक-पटक कर रो रहे थे और बोलते हुए जा रहे थे, "आखिर कब इस गाँव से लड़कियों का मरना बंद होगा? कब तक हमारी जवान बेटियाँ उस आत्मा की शिकार होती रहेंगी? आखिर कब तक?" ऐसा कहकर वे बुरी तरह रोने लगे थे।
वहाँ मौजूद सभी की आँखों में आँसू थे। तभी अचानक गाँव के मुखिया वहाँ आ गए और जोरों से चिल्लाकर बोले, "यह क्या मीटिंग लगा रखा है तुम लोगों ने? जब हमने साफ-साफ मना किया हुआ है कि नदी के उस पार वाले जंगलों में कोई नहीं जाएगा, तो क्यों अपनी जवान लड़कियों को वहाँ भेजते हो? क्या तुम लोग नहीं जानते वहाँ जिस्म की प्यासी आत्मा रहती है?"
"जो जवान लड़कियों को देखते ही पागल हो जाती है। आज तक हम कितने सारे बाबाओं से भी धागे-ताबीज करवा चुके हैं, लेकिन कोई भी उसके जिस्म की प्यासी आत्मा का इलाज नहीं कर पाया है।"
"क्या तुम लोग नहीं जानते कुंवारी लड़कियाँ उस आत्मा की कितनी बड़ी कमजोरी हैं? तो क्यों अपनी लड़कियों को नदी पर पानी भरने के लिए भेजते हो? क्यों? क्यों?" ऐसा कहकर गाँव के मुखिया ने सब पर चिल्लाना शुरू कर दिया था, और किसी के मुँह से चूँ तक की आवाज़ नहीं निकल रही थी।
मुखिया जी का उस गाँव में काफी ज़्यादा रौब था। पूरे गाँव में हर कोई मुखिया जी से डरा करता था। इसीलिए किसी की भी हिम्मत नहीं होती थी कि मुखिया जी के सामने अपना मुँह खोल सके।
जल्दी ही मुखिया जी ने सभी रीति-रिवाज़ों के साथ पूरे तामझाम से उस लड़की का अंतिम संस्कार करवा दिया था और एक बार फिर पूरे गाँव में यह चेतावनी दी थी कि अब कोई भी उस नदी के पार वाले जंगल में नहीं जाएगा और ना ही कोई अपनी जवान लड़की को उस साइड भेजेगा।
यह बात कहीं ना कहीं पूरे गाँव वाले जानते थे, लेकिन कुछ गाँव की लड़कियाँ, जो इस बात पर विश्वास नहीं किया करती थीं, यह जानने के लिए कि क्या वाकई नदी के पार में कुछ ऐसा है जो घातक है, वहाँ चली जाया करती थीं, और वहाँ से उनकी सिर्फ़ और सिर्फ़ लाश ही वापस आया करती थी।
जल्दी ही पूरे गाँव में इस बात की मुनादी करवा दी गई थी कि एक और लड़की की लाश मिली है, और अब उसे गाँव में उस नदी के पार कोई नहीं जाएगा।
लड़की के माँ-बाप उसे जलाने के बाद अपने घर आ गए थे। अब उनके पास रोने-पीटने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था, क्योंकि उनकी बेटी अब वापस नहीं आने वाली थी। उन दोनों बूढ़े माँ-बाप का इकलौता सहारा सिर्फ़ और सिर्फ़ उनकी बेटी थी। हमेशा से उसके पिताजी ही नदी के पार पानी भरने के लिए जाया करते थे, लेकिन उनकी तबीयत अचानक खराब होने की वजह से उसे लड़की को पानी लेने के लिए जाना पड़ा था, और उसके मन में भी यह बात थी कि नदी के पास ऐसा कुछ नहीं होने वाला है।
लोगों ने सिर्फ़ फ़ालतू की बातें बना रखी हैं।
यह सोचते हुए वह लड़की पानी भरने के लिए नदी के पार चली गई थी,
और वहाँ जाकर वह जिस्म की प्यासी आत्मा का शिकार हो चुकी थी।
वहीं दूसरी ओर, मुखिया जी अपने बड़े से शानदार महल में बैठे हुए थे। क्योंकि पूरे गाँव में अगर किसी का बड़ा ही खूबसूरत महल था, वह किसी और का नहीं, मुखिया जी का था।
लेकिन किसी को भी इस बात के बारे में दूर-दूर तक कोई अंदाज़ा नहीं था कि असल में वह मुखिया जी का महल नहीं था। मुखिया जी के मालिक मेवाड़ी परिवार हुआ करता था। वे अपने गाँव का बंगला, ज़मीन, सब कुछ मुखिया जी की देखरेख में छोड़कर हमेशा के लिए शहर में जा बसे थे, जहाँ वे देश के नंबर वन एचआरएम ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्रीज़ के मालिक थे।
मुखिया जी के मन में यह बात थी कि वे जय प्रकाश जी को इतना खुश कर देंगे कि वे कभी भी गाँव आने की नहीं सोचेंगे। क्योंकि अगर जिस दिन जय प्रकाश जी गाँव आ गए अपने बेटे को लेकर, तो मुखिया जी का उस दिन सड़क पर आ जाना तय था।
मुखिया जी ने अपनी ज़िंदगी के पूरे 18 साल उस महल और जय प्रकाश जी की प्रॉपर्टी की देखरेख में दिए थे।
तो किसी भी कीमत पर वह प्रॉपर्टी को अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे। इसीलिए जब भी किसी लड़की की मौत हुआ करती थी, तो वह जिस्म की प्यासी आत्मा के नाम पर गाँव वालों के मन में एक बार फिर बहुत ही ज़्यादा रौब जमाया करते थे।
जिसकी वजह से काफी हद तक गाँव वाले मुखिया जी से डरा करते थे। किसी को भी इस बात का दूर-दूर तक कोई एहसास नहीं था कि मुखिया जी प्रॉपर्टी पर कुंडली मारे बैठा हुआ था; वह प्रॉपर्टी उसकी नहीं थी। वह प्रॉपर्टी दूर शहर में रहने वाले मेवाड़ी परिवार की थी।
औलाद के नाम पर जयशंकर जी की ज़िंदगी में सिर्फ़ उनका एक बेटा था और दो पोते थे; बड़े पोते का नाम राज था और छोटे पोते का नाम करण था।
लेकिन मुखिया जी को उन्होंने यह बात अच्छी तरह से बता रखी थी कि तुम्हें सिर्फ़ उनकी गाँव की प्रॉपर्टी को देखने के लिए रखा गया है, तो तुम कभी भी अपने आप को मालिक समझने की भूल मत करना।
लेकिन उस बड़ी सी हवेली में रहने के बाद मुखिया जी खुद को वहाँ का मालिक ही समझने लगे थे,
और इसीलिए सभी के मन में मुखिया जी के लिए खौफ़ बना हुआ था। इतना ही नहीं, गाँव का बच्चा-बच्चा भी मुखिया जी से डरा करता था।
क्योंकि मुखिया जी ने अपने नाम का खौफ़, अपने नाम का रौब अच्छी तरह से पूरे गाँव वालों पर लगा रखा था।
जय प्रकाश जी हर 15 दिन में मुखिया जी से अपनी प्रॉपर्टी, अपने महल की खैर-खबर ले लिया करते थे।
मुखिया जी कुछ सोच ही रहे थे कि तभी उनकी लाडली बेटी उनके पास आ गई। मुखिया जी की बेटी का नाम रियाशी था।
उस गाँव के मुखिया ने शुरू से ही एक सपना देखा था कि वह अपनी बेटी रियाशी की शादी मेवाड़ी परिवार के बड़े बेटे के साथ करवाएँगे,
और हमेशा-हमेशा के लिए जो उनकी गाँव की प्रॉपर्टी है, वह उन्हीं की हो जाएगी।
यह सपना सजाए हुए थे,
इसलिए बचपन से ही उन्होंने अपनी बेटी रियाशी की आँखों में सिर्फ़ राज का सपना संजोया था,
और उसके मन में सिर्फ़ और सिर्फ़ मेवाड़ी परिवार के बड़े बेटे राज के लिए ही ज़ज़्बात डाले थे।
और कहा था कि तेरी शादी सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके बड़े बेटे राज से होगी।
लेकिन राज की शादी का इनविटेशन कार्ड अपने डेस्क पर देखने के बाद वह दोनों बाप-बेटी गुस्से से लाल-सुर्ख होने लगे थे।
लेकिन अब उनके पास वहाँ जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था।
और रियाशी यह देखना चाहती थी कि आखिरकार किस लड़की ने उसका बचपन का प्यार और उसके ख़्वाब छीन लिए थे।
वहीं दूसरी ओर, लंदन की एक बड़ी ही प्यारी सी खूबसूरत लड़की के साथ राज की शादी हो रही थी। उस लड़की का नाम कुछ और नहीं, बल्कि कायनात था।
कायनात बहुत ही ज़्यादा सुलझी हुई लड़की थी। भले ही वह बचपन से विदेश में पली-बड़ी थी, लेकिन उसने कभी भी अपने आदर्शों को नहीं छोड़ा था। वह थोड़ी सी चुलबुली सी और हाँ, थोड़ी सी डरपोक सी थी, लेकिन बहुत क्यूट थी। विदेश में हर कोई उसके साथ फ़्रेंडशिप करना चाहता था, उसे प्यार करना चाहता था,
लेकिन कभी भी कायनात ने किसी को घास तक नहीं डाली थी। हर रोज़ न जाने कितने प्रपोज़ल वह ठुकराती थी, कम से कम डेली 3-4 लड़के उसे हर रोज़ प्रपोज़ किया करते थे।
एक बार तो कायनात के पीछे एक ऐसा लड़का लग गया था जब कायनात अपने कॉलेज से घर लौट रही थी।
तभी अचानक से एक बाइक सवार लड़का उसके सामने आया, उसने अपनी बाइक को आलमोस्ट कायनात के बिल्कुल पैरों के पास ही रोक दी थी। और खुद झुककर उससे मोहब्बत का इज़हार किया था।
कायनात उसके इस तरह के एक्शन से काफी ज़्यादा हैरान थी और उसकी ओर देखकर कहने लगी थी, "तुम कौन हो? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई इस तरह से मेरे सामने बर्ताव करने की? और वैसे भी, मुझे प्यार-मोहब्बत में किसी भी तरह का कोई यकीन नहीं है, तो तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम यहाँ से अभी और इसी वक्त चले जाओ।"
लेकिन अचानक से वह लड़का थोड़ा सा आगे बढ़ा था और कायनात के कान के पास जाकर बोला था, "तुम मुझे चाहकर भी अपनी ज़िंदगी से नहीं निकाल पाओगी, तुम मुझे अपनाओ या ना अपनाओ, लेकिन तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी हो, सिर्फ़ मेरी।"
ऐसा कहकर अचानक से वह लड़का बड़ी ही फ़ास्ट स्पीड से अपनी बाइक तेज़ी से भगाता हुआ वहाँ से चला गया था।
अंजान लड़के की इस तरह की हरकत से कायनात काफी ज़्यादा हैरान थी, क्योंकि उसने आज से पहले कभी उसे लड़के को नहीं देखा था, और वह लड़का अचानक से एक हवा के झोंके की तरह आया था और उसी तरह से गायब भी हो गया था।
आज तक कितने ही लड़के कायनात को प्रपोज़ करते आये थे, लेकिन यह सबसे अलग था।
कायनात की हैरानी का कोई ठिकाना नहीं था और उसे इस बात को भूलने में काफी समय लगा था, क्योंकि उस दिन के बाद वह लड़का उसे कभी भी दिखाई नहीं दिया था।
जल्दी ही अपनी एजुकेशन कम्प्लीट करने के बाद कायनात इंडिया लौट आई थी,
लेकिन इंडिया में उसका एक अलग ही तरह का ख़बर इंतज़ार कर रही थी। वहाँ पर आकर उसे पता चला कि उसके पिता ने अपनी एक बिज़नेस डील को क्रैक करने के लिए अपनी बेटी की शादी मेवाड़ी परिवार के बड़े बेटे और एचआरएम ग्रुप के होने वाले चेयरमैन के साथ तय कर दी थी,
क्योंकि इसमें कहीं ना कहीं उनके बिज़नेस का बहुत ही बड़ा फ़ायदा होने वाला था।
अब कायनात वैसे भी किसी को पसंद नहीं किया करती थी।
और उसने कभी अपने पापा की कोई बात नहीं टाली थी,
लेकिन आज जैसे ही उसे शादी का प्रस्ताव मिला, तो उसे उस लड़के की याद अचानक से आ गई थी जिस लड़के ने उसे विदेश में प्रपोज़ किया था,
और कहा था कि चाहे वह कहाँ भी, कहीं भी रह ले, लेकिन वह सिर्फ़ और सिर्फ़ उसकी रहेगी।
यह याद आते ही कायनात का गला अचानक से सुखने लगा था। उसे कुछ अजीब सा लगा था। हालाँकि वह लड़का उस दिन के बाद उसे दिखाई नहीं दिया था,
लेकिन आज यूँ शादी के मौके पर उसकी याद आ जाना कायनात को काफ़ी अलग लगा था।
लेकिन फ़िलहाल जब उसके पिता ने एक बार और कायनात को शादी के बारे में पूछा, तो कायनात के पास और कोई रास्ता नहीं था
और मना करने का कोई कारण भी नहीं था, तो
इसलिए उसने राज से, यानी कि मेवाड़ी परिवार के बड़े बेटे से शादी करने के लिए हाँ कह दी थी।